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________________ २४० पद्मपुराणे समाश्वस्य च सर्वत्र न्यस्य दृष्टिं समाकुलः । दीनं ललाप 'नैराश्याद् भूतेनेवार्तमानसः ।।११३॥ रन्ध्र प्राप्य वने भीमे हा केनास्मि दुरात्मना । हरता जानकी कष्टं हतो दुष्करकारिणा ॥११४॥ दर्शयंस्तामथोत्सृष्टां हरन् शोकमशेषतः । को नाम बान्धवत्वं मे वनेऽस्मिन् परमेष्यति ॥११५।। मो वृक्षाश्चम्पकच्छाया सरोजदललोचना । सुकुमाराहिका भीरुस्वभावा वरगामिनी ॥११६॥ चित्तोत्सवकरी पद्मरजोगन्धिमुखानिला । अपूर्वा यौषिती सृष्टिदृष्टा स्यात् काचिदङ्गना ।।११७॥ कथं निरुत्तरा यूयमित्युक्त्वा तद्गुणहृतः । पुनर्मूर्छापरीतात्मा धरणीतलमागमत् ।।११८॥ समाश्वास्य च संक्रद्धो वज्रावतं महाधनुः । आयोप्यास्फालयन्मुक्त टङ्कारपुरुनिस्वनम् ॥११॥ सिंहानां मीतिजननं नृसिंहः सिंहनिस्वनम् । मुमोच मुहुरत्युग्रमुत्कर्णद्विरदश्रुतम् ।।१२०॥ भूयो विषादमागत्य त्यक्तचापोत्तरीयकम् । उपविश्य प्रमादं स्वं शुशोच फलितं क्षणात् ॥१२१॥ दुःश्रत्य दुर्विमर्शण भजता त्वरितां गतिम् । धर्मधीरिव मूढेन हारिता हा मया प्रिया ॥१२२॥ मानुषत्वं परिभ्रष्टं गहने भवसंकटे । प्राप्तुमत्यद्भुतं भूयः प्राणिनाशुभकर्मणा ॥१२३॥ त्रैलोक्यगणवद्गस्नं पतितं निम्नगापतौ । लभेत कः पुनर्धन्यः कालेन महताप्यलम् ॥१२॥ वनितामृतमेतन्मे कराङ्कस्थं महागुणम् । प्रणष्टं संगतिं भूयः केनोपायेन यास्यति ॥१२५॥ वनेऽस्मिन् जननिमुक्त कस्य दोषः प्रदीयते । नूनं मत्यागकोपेन क्वापि याता तपस्विनी ॥१२६॥ के मरनेपर शोकसे पोड़ित हो निर्जन वनमें पुनः मूर्छाको प्राप्त हो गये ॥११२।। जब सचेत हुए तब सब ओर दृष्टि डालकर निराशताके कारण व्याकूल तथा खिन्न चित्त होकर करुण विलाप करने लगे ॥११३॥ वे कहने लगे कि हाय-हाय भयंकर वनमें छिद्र पाकर कठोर कार्य करनेवाले किसी दुष्टने सीताका हरण कर मुझे नष्ट किया है ।।११४|| अब बिछुड़ी हुई उस सीताको दिखाकर समस्त शोकको दूर करता हुआ कौन व्यक्ति इस वनमें मेरे परम बान्धवपनेको प्राप्त होगा ।।११५।। हे वृक्षो! क्या तुमने कोई ऐसी स्त्री देखी है ? जिसकी चम्पाके फूलके समान कान्ति है, कमलदलके समान जिनके नेत्र हैं, जिसका शरीर अत्यन्त सुकुमार है, जो स्वभावसे भीरु है, उत्तम गतिसे युक्त है, हृदयमें आनन्द उत्पन्न करनेवाली है, जिसके मुखकी वायु कमलकी परागके समान सुगन्धित है तथा जो स्त्रीविषयक अपूर्व सृष्टि है ।।११६-११७।। अरे तुम लोग निरुत्तर क्यों हो? इस प्रकार कहकर उसके गुणोंसे आकृष्ट हुए राम पुनः मूच्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥११८।। जब सचेत हुए तब कुपित हो वजावतं नामक महाधनुषको चढ़ाकर टंकारका विशाल शब्द करते हए आस्फालन करने लगे। उसी समय नरश्रेष्ठ रामने बार-बार अत्यन्त तीक्ष्ण सिंहनाद किया। उनका वह सिंहनाद सिंहोंको भय उत्पन्न करनेवाला था तथा हाथियोंने कान खड़े कर उसे डरतेडरते सुना था ॥११९-१२०।। पुनः विषादको प्राप्त होकर तथा धनुष और उत्तरच्छदको उतारकर बैठ गये और तत्काल ही फल देनेवाले अपने प्रमादके प्रति शोक करने लगे ॥१२१।। हाय-हाय जिस प्रकार मोही मनुष्य धर्मबुद्धिको हरा देता है उसी प्रकार लक्ष्मणके सिंहनादको अच्छी तरह नहीं श्रवण कर विचारके बिना ही शीघ्रतासे जाते हुए मैंने प्रियाको हरा दिया है ॥१२२॥ जिस प्रकार संसाररूपी वनमें एक बार छूटा हुआ मनुष्य भव, अशुभकार्य करनेवाले प्राणीको पुनः प्राप्त करना कठिन है उसी प्रकार प्रियाका पुनः पाना कठिन है। अथवा समुद्र में गिरे हुए त्रिलोको मूल्य रत्नको कौन भाग्यशालो मनुष्य दीर्घकालमें भी पुनः प्राप्त कर सकता है ? ॥१२३-१२४॥ यह महागुणोंसे युक्ता वनितारूपी अमृत मेरे हाथमें स्थित होनेपर भी नष्ट हो गया है सो अब पुनः किस उपायसे प्राप्त हो सकेगा? ॥१२५॥ इस निर्जन वनमें किसे दोष दिया जाये ? जान पड़ता है कि मैं उसे छोड़कर गया था इसी क्रोधसे वह बेचारी कहीं चली गयी है ॥१२६।। १. नेष स्याद् भ. । २. हरं म. । ३. सुकुमाराङ्गिका म. । ४. मुक्तं टङ्कारनिस्वनं म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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