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________________ पद्मपुराणे आसीदनन्तवीर्यस्य मूले मगवतो मया । आत्तमेकं व्रतं साक्षादेवि निर्ग्रन्थसंसदि ॥५५॥ तेन देवेन्द्रवन्द्येन व्याख्यातमिदमीदृशम् । तथा निवृत्तिरेकापि ददाति परमं फलम् ॥५६॥ जन्तूनां दुःखभूयिष्ठभवसन्ततिसारिणाम् । पापान्निवृत्तिरल्पापि संसारोत्तारकारणम् ॥५७॥ येषां विरतिरेकापि कुतश्चिन्नोपजायते' । नरास्ते जर्जरीभूतकलशा इव निर्गुणाः ॥ ५८ ॥ मनुष्याणां पशूनां च तेषा यत् किंचिदन्तरम् । येषां न विद्यते कश्चिद्विरामो मोक्ष कारणम् ॥ ५९ ॥ शक्त्या मुञ्चत पापानि गृह्णीत सुकृतं धनम् । जात्यन्धा इव संसारे न भ्राम्यथ यतश्विरम् ॥ ६० ॥ एवं भगवतो वक्त्रकमलान्निर्गतं वचः । मधु पीत्वा नराः केचिद्गगनाम्बरतां गताः ॥ ६१ ॥ सागारधर्ममपरे श्रिता विकलशक्तयः । कर्मानुभावतः सर्वे न भवन्ति समक्रियाः ||६२|| एकेन साधुना तत्र प्रोक्तोऽहं सौम्यचेतसा । दशानन गृहाणैकां निरृत्तिमिति शक्तितः ॥ ६३|| धर्मरत्नोज्ज्वलद्वीपं प्राप्तः शून्यमनस्करः । कथं व्रजसि विज्ञानी गुणसंग्रह कोविदः || ६४ || इत्युक्तेन मया देवि प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् । देवासुरमहर्षीणां प्रत्यक्षमिति भाषितम् ||६५|| यावन्नेच्छति मां नारी परकीया मनस्विनी । प्रसभं सा मया तावन्नाभिगम्यापि दुःखिना ॥ ६६॥ एतच्चाप्यभिमानेन गृहीतं दयिते व्रतम् । का मां किल समालोक्य साध्वी मानं करिष्यति ॥ ६७ ॥ अतो न तां स्वयं देवि गृह्णामि सुमनोहराम् । सकृजल्पन्ति राजानः प्रत्यवायोऽन्यथा महान् ॥ ६८ ॥ यावन्मुञ्चामि नो प्राणान् तावत् सीता प्रसाद्यताम् । मस्मभावङ्गते गेहे कूपखानश्रमो वृथा ॥ ६९॥ २५६ सर्वांग सुन्दरीको जबदस्ती ग्रहण नहीं करता हूँ इसमें निवेदन करने योग्य कारण है उसे सुनो ||१४|| हे देवि ! मैंने अनन्तवीर्यं भगवान् के समीप निर्ग्रन्थ मुनियोंकी सभा में साक्षात् एक व्रत लिया था || ५५ || इन्द्रोंके द्वारा वन्दनीय अनन्तवीर्यं भगवान्ने एक बार ऐसा व्याख्यान किया कि एक वस्तुका त्याग भी परम फल प्रदान करता है || ५६|| दुःखोंसे भरी भव-परम्परामें भ्रमण करनेवाले प्राणियों के पापसे थोड़ी भी निवृत्ति हो जावे तो वह उनके संसारसे पार होनेका कारण हो जाती है ||५७ || जिन मनुष्योंके किसी पदार्थके त्यागरूप एक भी नियम नहीं है वे फूटे घटके समान निर्गुण हैं ॥ ५८ ॥ उन मनुष्यों और पशुओंमें कुछ भी अन्तर नहीं है जिनके कि मोक्षका कारणभूत एक भी नियम नहीं है ||५९ || हे भव्य जीवो ! शक्तिके अनुसार पाप छोड़ो और पुण्यरूपी धनका संचय करो जिससे जन्मान्ध मनुष्योंके समान चिर काल तक संसार में परिभ्रमण न करना पड़े ||६० || इस प्रकार भगवान् के मुखकमलसे निकले हुए वचनरूपी मकरन्दको पीकर कितने ही मनुष्य निर्ग्रन्थ अवस्थाको प्राप्त हुए और हीनशक्तिको धारण करनेवाले कितने ही लोग गृहस्थधर्मं को प्राप्त हुए सो ठीक ही है क्योंकि कर्मोदयके कारण सब एक समान क्रियाके धारक नहीं होते ।।६१-६२।। उस समय सौम्य चित्तके धारक एक मुनिराजने मुझसे कहा कि हे दशानन ! शक्तिके अनुसार तुम भी एक नियम ग्रहण करो ||६३|| तुम धर्मरूपी उज्ज्वल रत्नद्वीपको प्राप्त हुए हो सो विज्ञानी तथा गुणोंके संग्रह करनेमें निपुण होकर भी खाली मन एवं खाली हाथ क्यों जाते हो ||६४ || इस प्रकार कहनेपर हे देवि ! मैंने मुनिराजको प्रणाम कर सुर-असुर तथा मुनियोंके समक्ष इस तरह कहा कि जबतक मानवती परस्त्री मुझे स्वयं नहीं चाहेगी तबतक दुखी होनेपर भी मैं बलपूर्वक उसका सेवन नहीं करूँगा || ६५-६६ ।। हे प्रिये ! मैंने यह व्रत भी इस अभिमान से ही लिया था कि मुझे देखकर कौन पतिव्रता मान करेगी ? ||६७ || इसलिए हे देवि ! मैं उस मनोहरांगीको स्वयं नहीं ग्रहण करता हूँ क्योंकि राजा एक बार ही कहते हैं अन्यथा बहुत भारी बाधा आ पड़ती है || ६८|| अतः जबतक मैं प्राण नहीं छोड़ता हूँ तबतक सीताको प्रसन्न करो १. कुतश्चित्तूपजायते म । २. गृहीतं म । ३. दिगम्बरताम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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