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________________ पद्मपुराणे ततो निलठितं सन्तं पापं मण्डितकं ध्रुवम् । नेष्यामि यदहं दुःखं तत्तमेव दुरीहितम् ॥११॥ इति संचिन्तयन् क्रुद्धः पूर्वकर्मानुबन्धतः । देवो रक्षति तं गर्भ संमृदन्पाणिना करम् ॥११९॥ इति ज्ञात्वा क्षमं कर्तुं दुःखं जन्तोर्न कस्यचित् । कालव्यवहितं तद्धि कृतमात्मन एव हि ॥१२०॥ कालेनाथ सुतं देवी प्रसूता युगलं शुमम् । सुतं दुहितरं चान्ते जहार 'पृथुकं सुरः ॥१२१॥ आस्फाल्य मारयाम्येनं शिलायां पूर्वमण्डितम् । इति ध्यातं पुरा तेन पुनरेवमचिन्तयत् ॥१२२॥ धिङ्मया चिन्तितं सर्व संसारपरिवर्धनम् । जायते कर्मणा येन तस्कुर्वीत कथं बुधः ॥२३॥ तृणस्यापि पुरा दुःखं श्रामण्ये न कृतं मया। सर्वारम्भनिवृत्तेन तपोवीवधवाहिना ॥१२४॥ गुरोस्तस्य प्रसादेन कृत्वा धर्म सुनिर्मलम् । ईदृशीं द्युतिमाप्तोऽस्मि करोमि दुरितं कथम् ॥१२५॥ स्वल्पमप्यर्जितं पापं व्रजत्युपचयं परम् । निमग्नो येन संसारे चिरं दुःखेन दह्यते ॥१२६॥ निर्दोषभावनो यस्तु दयावान् सुसमाहितः । स्थितं करतले तस्य रत्नं सुगतिसंज्ञकम् ॥१२७॥ घृणावान् संप्रधाउँदं तमलंकृत्य बालकम् । कुण्डले कर्णयोरस्य चक्रे दीप्तांशुमण्डले ॥१२८॥ पर्णलध्वी ततो विद्यां संक्रमय्य शिशौ सुरः । सुखदेशे विमुच्यैनं गतो धाम मनीषितम् ॥१२९॥ कि यदि गर्भमें ही इसे मारता हूँ तो रानी विदेहा मरणको प्राप्त होगी इसलिए यह युगल सन्तानको उत्पन्न करे पीछे देखा जायेगा। दो गर्भको धारण करनेवाली इस रानीके मारनेसे मुझे क्या प्रयोजन है ? गर्भसे निकलते ही इस पापी कुण्डलमण्डितको अवश्य ही भारी दुःख प्राप्त कराऊँगा ११७-११८|| ऐसा विचार करता हुआ वह असुर पूर्वकर्मके प्रभावसे अत्यन्त ऋद्ध रहने लगा तथा हाथसे हाथको मसलता हुआ उस गर्भकी रक्षा करने लगा ॥११९|| गौतमस्वामी कहते हैं कि राजन् ! ऐसा जानकर कभी किसीको दुःख पहुँचाना उचित नहीं है क्योंकि कालान्तरमें वह दुःख अपने आपको भी प्राप्त होता है ॥१२०॥ ....... अथानन्तर समय आनेपर रानी विदेहाने एक पुत्र और एक पुत्री इस प्रकार युगल सन्तान उत्पन्न की। सो उत्पन्न होते ही असुरने पुत्रका अपहरण कर लिया ॥१२१॥ उसने पहले तो विचार किया कि इस कुण्डलमण्डितके जीवको मैं शिलापर पछाड़कर मार डालूँ। फिर कुछ देर बाद वह विचार करने लगा ॥१२२।। कि मैंने जो विचार किया है उसे धिक्कार है। जिस कार्यके करनेसे संसार ( जन्म-मरण ) की वृद्धि होती है उस कार्यको बुद्धिमान् मनुष्य कैसे कर सकता है ? ||१२३।। पूर्वभवमें मुनि अवस्थामें जब मैं सब प्रकारके आरम्भसे रहित था तथा तपरूपी काँवरको धारण करता था तब मैंने तृणको भी दुःख नहीं पहुंचाया था ।।१२४|| उन गुरुके प्रसादसे अत्यन्त निर्मल धर्म धारण कर मैं ऐसी कान्तिको प्राप्त हुआ हूँ। अतः अब ऐसा पाप कैसे कर सकता हूँ ॥१२५।। संचित किया हुआ थोड़ा पाप भी परम वृद्धिको प्राप्त हो जाता है जिससे संसार-सागरमें निमग्न हुआ यह जीव चिरकाल तक दुःखसे जलता रहता है ॥१२६।। परन्तु जिसकी भावना निर्दोष है, जो दयालु है और जो अपने परिणामोंको ठीक रखता है सुगतिरूपी रत्न उसके करतलमें स्थित रहता है ॥१२७।। ऐसा विचार करके हृदयमें दया उत्पन्न हो गयी जिससे उसने उस बालकको मारनेका विचार छोड़ दिया तथा उसके कानोंमें देदीप्यमान किरणोंके धारक कुण्डल पहनाकर उसे अलंकृत कर दिया ।।१२८॥ तदनन्तर वह देव उस बालकमें पर्णलध्वी विद्याका प्रवेश कराकर तथा उसे सखकर स्थान में छोडकर इच्छित स्थान गया ॥१२९|| १. बालकं 'पोतः पाकोऽभको डिम्भः पृथुकः शावक: शिशुः' इत्यमरः । २. श्रामण्येन म.। ३. तपोविविध -म.. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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