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The forty-eighth chapter. There are other beautiful regions near Lanka, which are made of gems, jewels and gold. These regions are adorned with excellent cities, are the play grounds of the Rakshasas and are inhabited by the Vidyadharas who enjoy great pleasures. Sandhyakar, Suvel, Kanchan, Hladan, Yodhan, Hans, Harisagar and Ardha-Svarga are some other islands which are endowed with all kinds of riches and pleasures, are adorned with forests and gardens and resemble the regions of heaven. The king of Lanka, Ravana, surrounded by his retinue, enjoys himself in these regions with his friends, brothers, sons, wives and other relatives. Seeing the king of the Vidyadharas playing, I think even Indra would be filled with fear. His brother Vibhishana is very powerful in the world, invincible in battle and the best among kings. Even among the gods, there is no one who can equal him in intelligence, let alone a human being. The king of the world, Ravana, is fortunate to have such a brother. He has another brother, adorned with virtues, who is known as Kumbhakarna and is armed with the great weapon, the Trishul. Even the gods cannot bear to look at his terrible, crooked frown, which resembles the cave of Yama. Indrajit, who has gained fame in battle, is his son. The whole world seems to be in his hands. Thus, Ravana has many servants like these, who are endowed with various miraculous powers and have subdued their enemies through their prowess. Seeing his umbrella, which shines like the full moon, enemies abandon their pride in battle. Even a mere image or picture of him, or even his name uttered, is enough to strike terror in the hearts of his enemies. Who is capable of defeating such a Ravana in battle? This story should not be told, let us think of another way.
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________________ अष्टचत्वारिंशत्तमं पवं लङ्कायाः परिपार्श्वेषु सन्त्यन्येऽपि मनोहराः । स्वमावावस्थिता रस्नमणिकाञ्चनमूर्तयः ॥ ११३॥ प्रदेशा नगरोपेता रक्षसां क्रीडभूमयः । अधिष्ठिता महाभोगैस्ते च सर्वे नभश्वरैः ॥ ११४ ॥ संध्याकारः सुवेलश्च काञ्चनो ह्लादनस्तथा । योधनो हंसनामा च हरिसागर निस्वनः ॥ ११५ ॥ अर्द्धस्वर्गादयश्चान्ये द्वीपाः सर्वद्विभोगदाः । प्रदेशा इव नाकस्य काननादिविभूषिताः ॥ ११६ ॥ सुहृद्भिर्भ्रातृभिः पुत्रैः कलत्रैर्बान्धवैः सह । रमते येषु लङ्केशो भृत्यवर्गसमावृतः ॥११७॥ तं क्रीडन्तं जनो दृष्ट्वा महाविद्याधराधिपम् । देवाधिपोऽपि मन्येऽहं समाशङ्कां प्रपद्यते ||११८ ।। भ्राता विभीषणो यस्य बली लोकसमुत्कटः । परैरपि पे रैराजावजय्यो राजपुंगवः ॥ ११९ ॥ त्रिदशस्तत्समो बुद्ध्या नास्ति नास्त्येव मानुषः । तेनैकेनैव पर्याप्तं रावणस्य जगत्प्रभोः ॥१२०॥ अपरोऽप्यनुजस्तस्य विद्यते गुणभूषणः । भानुकर्ण इति ख्यात त्रिशूलपरमायुधः ॥ १२१ ॥ भ्रकुटिं कुटिलां यस्य भीष्मां कालकुटीमिव । न शक्नुवन्ति संग्रामे सुरा अप्यवलोकितुम् ॥ १२२ ॥ महेन्द्र जितसंज्ञश्च क्षितौ ख्यातिमुपागतः । तस्यैव तनयो यस्य जगदाभासते करे ॥ १२३ ॥ एवमाद्याः सुबहजः प्रणतास्तस्य किङ्कराः । नानाविद्याद्भुतोपेताः प्रतापप्रणतारयः ॥ १२४॥ यस्यातपत्रमालोक्य पूर्णचन्द्रसमप्रभम् । त्यजन्ति रिपवो दर्प समरे चिरपोषितम् ॥ १२५ ॥ अमुष्य पुस्तकर्मापि चित्रं वा सहसेक्षितम् । नाम चोच्चारितं शक्तमरीणां त्रासकर्मणि ॥ १२६ ॥ एवंविधममुं युद्धे कः शक्तो जेतुमुद्धतः । कथा चैषा न कर्तव्या चिन्त्यतामपरा गतिः ।। १२७|| परिखासे युक्त होने के कारण दूसरी पृथिवीके समान जान पड़ती है ॥ ११२ ॥ लंकाके समीपमें और भी ऐसे स्वाभाविक प्रदेश हैं जो रत्न, मणि तथा स्वर्णसे निर्मित हैं ॥ ११३ ॥ | वे सब प्रदेश उत्तमोत्तम नगरोंसे युक्त हैं, राक्षसों की क्रीड़ा भूमि हैं तथा महाभोगोंसे युक्त विद्याधरोंसे सहित हैं ॥११४॥ सन्ध्याकार, सुवेल, कांचन, ह्लादन, योधन, हंस, हरिसागर और अद्धं स्वर्गं आदि अन्य द्वीप भी विद्यमान हैं जो समस्त ऋद्धियों तथा भोगोंको देनेवाले हैं, वन-उपवन आदिसे विभूषित हैं तथा स्वर्गं प्रदेशोंके समान जान पड़ते हैं ।। ११५ - ११६ ॥ लंकाधिपति रावण भृत्यवगंसे आवृत हो मित्रों, भाइयों, पुत्रों, स्त्रियों तथा अन्य इष्टजनोंके साथ उन प्रदेशोंमें क्रीड़ा किया करता है | ११७॥ क्रीड़ा करते हुए उस विद्याधरोंके अधिपतिको देखकर मैं समझता हूँ कि इन्द्र भी आशंकाको प्राप्त २८९ जाता है ||११|| जिसका भाई विभीषण लोकमें अत्यधिक बलवान् है, युद्ध में बड़े-बड़े लोगोंके द्वारा भी अजेय है और राजाओंमें श्रेष्ठ है ॥ ११९ ॥ बुद्धि द्वारा उसकी समानता करनेवाला देव भी नहीं है फिर मनुष्य तो निश्चित ही नहीं है । जगत्प्रभु रावणको उसी एक भाईका संसगँ प्राप्त होना पर्याप्त है || १२० ॥ उसका गुणरूपी आभूषणोंसे सहित एक छोटा भाई भी है जो कुम्भकर्ण इस नाम से प्रसिद्ध है तथा त्रिशूल नामक महाशस्त्र से सहित है || १२१|| युद्धमें यमराजकी कुटीके समान जिसकी भयंकर कुटिल भ्रकुटीको देव भी देखनेके लिए समर्थ नहीं हैं फिर मनुष्योंकी तो है ? || १२२ ।। युद्धमें ख्यातिको प्राप्त होनेवाला इन्द्रजित् उसीका पुत्र है ऐसा पुत्र कि जिसके हाथ में सारा संसार जान पड़ता है ॥१२३|| इन सबको आदि लेकर रावणके ऐसे अनेक किंकर हैं जो नाना प्रकारकी विद्याओंके आश्चयंसे सहित हैं तथा प्रतापसे जिन्होंने शत्रुओंको भूत बना दिया है || १२४ || पूर्ण चन्द्रके समान आभावाले जिसके छत्रको देखकर शत्रु युद्ध में अपना चिरसंचित अहंकार छोड़ देते हैं ।। १२५ || सहसा दृष्टिमें आया इसका पुतला, अथवा चित्र अथवा उच्चारण किया हुआ नाम भी शत्रुओंको भय उत्पन्न करनेमें समर्थ है ॥ १२६ ॥ इस प्रकारके इस रावणको युद्ध में जीतनेके लिए कौन बलवान् समर्थ है ? अर्थात् कोई नहीं । इसलिए यह १. मरुत्पत्यमरोपेते ख. । २. आजो = संग्रामे, अजय्य इतिच्छेदः । ३. कर्माणि म. । २- ३७ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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