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________________ २८६ पपपुराणे शेषामिव ततो मूर्ध्नि ते कृत्वाऽज्ञा प्रमोदिनः । उत्पत्य दिक्षु सर्वासु द्रुतं जग्मुरहयवः ॥६५॥ युवविद्याभृता लेखं नाययित्वा यथाविधि । ज्ञातनिःशेषवृत्तान्तो वैदेहोऽप्युपपादितः ॥७॥ ततोऽसौ स्वसूदुःखेन नितान्तोद्विग्नमानसः । सुग्रीव इव रामस्य नितरां निभृतोऽभवत् ॥७१।। स्वयमेव च सुग्रीवः पर्यटन मानुवर्त्मना । तारानिकरचक्रेण संप्रवृत्तो गवेषणे ॥७॥ दुष्टविद्याधरानेकपुरान्वेषणतत्परः । ध्वजं दूरात् समालोक्य समीरणविकम्पितम् ॥७३॥ जम्बूद्वीपमहीध्रस्य शिखरेणोपलक्षितम् । 'नभस्तलं परं प्राप चलदंशुकपल्लवः ॥७४।। वियतोऽवतरद् वीक्ष्य विमानं भानुभासुरम् । उत्पाताशङ्कितो जातो रस्नकेशी समाकुलः ॥५॥ आसीदनुसमालोक्य तदसावतिविह्वलः । वैनतेयात् परित्रस्तः संचुकोच यथोरंगः ॥७६।। आसन्नं च परिज्ञाय ध्वजेन कपिलक्ष्मणम् । रत्नकेशी गतश्चिन्तामिति मृत्युमयाकुलः ॥७॥ लाधिपतिना नूनं क्रद्धेन जनितागसा । प्रेषितो मदविनाशाय सग्रीवोऽयमपागतः ॥७॥ किं न प्रतिमये शीघ्रं मृतो रत्नाकराम्मसि । हा धिगत्रान्तरे द्वीपे मरणं समुपागतम् ॥७९॥ मनोरथं पुरस्कृत्य विद्यावीर्यविवर्जितः । जीवितस्थहयाविष्टः प्रापयिष्यामि किंवहम् ॥८॥ इति चिन्तयतस्तस्य संप्राप्तो वानरध्वजः । द्योतयन् सहसा द्वोपं द्वितीय इव मास्करः ॥८॥ तकं धूसरसर्वाङ्गमालोक्य वनपांसुमिः । वानराङ्कध्वजोऽपृच्छदनुकम्पा समुद्वहन् ॥८२।। अन्त भागोंमें, सुमेरु पर्वतोंमें, विद्याधरोंके चित्र-विचित्र मनोहर नगरोंमें, समस्त दिशाओंमें और भूमिके विवरों अर्थात् कन्दराओंमें सीताका पता चलाओ॥६६-६८॥ तदनन्तर हर्षसे भरे अहंकारी वानर शेषाक्षतकी तरह सुग्रीवकी आज्ञाको शिरपर धारण कर शीघ्र ही उडकर समस्त दिशाओंमें चले गये ।।६९।। एक तरुण विद्याधरके द्वारा विधिपूर्वक पत्र भेजकर भामण्डलके लिए भी समस्त वृत्तान्तसे अवगत कराया गया ॥७०॥ तदनन्तर बहनके दुःखसे भामण्डल अत्यन्त दुखी हुआ और सुग्रीवके समान रामका अतिशय आज्ञाकारी हुआ ।।७१॥ सुग्रीव, स्वयं भी सीताकी खोज करनेके लिए ताराओंके समूहके साथ आकाशमार्गसे चला ॥७२॥ वह दुष्ट विद्याधरोंके अनेक नगरोंके बीच सीताकी खोज करने में तत्पर हुआ भ्रमण कर रहा था। तदनन्तर हवासे हिलती हुई ध्वजाको दूरसे देखकर वह जम्बूद्वीपके एक पर्वतके शिखरसे उपलक्षित आकाशमें पहुंचा। उस समय उसके वस्त्रका अंचल हवासे हिल रहा था ।।७३-७४॥ उस पर्वतपर रत्नकेशी विद्याधर रहता था, सो वह आकाशसे उतरते हुए सूर्यके समान देदीप्यमान सुग्रीवके विमानको देखकर उत्पातकी आशंकासे युक्त हो गया ॥७५॥ विमान को देखकर वह अत्यन्त विह्वल हो गया और जिस प्रकार गरुड़से भयभीत हो सर्प संकुचित होकर रह जाता है उसी प्रकार शी भी उस विमानसे भयभीत हो संकुचित होकर रह गया ॥७६॥ जब सुग्रीव बिलकूल निकट आ गया तब उसे उसकी ध्वजासे वानरवंशी जानकर रत्नकेशी मृत्युके भयसे व्याकुल होता हुआ इस प्रकारकी चिन्ताको प्राप्त हुआ ।।७७॥ जान पड़ता है कि मैंने लंकाधिपति-रावणका अपराध किया था अतः कुपित होकर उसके द्वारा मुझे नष्ट करने के लिए भेजा हुआ यह सुग्रीव आया है ॥७८।। हाय मैं भय उत्पन्न करनेवाले लवण समुद्र में गिरकर शीघ्र ही क्यों नहीं मर गया। मुझे धिक्कार है जिसे इस अन्य द्वीपमें मरण प्राप्त हुआ है.-मरनेका अवसर प्राप्त हो रहा है ।।७९।। मैं विद्याबलसे रहित होकर भी इच्छाओंको आगे कर जीवित रहने की इच्छासे युक्त हूँ सो देवू अब क्या प्राप्त करता हूँ ? ॥८०।। इस प्रकार रत्नकेशी विचार कर ही रहा था कि इतने में द्वितीय सूर्यके समान द्वीपको प्रकाशित करता हुआ सुग्रीव वहाँ शीघ्र ही जा पहुँचा ॥८१।। वनकी धूलिसे १. अहंकारयुक्ता-। २. जम्बूद्वीपमहीन्द्रस्य म. । जम्बूद्वीपमहेन्द्रस्य क .। ३. पल्लवम् म.। ४. समुपागतः म, । ५. जीवितः स्पृहया म.। ६. -दनुकम्प- म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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