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________________ पद्मपुराणे कुक्षिजातोऽपि पुत्रस्य यः कृत्यं कुरुते न ना । अपुत्र एव कान्तेऽसौ जायते रिपुरेव वा ॥१४४॥ तव सोऽयमपुत्रायाः सति पुत्रो भविष्यति । अन्तर्यानेन किं कृत्यमत्र वस्तुनि शोभने ।।१४५।। एवमस्त्विति संभाष्य देवी सूतिगृहं गता। प्रभाते सुतजन्मास्यास्तुष्टया लोके प्रकाशितम् ।।१४६॥ ततो जन्मोत्सवस्तस्य पुरेऽस्मिन् रथनूपुरे । संप्रवृत्तः समागच्छद् विस्मिताशेषबान्धवः ।।१४७।। रत्नकुण्डलभानूनां मण्डलेन यतो वृतः । प्रमामण्डलनामास्य पितृभ्यां निर्मितं ततः ॥१४॥ अर्पितः पोषणायासौ धात्र्या लीलामनोहरः । सर्वान्तःपुरलोकस्य करपद्ममधुवतः ॥१४९।। विदेहा तु हृते पुत्रे कुररीवत् कृतस्वना । बन्धूनपातयत् सन् गम्भीरे शोकसागरे ॥१५॥ परिदेवनमेवं च चक्रे चक्राहतेव सा । हा वत्स केन नीतोऽसि मम दुष्करकारिणा ।।१५।। विघृणस्य कथं तस्य पापस्य प्रसृतौ करौ । अज्ञानं जातमात्रं त्वां ग्रहीतुं यौवचेतसः ।।१५२।। पश्चिमाया इवाशायाः संध्येवेयं सुता मम । स्थिता स तु परिप्राप्तो मन्दायाः पूर्ववत्सुतः ॥१५३।। ध्रुवं भवान्तरे कोऽपि मया बालो चियोजितः । तदेव फलितं कर्म न कार्य बीजवर्जितम् ॥१५४॥ मारितास्मि न किं तेन पुत्रचोरणकारिणा। परु प्राप्तास्मि यदुःखं समागत्या वैशसम् ॥१५५॥ इति तां कुर्वतीमुच्चैविह्वलां परिदेवनम् । समाश्वासयदागत्य जनको निगदन्निदम् ॥१५६॥ प्रिये मा गाः परं शोकं जीवत्येव शरीरजः । हृतः केनाप्यसौ जीवन् द्रक्ष्यसे ध्रुवमेव हि ॥१५७॥ भार धारण कर जो फल प्राप्त होता है वह पुत्रलाभ रूप ही होता है । सो हे प्रिये ! तुम्हें यह फल अनायास ही प्राप्त हो गया है ।।१४३॥ जो मनुष्य कुक्षिसे उत्पन्न होकर भी पुत्रका कार्य नहीं करता है हे प्रिये! वह अपुत्र ही है अथवा शत्रु ही है ।।१४४॥ हे पतिव्रते! तुम्हारे पुत्र नहीं है • अतः यह तुम्हारा पुत्र हो जायेगा। इस उत्तम वस्तुके भीतर जानेसे क्या प्रयोजन है ? ॥१४५।। तदनन्तर ऐसा ही हो इस प्रकार रानी प्रसूतिकागृहमें चली गयी और प्रातःकाल होते ही इसके पुत्र-जन्मका समाचार लोकमें बड़े हर्षसे प्रकाशित कर दिया गया ॥१४६।। तदनन्तर रथनूपुर नगरमें पुत्रका जन्मोत्सव किया गया । इस उत्सवमें आश्चर्यचकित होते हुए समस्त भाईबन्धु-रिश्तेदार सम्मिलित हुए ॥१४७॥ चूंकि वह बालक रत्नमय कुण्डलोंकी किरणोंके समूहसे घिरा हुआ था इसलिए माता-पिताने उसका भामण्डल नाम रक्खा ॥१४८॥ अपनी लीलाओंसे मनको हरनेवाला तथा समस्त अन्तःपुरके करकमलोंमें भ्रमरके समान संचार करनेवाला वह बालक पोषण करनेके लिए धायको सौंपा गया ॥१४९।। इधर पुत्रके हरे जानेपर कुररीके समान विलाप करती हुई रानी विदेहाने समस्त बन्धुओंको शोकरूपी सागरमें गिरा दिया ।।१५०|| चक्रसे ताड़ित हुईके समान वह इस प्रकार विलाप कर रही थी कि हाय वत्स ! कठोर कार्य करनेवाला कौन पुरुष तुझे हर ले गया है ? ॥१५१॥ जिसे उत्पन्न होते देर नहीं थी ऐसे तुझ अबोध बालकको उठानेके लिए उस निर्दय पापीके हाथ कैसे पसरे होंगे? जान पड़ता है कि उसका हृदय पत्थरका बना होगा ॥१५२।। जिस प्रकार पश्चिम दिशामें आकर सूर्य तो अस्त हो जाता है और सन्ध्या रह जाती है उसी प्रकार मुझ अभागिनीका पुत्र तो अस्त हो गया और सन्ध्याको भाँति यह पुत्री स्थित रह गयी ॥१५३॥ निश्चित ही भवान्तरमें मैंने किसी बालकका वियोग किया होगा सो उसी कमने अपना फल दिखाया है क्योंकि बिना बीजके कोई कार्य नहीं होता ।।१५४॥ पुत्रकी चोरी करनेवाले उस दुष्टने मुझे मार ही क्यों नहीं डाला। जब कि अधमरी करके उसने मुझे बहुत भारी दुःख प्राप्त कराया है ।।१५५।। इस प्रकार विह्वल होकर जोर-जोरसे विलाप करती हुई रानीके पास जाकर राजा जनक यह कहते हुए उसे समझाने लगे कि हे प्रिये ! अत्यधिक शोक मत करो, तुम्हारा पुत्र जीवित ही है, कोई उसे हरकर १. जनः ब. । २. अन्तयानेन म. ज. । ३. पाषाणहृदयस्य । ४. अर्धमरणम् । ५. शरीरजे म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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