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________________ चतुश्चत्वारिंशत्तम पर्व २३९ रक्षन्निदं व्रतं तस्मात् प्रसादं प्रापयाम्यमुम् । भविष्यत्यनुकूलेयं कालेन मम संपदा ।।९९॥ इति संचित्य तामङ्कात्तले स्वस्मिन्नतिष्ठिपत् । प्रतीक्षते हि तत्कालं मृत्युः कर्मप्रचोदितः ॥१०॥ अथेषुवारिधाराभिराकुलं रणमण्डलम् । प्रविष्टं राममालोक्य सुमित्रातनयोऽगदत् ॥१.१॥ हा कष्टं देव कस्मात् त्वं भूमिमेतामुपागतः । एकाकी मैथिली मुक्त्वा विपिने विघ्नसंकुले ॥१०२॥ तेनोक्तस्त्वद्रवं श्रुत्वा प्राप्तोऽस्मि त्वरयान्वितः । सोऽवोचद् गम्यतां शीघ्रं न साधु भवता कृतम् ॥१०३॥ सर्वथा परमोत्साहो जय स्वं बलिनं रिपुम् । इत्युक्त्वा शङ्कया युक्तो जानकी प्रति चञ्चलः ॥१०४।। क्षणान्निवर्तते यावत् तावत्तत्र न दृश्यते । सीतेति हतवच्छेतो रामश्च्युतममन्यत ॥१०५॥ ही सीत इति भाषित्वा मूच्छितो धरणीमगात् । 'मा तेन परिष्वक्का सा बभव विभषिता ॥१०६॥ संज्ञां प्राप्य ततो दृष्टिं निक्षिपन् वृक्षसंकुले । इति प्रेमपरीतात्मा जगादास्यन्तमाकुलः ॥१०७।। अयि देवि व यातासि प्रयच्छ वचनं द्रुतम् । चिरं किं प्रतिहापेन दृष्टासि तरूमध्यगा ॥१०८॥ एह्यागच्छ-(प्र)-पातोऽस्मि कार्य कोपेन किं प्रिये । जानास्येव चिरं कोपात्तव देवि न मे सुखम् ॥१०९॥ एवं कृतध्वनिम्यिन् मदेशं तं सुगवरम् । गृधं सुसूर्षमैक्षिष्ट कृतककास्वनं शनैः ।।११०॥ ततोऽत्यन्त विषण्णाभा नियमागस्य पक्षिणः । कर्णजापं ददौ प्राप्तस्स तेनामरकायताम् ॥११॥ तस्मिन् कालगने पद्मः शोकातः केवले वने । वियोगदहनव्याप्तः पुनर्मूर्छामशिश्रियत् ॥११२॥ जो परस्त्री मुझे नहीं चाहेगी, मुझपर प्रसन्न नहीं रहेगी मैं उसका उपभोग नहीं करूंगा ॥२८॥ इसलिए इस व्रतकी रक्षा करता हुआ मैं इसे प्रसन्नताको प्राप्त कराता हूँ, सम्भव है कि यह समय पाकर मेरी सम्पदाके कारण मेरे अनुकूल हो जावेगी ॥९९|| ऐसा विचार कर रावणने सीताको गोदसे हटाकर अपने समीप ही बैठा दिया सो ठीक हो है क्योंकि कर्मसे प्रेरित मृत्यु उसके योग्य समयकी प्रतीक्षा करती ही है ॥१०॥ अथानन्तर बाणरूपी जलकी धाराओंसे आकुल युद्ध के मैदानमें रामको प्रविष्ट देख लक्ष्मण ने कहा ।।१०१|| कि हाय देव ! बड़े दुःखकी बात है आप विघ्नोंसे व्याप्त वनमें सीताको अओ.लो छोड़ इस भूमिमें किस लिए आये ? ||१०२।। रामने कहा कि मैं तुम्हारा शब्द सुनकर शीघ्रतासे यहाँ आया हूँ। इसके उत्तरमें लक्ष्मणने कहा कि आप शीघ्र ही चल जाइए, आपने अच्छा नहीं किया ॥१०३।। 'परम उत्साहसे भरे हुए तुम बलवान् शत्रुको सब प्रकारसे जीतो' इस प्रकार कहकर शंकासे यक्त तथा चंचलचितके धारक राम जानकीकी ओर वापस चले गये ॥१०४|| जब गम क्षण-भर में वहाँ वापस लौटे तब उन्हें सीता नहीं दिखाई दी। इस घटनासे रामने अपने वित्तको नष्ट हुआ-सा अथवा च्युत हुआ-सा माना ॥१०५।। हा सीते! इस प्रकार कहकर राम मूच्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़े और भर्ताके द्वारा आलिंगित भूमि सुशोभित हो उठी ।।१०६।। तदनन्तर जब संज्ञाको प्राप्त हुए तब वृक्षोंसे व्याप्त वनमें इधर-उधर दृष्टि डालते हुए प्रेमपूर्ण आत्माके धारक राम, अत्यन्त व्याकुल होते हुए इस प्रकार कहने लगे ॥१०७।। कि हे देवि ! तुम कहाँ चली गयी हो ? शीघ्र ही वचन देओ। चिरकाल तक हँसी करनेसे क्या लाभ है ? मैंने तुम्हें वृक्षोंके मध्य चलती हुई देखा है ।।१०८|| हे प्रिये! आओ-आओ, मैं प्रयाण कर रहा हूँ, क्रोध करनेसे क्या प्रयोजन है ? हे देवि! तुम यह जानती ही हो कि दीर्घकाल तक तुम्हारे क्रोध करनेसे मुझे सुख नहीं होता है ॥१०९।। इस प्रकार शब्द करने तथा गुफाओंसे युक्त उस स्थानमें भ्रमण करते हुए रामने धोरे-धोरे के-के करते हुए मरणोन्मुख जटायुको देखा ॥११०।। तदनन्तर अत्यन्त दुःखित होकर रामने उस मरणोन्मख पक्षोके कानमें णमोकार मन्त्रका जाप दिया और उसके प्रभावसे वह पक्षी देवपर्यायको प्राप्त हुआ ।।१११।। वियोगाग्निसे व्याप्त राम उस पक्षी१. भर्ता म. । २. कोपस्तव म.। ३. काले गते म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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