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________________ २६६ पद्मपुराणे रावणस्य हि तत्तल्यो न हितो विद्यते परः । तस्य सर्वोपयोगेन चिन्तनीये स वर्तते ॥१९५॥ उवाचासावहो वृद्धा राजनीरथं व्यवस्थिते । उपक्षिपत कर्तव्यमस्माकमधुनोचितम् ॥१९६॥ विभीषणोदितं श्रुत्वा संमिनमतिरभ्यधात् । अतः परं वदामः किं गतं कार्यमकार्यताम् ।।१९७॥ स्वामिनो दशवक्त्रस्य सहसा दैवयोगतः । दक्षिणः पतितो बाहुः खरदूषणसंज्ञकः ॥१९॥ विराधितोऽपरः कोऽपि कारण यो न कस्यचित् । सोऽयं गोमायुतां मुक्त्वा केसरित्वं समाश्रितः ।।१९९॥ मव्यतां पश्यतामुष्य साधुकर्मोदयादिमाम् । लक्ष्मणस्याहवे यातो बन्धुतां यत्सुचेष्टितः ॥२०॥ एतेऽपि बलिनः सर्वे मानिनः कपिकेतवः। भवन्त्याक्रान्तितो वश्या निभृत्यास्तु न जातुचित् ॥२०१॥ अमीषामन्य आकारो मानसं त्वन्यथा स्थितम् । भुजङ्गानामिवात्यन्तमन्तरे दारुणं विषम् ।।२०२॥ नेता वानरमौलीनामनङ्गकुसुमापतिः । न्यक्षेण भजते पक्षं सुग्रीवस्य मरुत्सुतः ॥२०३॥ ततः पञ्चमुखोऽवोचद्विधायानादरस्मितम् । खरदूषणवृत्तेन गणितेनेह को गुणः ॥२०४॥ वृत्तान्तेनामुना कस्य संत्रासोऽकीर्तिरेव च । भवत्येव हि शूराणामीदशी समरे गतिः ॥२०५।। वातेनापहृते सिन्धोः कणे का न्यूनता भवेत् । रावणस्य बलं स्फीतं किं दूषणसमोहया ॥२०६।। व्रीडां व्रजति मे चेतः कुर्वतः संप्रधारणम् । वायं दशाननः स्वामी क्वान्ये केऽपि वनौकसः ॥२०७॥ सूर्यहासधरेणापि क्रियते लक्ष्मणेन किम् । विराधितः क नामव यस्येच्छामनुवर्तते ॥२०॥ जलसे धुलकर जिसका मन अत्यन्त निर्मल हो गया था तथा जो सब प्रकारके श्रमको सहन करनेवाला था ऐसा विभीषण ही रावणके राष्ट्रका भार धारण करनेवाला था ।।१९४॥ विभीषणके समान रावणका हित करनेवाला दूसरा मनुष्य नहीं था। वह उसके करने योग्य समस्त कार्यों में सर्व प्रकारका उपयोग लगाकर सदा जागरूक रहता था ।।१९५॥ विभीषणने मन्त्रियोंसे कहा कि अहो वृद्धजनो! राजाकी ऐसी चेष्टा होनेपर अब हम लोगोंका क्या कर्तव्य है सो कहो ॥१९६।। विभीषणका कथन सुनकर संभिन्नमति बोला कि इससे अधिक और क्या कहें कि सब कार्य अकार्यताको प्राप्त हो गया है अर्थात् सब कार्य गड़बड़ हो गया है ॥१९७॥ स्वामी दशाननकी दक्षिण भुजाके समान जो खरदूषण था वह दैवयोगसे सहसा नष्ट हो गया ॥१९८॥ वह विराधित नामका विद्याधर जो कि किसीके लिए कुछ भी नहीं था वह आज शृगालपना छोड़कर सिंहपनेको प्राप्त हुआ है ॥१९९॥ पुण्य कर्मके उदयसे प्राप्त हुई इसकी इस भव्यताको तो देखो कि उत्तम चेष्टाओंको धारण करनेवाला यह युद्ध में लक्ष्मणको मित्रताको प्राप्त हो गया ॥२००॥ इधर ये सभी वानरवंशी भी अभिमानी तथा बलवान् हो रहे हैं सो ये आक्रमणसे ही वशमें हो सकते हैं बिना आक्रमणके कभी वशीभूत नहीं हो सकते ॥२०१॥ इनका आकार कुछ दूसरा ही है और मन दूसरे ही प्रकारका स्थित है जिस प्रकार सांपोंके बाह्यमें तो कोमलता रहती है और भीतर दारुण विष रहता है ॥२०२॥ खरदूषणकी पुत्री अनंगकुसुमाका पति हनुमान् इस समय वानर वंशियोंका नेता बन रहा है और वह खासकर सुग्रीवका ही पक्ष लेता है। इस प्रकार संभिन्नमतिके कह चुकनेपर पंचमुख मन्त्री अनादरपूर्वक हंसता हुआ बोला कि यहाँ खरदूषणका वृत्तान्त गिननेसे अर्थात् उसकी मृत्युका सोच करनेसे क्या लाभ है ? ॥२०३-२०४॥ इस वृत्तान्तसे किसे भय तथा किसकी अपकीति है ? अर्थात् किसीकी नहीं क्योंकि युद्ध में शूरवीरोंकी ऐसी गति होती ही है ॥२०५।। वायुके द्वारा समुद्रकी एक कणिका हर लेनेपर समुद्र में क्या न्यूनता आ गयी? अर्थात् कुछ भी नहीं। रावणका बल बहुत है, उसके दोष देखनेसे क्या। ऐसी बात सोचते हुए मेरे मनमें लज्जा आती है। कहाँ यह जगत्का स्वामी रावण और कहाँ अन्य वनवासी ? ॥२०६-२०७।। लक्ष्मण यद्यपि सूर्यहास खड्गको धारण करनेवाला है तो भी उससे क्या और १. भुक्त्वा म.। २. 'वातेनापहृते सिन्धोः कणिकान्यूनता भवेत्' म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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