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________________ षड्विंशतितमं पर्व नक्तं शक्रया स्थितेनासावुद्याने नमसः पतन् । विद्याभृतेन्दुगतिना ददृशे सुखभाजनम् ॥१३०॥ उडुपातः किमेष स्याद् विद्युत्खण्डोऽथवा च्युतः । वित]ति समुत्पत्य ददृशे पृथुकं शुमम् ॥१३॥ गृहीत्वा च प्रमोदेन देव्याः पुष्पवतीश्रुतेः । वरशय्याप्रसुप्ताया जङ्घादेशे चकार सः ॥१३२॥ ऊचे 'वैतां द्रुतस्वान उत्तिष्ठोत्तिष्ठ सुन्दरि । किं शेषे बालकं पश्य संप्रसूतासि शोमनम् ॥१३३॥ ततः कान्तकरस्पर्शसौख्यसंपत्प्रबोधिता । शय्यातः सहसोत्तस्थौ सा विधूर्णितलोचना ॥१३४॥ अर्भकं च ददर्शातिसुन्दरं सुन्दरानना। तस्यास्तदंशुजालेन निगाशेषो निराकृतः ॥१३५॥ परं च विस्मयं प्राप्ता पप्रच्छ प्रियदर्शना । कयायं जनितो नाथ पुण्यवत्या स्त्रिया शिशुः ॥१३६॥ सोऽवोचदयिते जातस्तवायं प्रवरः सुतः । प्रतीहि संशयं मा गास्त्वत्तो धन्या परा तु का ॥१३७॥ सावोचत्रिय वन्ध्यास्मि कुतो मे सुतसंभवः । प्रतारितास्मि देवेन किं मे भूयः प्रतार्यते ॥१३॥ सोऽवोचद्देवि मा शङका कार्षीः कर्मनियोगतः। प्रच्छन्नोऽपि हि नारीणां जायते गर्मसंभवः ॥१३९।। सावोचदस्तु नामैवं कुण्डले त्वतिचारुणी । ईदृशी मत्यलोकेऽस्मिन् सरत्ने भवतः कृतः ।।१४०॥ सोऽवोचदेवि नानेन विचारेण प्रयोजनम् । शृणु तथ्यं पतन्नेष गगनादाहृतो मया ॥१४॥ मयानुमोदितस्तेऽयं सुतः सुकुलसंभवः । लक्षणानि वदन्त्यस्य महापुरुषभूमिकम् ॥१४२॥ श्रमं कृत्वापि भूयांसं भारमूढवा च गर्मजम् । फलं तनयलामोऽत्र तत्ते जातं सुखं प्रिये ॥१३॥ तदनन्तर चन्द्रगति विद्याधर रात्रिके समय अपने उद्यानमें स्थित था सो उसने आकाशसे पड़ते हुऐ सुखके पात्रस्वरूप उस बालकको देखा ॥१३०।। क्या यह नक्षत्रपात हो रहा है ? अथवा कोई बिजलीका टुकड़ा नीचे गिर रहा है ऐसा संशय कर वह चन्द्रगति विद्याधर ज्योंही आकाश में उडा त्योंही उसने उस शभ बालकको देखा ॥१३॥ देखते ही उसने बड़े हर्षसे उस बालकको बीचमें ही ले लिया और उत्तम शय्यापर शयन करनेवाली पुष्पवती रानीकी जांघोंके बीचमें रख दिया ॥१३२।। यही नहीं, ऊंची आवाजसे वह रानीसे बोला भी कि हे सुन्दरि! उठो, क्यों सो रही हो? देखो तुमने सुन्दर बालक उत्पन्न किया है ।।१३३॥ तदनन्तर पतिके हस्तस्पर्शसे उत्पन्न सुखरूपो सम्पत्तिसे जागृत हो रानी शय्यासे सहसा उठ खड़ी हुई और इधर-उधर नेत्र चलाने लगी ॥१३४॥ ___ ज्योंही उस सुन्दरमुखीने अत्यन्त सुन्दर बालक देखा, त्योंही उसकी किरणोंके समूहसे उसकी अवशिष्ट निद्रा दूर हो गयी ॥१३५।। उस सुन्दरीने परम आश्चर्यको प्राप्त होकर पूछा कि यह बालक किस पुण्यवती स्त्रीने उत्पन्न किया है ? ॥१३६।। इसके उत्तर में चन्द्रगतिने कहा कि हे प्रिये ! यह तुम्हारे ही पुत्र उत्पन्न हुआ है। विश्वास रखो, संशय मत करो, तुमसे बढ़कर और दूसरी धन्य स्त्री कोन हो सकती है ? ॥१३७|| उसने कहा कि हे प्रिय ! मैं तो वन्ध्या हूँ, मेरे पुत्र कैसे हो सकता है ? मैं दैवके द्वारा ही प्रतारित हूँ-ठगी गयी हूँ अब आप और क्यों प्रतारित कर रहे हैं ? ॥१३८।। उसने कहा कि हे देवि! शंका मत करो, क्योंकि कदाचित् कर्मयोगसे स्त्रियोंके प्रच्छन्न गर्भ भी तो होता है ।।१३९॥ रानीने कहा कि अच्छा ऐसा ही सही पर यह बताओ कि इसके कण्डल लोकोत्तर क्यों है? मनष्य लोकमें ऐसे उत्तम रत्न कहांसे आये ? ॥१४०|| इसके उत्तरमें चन्द्रगतिने कहा कि हे देवि! इस विचारसे क्या प्रयोजन है ? जो सत्य बात है सो सुनो। यह बालक आकाशसे नीचे गिर रहा था सो बीचमें ही मैंने प्राप्त किया है ॥१४१।। मैं जिसकी अनुमोदना कर रहा हूँ ऐसा यह तुम्हारा पुत्र उच्चकुलमें उत्पन्न हुआ है क्योंकि इसके लक्षण इसे महापुरुषसे उत्पन्न सूचित करते हैं ॥१४२॥ बहुत भारी श्रम कर तथा गर्भका १. प्रसुप्तायां म. । २. चैतां क. म. । ३. हुतस्वान म.। ४. शोभिनम् म. । ५. भूप म.। ६. त्वति चारिणी म. । ७. मया तु मोदित म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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