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________________ अष्टचत्वारिंशत्तम पर्व स त्वं रत्नजटी पूर्वमासीद् विद्यासमुन्नतः । अवस्थामीदृशीं कस्मादधुना भद्र संगतः ॥८३॥ इत्युक्तोऽप्यनुकम्पेन सुग्रीवेण सुखाकरम् । सर्वाङ्गं कम्पयन् भीत्या दीनो रत्नजटी भृशम् ॥८४॥ मा भैषीमंद्र मा भैषीरित्युक्तश्च पुनः पुनः । जगी कृतानतिर्धारमतिः प्रकटिताक्षरम् ॥८॥ प्रतिपक्षी भवन् साधो रावणेन दुरात्मना । सीताहरणसक्नेन छिमविद्योऽहमीदृशः ॥८६॥ जीविताशा समालम्ब्य कथंचिदेवयोगतः । ध्वजमेतं समुत्सृज्य स्थितोऽस्मि कपिपुंगव ॥८॥ उपलब्धप्रवृत्तिश्च तोषोद्वेगं वहन् द्वतम् । गृहीत्वा रत्नजटिनं सुग्रीवः स्वपुरं ययौ ॥४८॥ समक्षं लक्ष्मणस्याथ महतां च खगामिनाम् । जगौ रत्नजटी पद्म विनयी विहिताञ्जलिः ।।८।। देव देवी नृशंसेन सती सीता दुरात्मना । हृता लकापुरीन्द्रेण विद्या च मम कोपिनः ॥१०॥ कुर्वन्ती सा महाक्रन्दं ध्वनिना चित्तहारिणा । मृगोव व्याकुलीभूता नीता तेन बलीयसा ॥११॥ येनासीत् समरे मीमे निर्जित्य सुमहाबलः । इन्द्रो विद्याभृतामीशो बन्दिग्रहमुपाहृतः ॥१२॥ स्वामी भरतखण्डानां यस्त्रयाणां निरङ्कशः। कैलासोद्धरणे येन विशाल संगतं यशः ॥१३॥ सागरान्ता मही यस्य दासोवाज्ञा प्रतीच्छति । सुरासुरैर्न यो जेतुं संहतैरपि शक्यते ॥१४॥ श्रेष्ठेन विदुषां तेन धर्माधर्मविवेकिना । कर्मेदं निर्मितं करं मोहो जयति पापिनाम् ॥१५॥ तच्छुत्वा विविधं बिभ्रदर्स काकुत्स्थनन्दनः । अङ्गस्पृशं ददौ सर्व सादरं रत्नकेशिने ॥९६। देवोपगीतसंज्ञे च पुरे गोत्रक्रमागतम् । अन्वजानादधीशत्वं विच्छिन्नमरिभिश्चिरम् ॥९॥ जिसका समस्त शरीर धूसर हो रहा था ऐसे उस रत्नकेशीको देखकर दया धारण करते हुए सुग्रीवने पूछा ॥८२॥ कि तू रत्नजटी तो पहले विद्याओंसे समुन्नत था। हे भद्र ! अब ऐसी दशाको किस कारण प्राप्त हुआ है ? ॥८३॥ इस प्रकार दयाके धारक सुग्रीवने उससे सुखसमाचार पूछा तो भी भयके कारण उसका समस्त शरीर काँप रहा था तथा वह अत्यन्त दीन जान पड़ता था ।।८४॥ तदनन्तर सुग्रोवने जब उससे बार-बार कहा कि हे भद्र ! भयभीत मत हो, भयभीत मत हो तब कहीं धैर्य धारण कर उसने नमस्कार किया और स्पष्ट अक्षरों में कहा कि हे सत्पुरुष! दुष्ट रावण सीताके हरने में तत्पर था उस समय मैंने उसका विरोध किया जिससे उसने मेरी विद्याएँ छीनकर मुझे ऐसा कर दिया ।।८५-८६।। हे कपिश्रेष्ठ! दैवयोगसे जीवित रहनेको आशासे मैं यहाँ इस ध्वजाको ऊपर उठाकर किसी तरह स्थित हूँ-रह रहा हूँ ॥८७॥ तदनन्तर समाचार प्राप्त हो जानेसे जो हर्षजन्य उद्वेगको धारण कर रहा था ऐसा सुग्रीव शीघ्र ही रत्नजटीको लेकर अपने नगरकी ओर गया ॥८॥ ___अथानन्तर विनयसे भरे रत्नजटीने हाथ जोड़कर लक्ष्मण तथा अन्य बड़े-बड़े विद्याधरोंके सामने रामसे कहा कि हे देव ! अतिशय दुष्ट, लंकापुरीके राजा कर रावणने पतिव्रता सीतादेवीको तथा क्रोध करनेवाले मुझ रत्नजटीकी विद्याको हरा है ॥८९-९०॥ जो चित्तको हरण करनेवाली ध्वनिसे महारुदन करती हई मगीके समान व्याकुल हो रही थी ऐसी सीताको वह बलवान् हरकर ले गया है ॥९१।। जिसने भयंकर संग्राममें अत्यन्त बलवान्, विद्याधरोंके अधिपति इन्द्रको जीतकर कारागारमें डाला था ॥९२।। जो भरतक्षेत्रके तीन खण्डोंका अद्वितीय स्वामी है, जिसने कैलास पर्वतके उठाने में विशाल यश प्राप्त किया है, समुद्रान्त पृथ्वी दासीके समान जिसकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करती है, सुर तथा असुर मिलकर भी जिसे जीतने के लिए समर्थ नहीं हैं, जो विद्वानोंमें श्रेष्ठ है तथा धर्म-अधर्मके विवेकसे युक्त है, उसी रावणने यह क्रूर कार्य किया है सो कहना पड़ता है कि पापी जीवोंका मोह बड़ा प्रबल है ।।९३-९५।। यह सुनकर नाना प्रकारके स्नेहको धारण करते हुए रामने आदरके साथ रत्नजटीके लिए अपने शरीरका स्पर्श दिया अर्थात् उसका आलिंगन किया ॥२क्षा और देवोपगीत नामक नगरका स्वामित्व रत्नजटीके वंशपरम्परासे चला आता था पर बोचमें शत्रुओंने छीन लिया था सो उसे उसका स्वामित्व प्रदान किया-वहाँका राजा बनाया ॥९७|| Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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