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________________ २९२ पद्मपुराणे अनुबन्धमिदं हास्यं त्यज दुःखविवर्धनम् । मयूरशष्पशोका? माभूः क्षुद्रकवद् बुध ॥१५५॥ सर्वदा सुलभाः पुंसः शिखिशष्पोपमाः स्त्रियः । ब्रवीमि राघव त्वाहं प्राज्ञैः शोको न धार्यते ॥१५६॥ ततो लक्ष्मीधरोऽवोचत्परमो वाक्यवद्मनि । जाम्बूनदेदृशं नेदमिदमेतादृशं शृणु ॥१५७॥ आसीद्गृहपतिः ख्यातः पुरे कुसुमनामनि । प्रभवाख्यः प्रिया तस्य यमुनेति प्रकीर्तिता ॥१५॥ धनबन्धुगृहक्षेत्रपशुप्रभृतयः सुताः । पालान्तास्तस्य सेवन्ते शब्दानामन्तमागताः ॥१५९॥ अन्वर्थसंज्ञकास्ते च कुटुम्बार्थ सदोद्यताः । कुर्वन्ति कर्म विश्रान्ति क्षणमप्यनुपागताः ॥१६॥ आरमश्रेयोभिधानश्च सुतोऽस्यैवाखिलाधरः । पुण्योदयादसौ भोगान् भुङ्क्ते देवकुमारवत् ॥१६१॥ 'भ्रातृमिः स पितृभ्यां च विरं कटुमिरक्षरैः । निर्भसितोऽन्यदा यातो मानी बाह्यां परिभ्रमन् ॥१६॥ सुकुमारशरीरोऽसौ निर्वेदं परमं गतः । कर्म कर्तुमशक्तात्मा मरणं स्वस्य वाम्छति ॥१६३॥ पूर्वकर्मानुभावेन प्रेरितः पथिकइत्र तम् । समागत्यामणीदेवं श्रूयतामयि मानव ॥१६॥ पृथुस्थानाधिपस्याहं सुमानुरिति नन्दनः । गोत्रिकाक्रान्तदेशः सन् कुर्वमित्तमाषितम् ।।१६५॥ पर्यटन् वसुधामेतां दैवात् कूर्मपुरं गतः । आचार्येणाभियोग्येन संगं प्राप्तोऽस्मि तत्र च ॥१६६॥ अयोमयमिदं तेनं दत्तं मे वलयं शुभम् । मार्गदुःखाभिभूताय कारुण्याकरचेतसा ॥१६॥ एतच्च सर्वरोगाणां शमनं बुद्धिवर्धनम् । ग्रहोरगपिशाचादिवशीकरणमुत्तमम् ॥१६८॥ हे विद्वन् ! क्षुद्रके समान मयूररूपी तृणके शोकसे पीड़ित नहीं होओ ॥१५५।। मयूररूपी तृणके समान स्त्रियां पुरुषको सदा सुलभ हैं इसलिए हे राघव ! मैं आपसे कह रहा हूँ। बुद्धिमान मनुष्य कभी शोक धारण नहीं करते ॥१५६।। ___ तदनन्तर वचनोंके मार्गमें अतिशय निपुण लक्ष्मणने कहा कि हे जाम्बूनद ! यह बात ऐसी नहीं है किन्तु ऐसी है सो सुनो ॥१५७।। कुसुमपुर नामक नगरमें एक प्रभव नामका प्रसिद्ध गृहस्थ रहता था। उसकी स्त्रीका नाम यमुना था ॥१५८|| उन दोनोंके धनपाल, बन्धुपाल, गृहपाल, क्षेत्रपाल और पशुपाल नामके पांच पुत्र थे ॥१५९॥ ये सभी पुत्र सार्थक नामवाले थे और कुटुम्बके पालनके लिए सदा तत्पर रहते थे तथा क्षणभरके लिए भी अपने कार्यसे विश्राम नहीं लेते थे ।।१६०॥ इनमें सबसे छोटा आत्मश्रेय नाम कुमार था सो वह पुण्योदयसे देवकुमारके समान भोग भोगता था ।।१६।। कुछ करता नहीं था इसलिए भाई तथा माता-पिता निरन्तर कटुक अक्षरों द्वारा उसका तिरस्कार करते रहते थे। एक दिन वह मानी घरसे निकलकर नगरके बाहर चला गया ॥१६२।। अत्यन्त सकमार शरीरका धारक था इसलिए कछ कर सकने के लिए समर्थ नहीं यं नहीं था अतः परम निर्वेदको प्राप्त हो आत्मघात करने की इच्छा करने लगा ॥१६३।। उसी समय पूर्व कर्मोदयसे प्रेरित हुआ एक पथिक उसके पास आकर बोला कि हे मनुष्य ! सुन ॥१६४।। मैं पृथुस्थान नगरके राजाका पुत्र सुभानु हूँ। निमित्तज्ञानीके आदेश का पालन करता हुआ मैं अब तक अनेक देशोंमें भ्रमण करता रहा हूँ।१६५॥ ___इस पुथ्वीपर भ्रमण करता हुआ मैं दैवयोगसे कूर्मपुर नामा नगरमें पहुंचा। वहां एक उत्तम आचार्यके साथ समागमको प्राप्त हुआ ॥१६६।। मैं मार्गके दुःखसे दुःखी था इसलिए दयालु चित्तके धारक उन आचार्यने मझे यह लोहे का कड़ा दिया था ॥१६७॥ यह कड़ा समस्त रोगोंको शान्त करनेवाला तथा बुद्धिको बढ़ानेवाला है और ग्रह, उरग, पिशाच आदिका उत्तम वशीकरण १. शिशिशिष्योपमाः म. । २. श्रियः म.। ३. विश्रान्ति लक्षमप्यनु- म.। ४. खिला धरा म. । ५. मातृभिः ६. कटुकैरक्षरैः म. । ७. निमित्त ब. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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