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________________ २९० पद्मपुराणे ततोऽनादरतस्तेषामेकैकं वीक्ष्य लक्ष्मणः । अभाणीदूर्जितं वाक्यं धनाघनघनस्वनः ॥१२८॥ सत्यं यदीदृशः ख्यातः शक्तिमान् दशवक्त्रकः । तत् किमश्राव्यनाम स्वमसौ स्त्रीतस्करो भवेत् ॥१२९॥ दाम्भिकस्यातिभीतस्य मोहिनः पापकर्मणः । रक्षोऽधमस्य तस्यास्ति कुतः स्वल्पापि शूरता ॥१३०॥ अब्रवीत्पद्मनाभश्च किमुक्तेनेह भूरिणा । वार्तागमोऽपि दुःप्रापो दिष्ट्या लब्धो मया स च ॥१३॥ चिन्त्यमस्त्यपरं नातः क्षोभ्यतां राक्षसाधमः । जायतासचितं भावि फलं कर्मानिलेरितम् ॥१३२।। अथैनमूचिरे वृद्धाः क्षणं स्थित्वेव सादराः। शोकं जहीहि पद्माम भवास्माकमधीश्वरः ॥१३३।। विद्याधरकुमारीणां गुणैरप्सरसामिव । भव मर्ता भ्रमन् लोके वियुक्ताशेषदुःखधीः ॥१३४॥ पद्मोऽवदन्न मेऽन्यामिः प्रमदाभिः प्रयोजनम् । विजयन्ते महालीलां यदि शच्या अपि स्त्रियः ॥१३५॥ प्रीतिश्चेन्मयि युष्माकमस्ति कापि नभश्चराः । अनुकम्पापि वा सीतां ततो दर्शयत द्रुतम् ॥१३६॥ जाम्बूनदस्ततोऽवोचत्प्रभो मूढग्रहस्त्वया। त्यज्यतां क्षद्रवन्मा भूर्मयर इव दःखितः ।।१३७॥ अस्ति वेणातटे गेही नाम्ना सर्वरुचिः किल । सुतो विनयदत्तोऽस्य गुणपूर्णासमुद्भवः ॥१३८॥ विशालभूतिसंज्ञश्च वयस्योऽस्यातिवल्लभः । तद्भार्यायां समासक्तो गृहलक्ष्म्यां दुरात्मकः ॥१३॥ तस्या एव च वाक्येन विद्रुतिच्छद्मना वनम् । नीत्वा विनयदत्तं स बबन्धोपरि शाखिनः ॥१४॥ बध्वा च तं ततो गेहं क्रूरकर्मा हताशयः । विधाय चोत्तरं किंचिदवतस्थे कृतार्थवत् ॥ ३४१।। कथा हो छोड़िए, कोई दूसरा उपाय सोचिए ।।१२७॥ तदनन्तर अनादरसे उनमें प्रत्येककी ओर देखकर मेघके समान गम्भीर शब्दको धारण करनेवाले लक्ष्मणने इस प्रकार बलपूर्ण वचन कहे कि यदि रावण सचमच ही ऐसा प्रसिद्ध बलवा है तो जिसका नाम भी श्रवण करने योग्य नहीं रहता ऐसा स्त्रीका चोर क्यों होता? ॥१२८-१२९|| वह तो कपटी, भीरु, मोही, पापकर्मा नीच राक्षस है उसमें थोड़ी भी शूरवीरता कहाँ है ? ॥१३०।। रामने भी कहा कि इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या? जिस समाचारका मिलना भी दुष्कर था वह समाचार देवकी अनुकूलतासे हमने प्राप्त कर लिया है ।।१३१।। इसलिए अब दूसरी बात सोचनेकी आवश्यकता नहीं है, अब तो उस नीच राक्षसको क्षोभित किया जाये। कर्मरूपी वायुसे प्रेरित हुआ उचित ही फल होगा ॥१३२।। - अथानन्तर क्षण-भर ठहरकर वृद्ध लोगोंने आदरपूर्वक कहा कि पद्माभ ! शोक छोड़ो, हमारे स्वामी होओ, गुणोंसे अप्सराओंकी समानता करनेवाली विद्याधर कुमारियोंके भर्ता होओ तथा सब द:ख छोडकर आनन्दसे लोकमें भ्रमण करो॥१३३-१३४॥ रामने उत्तर दिया कि मझे अन्य स्त्रियोंसे प्रयोजन नहीं है भले ही वे स्त्रियाँ इन्द्राणीकी महालीलाको जीतती हों ।।१३५॥ हे विद्याधरो! यदि आप लोगोंकी मुझपर कुछ भी प्रीति अथवा दया है तो शीघ्र ही सीताको दिखाओ ॥१३६।। तदनन्तर जाम्बूनदने कहा कि हे प्रभो! इस मूर्ख हठको छोड़ो जिस प्रकार कृत्रिम मयूरके विषयमें क्षुद्रनामा मनुष्य दुःखी हुआ था उस तरह तुम दुःखी मत होओ ॥१३७॥ मैं यह कथा कहता हूँ सो सुनो वेणातट नामक नगरमें सर्वरुचि नामका एक गृहस्थ रहता था। उसके गुणपूर्णा नामक स्त्रीसे उत्पन्न विनयदत्त नामका पुत्र था ।।१३८: विनयदत्तका एक विशालभूति नामक अत्यन्त प्यारा मित्र था सो वह पापी, विनयदत्तको स्त्री गृहलक्ष्मीमें आसक्त हो गया ।।१३२।। एक दिन उसी स्त्रीके कहनेसे विशालभूति विनयदत्तको भ्रमण करनेके छलसे वनमें ले गया और उसे वृक्षके ऊपर बाँध आया ॥१४०।। दुष्ट अभिप्रायको धारण करनेवाला क्रूरकर्मा विशालभूति घर आकर १. तत्किमश्राव्यं नाम-म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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