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________________ षट्चत्वारिंशत्तमं पवं २६७ मृगेन्द्राधिष्ठितारमानमपि काननसंगतम् । दन्दह्यते न किं दावो गिरि परमदुःसहम् ॥२०९॥ सहस्रमतिनामाथ सचिवोऽनन्तरं जगौ । सूचयन् विरसं वाक्यं पूर्व मस्तककम्पनात् ॥२१०॥ मानोद्धतैरिमर्वाक्यैरर्थहोनैः किमीरितैः । मन्त्रणीयं हि संबद्धं स्वामिने हितमिच्छता ॥२१॥ स्वल्प इत्यनया बुद्धया कार्यावज्ञा न वैरिणि । कालं प्राप्य कणो वह्वेर्दहेत् सकलविष्टपम् ॥२१२॥ अश्वग्रीवो महासैन्यः ख्यातः सर्वत्र विष्टपे । स्वल्पेनापि त्रिपृष्ठेन निहतो रणमूर्धनि ॥२१३॥ तस्मात्क्षेपविनिमुक्तमियं परमदुर्गमा । नगरी क्रियतां लङ्का मतिसंदोहशालिभिः ॥२१४॥ सुघोराणि प्रसार्यन्तां यन्त्राण्येतानि सर्वतः । तुङ्गप्राकारकूटेषु दृश्यतां च कृताकृतम् ॥२१५॥ सन्मानर्बहुमिः शश्वत् सेव्यो जनपदोऽखिलः । स्वजनाव्यतिरेकेण दृश्यतां प्रियवादिभिः ॥२५६॥ सर्वोपायविधानेन रक्ष्यतां प्रियकारिभिः । राजा दशाननो येन सुखतां प्रतिपद्यते ॥२१७॥ प्रसाद्यतां सुविज्ञानैमैथिली परमैः प्रियैः । मधुरैर्वचनैर्दानैः क्षीरैरहिवधूरिव ॥२१८॥ सुग्रीवं कैष्कुनगरमन्यांश्च भटपुङ्गवान् । बहिः स्थापयतोद्युक्तालगर्या रक्षकारिणः ॥२१९।। एवं कृते न ते भेदं जानन्ति बहिराहिताः । कार्य नियोगदानाच्च जानन्ति स्वामिनं प्रियम् ॥२२॥ एवं दुर्गतरे जाते कार्य सर्वत्र सर्वतः । को जानाति हृतां सीतां स्थितामत्रापरत्र वा ॥२२१॥ रहितश्चानया रामो ध्रुवं प्राणान् विमोक्ष्यति । यस्येयमीदृशी कान्ता वर्तते विरहे प्रिया ।।२२२॥ रामे च पञ्चतां प्राप्ते शोकविक्लवमानसः । एकाकी क्षुद्रयुक्तो वा सौमित्रिः किं करिष्यति ॥२३॥ विराधित उसकी इच्छानुकूल प्रवृत्ति करता है-उसका मित्र है इससे भी क्या ? ॥२०८॥ क्योंकि बन सहित एक अत्यन्त दुःसह पर्वत यद्यपि सिंहसे सहित हो तो भी क्या उसे दावानल जला नहीं देता? ॥२०९|| तदनन्तर माथा हिलाकर पूर्व कथित वचनोंको नीरस बताता हुआ सहस्रमति मन्त्री बोला कि मानसे भरे इन निरर्थक वचनोंके कहनेसे क्या लाभ है ? स्वामीका हित चाहनेवाले ऐसी मन्त्रणा करनी चाहिए जो प्रकृत बातसे सम्बन्ध रखनेवाली हो ।।२१०-२११।। 'वह छोटा है' ऐसा समझकर शत्रुको अवज्ञा नहीं करनी चाहिए क्योंकि समय पाकर अग्निका एक कण समस्त संसारको जला सकता है ॥२१२॥ बड़ी भारी सेनाका स्वामी अश्वग्रीव समस्त संसारमें प्रसिद्ध था तो भी रणके अग्रभागमें छोटे-से त्रिपृष्ठके द्वारा मारा गया था ॥२१३।। इसलिए बिना किसी विलम्बके इस लंका नगरीको बुद्धिमान् मनुष्योंके द्वारा अत्यन्त दुर्गम बनाया जावे ॥२१४॥ ये महाभयानक यन्त्र सब दिशाओंमें फैला दिये जावें । अत्यन्त उन्नत प्राकारके शिखरोंपर चढ़कर 'क्या किया गया क्या नहीं किया गया' इसकी देख-रेख की जाये ॥२१५॥ अनेक प्रकारके सम्मानोंसे समस्त देशकी निरन्तर सेवा की जाये और मधुर वचन बोलनेवाले राज्याधिकारी सब लोगोंको अपने कुटुम्बीजनोंसे अभिन्न देखें ॥२१६|| प्रिय करनेवाले मनुष्य सब प्रकारके उपायोंसे राजा दशाननको रक्षा करें जिससे वह सुखको प्राप्त हो सके ॥२१७॥ जिस प्रकार दूधके द्वारा सर्पिणीको प्रसन्न किया जाता है उसी प्रकार उत्तम चातुर्य, परम प्रिय मधुर वचनों और इष्ट वस्तुओंके दान द्वारा सीताको प्रसन्न किया जाये ॥२१८॥ किष्कु नगरके स्वामी सुग्रीव तथा नगरीकी रक्षा करने में उद्यत अन्य उत्तम योद्धाओंको नगरके बाहर रखा जावे ॥२१९।। ऐसा करनेपर बाहर रखे हुए सुग्रीवादि अन्तरका भेद नहीं जान सकेंगे और कार्य सौंपा जानेके कारण वे यह समझते रहेंगे कि स्वामी हमपर प्रसन्न है ॥२२०॥ इस तरह जब यहाँका प्रत्येक कार्य सब जगह सब ओरसे अत्यन्त दुर्गम हो जायेगा तब कौन जान सकेगा कि हरी हुई सीता यहाँ है या अन्यत्र है ? ॥२२१॥ सीताके बिना राम निश्चित ही प्राण छोड़ देगा। क्योंकि जिसकी ऐसी प्रिय स्त्री विरहमें रहेगी वह जीवित रह ही कैसे सकेगा ॥२२२॥ जब राम मृत्युको १. विदानेन ख.। २. मुख्यतां ख.. ३. क्षारैरहि-ख. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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