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________________ २३८ पद्मपुराणे ह्रियमाणामथ प्रेक्ष्य स्वामिनो वनितां प्रियाम् । संरम्भवह्निदीतात्मा समुत्पत्य महाजवः ॥४५॥ तीक्ष्णकोटिमिरत्यन्तं जटायुनखलाङ्गलैः । दाशाननमुरःक्षेत्रं चकर्षासृक्समादितम् ।।८६।। परुषैश्छदनान्तैश्च वातसंपाटितांशुकैः । जवान जवनैर्भूयः सर्वकायमलं बलः ॥७॥ इष्टवस्तुविघातेन रावणः कोपवानथ । हत्वा हस्ततलेनैव महीतलमजीगमत् ॥८८|| ततोऽसौ परुषाघाताद् विकलीभूतमानसः । कुर्वन् केकायितं दुःखी खगो मूर्छामुपागतः ॥८९।। ततो निर्विघ्नमारोप्य पुष्पकं जनकात्मजाम् । जानानः संगतं कामं रावणः स्वेच्छया ययौ ॥९॥ ज्ञात्वापहृतमात्मानं रामरागातिशायनात् । सीता शोकवशीभूता विललापातनिस्वनात् ॥११॥ ततः स्वपुरुषासक्तहृदयां कृतरोदनाम् । दृष्ट्वा सीतामभूत् किंचिद् विरागीय दशाननः ॥१२॥ अचिन्तयच्च मे कास्था कृतेऽन्यस्यैव कस्यचित् । यदियं रौति सक्तासुः करुणं विरहाकुला ॥१३॥ कीर्तयन्तो गुणान् मयः राधूनाममिसंमतान् । पुरुषान्तरसंबन्धानतिशोकपरायणा ॥१४॥ तत्किमेतेन खड्गेन मूढा व्यापादयाम्यमूम् । अथवा न स्त्रियं हन्तुं मम चेतः प्रवर्तते ।।९५।। न प्रसादयितुं शक्यः क्रुद्धः शीघ्रं नरेश्वरः । अभीष्टं लब्धुमथवा द्युतिर्वा कीर्तिरेव वा ॥९६।। विद्या वाभिमता लब्धं परलोकक्रियापि वा । प्रिया वा मनसो भार्या यद्वा किंचित् समीहितम् ॥१७॥ साधनामग्रतः पूर्वे व्रतमेतन्मयार्जितम् । अप्रसना न भोकव्या परस्य स्त्री-मयेति च ॥१८॥ उसकी आत्मा कामको दाहसे दग्ध हो रही थी तथा उसने समस्त धर्मबुद्धिको भुला दिया था ।।८३-८४॥ तदनन्तर स्वामीको प्रिय वनिताको हरी जाती देख जिसकी आत्मा क्रोधाग्निसे प्रज्वलित हो रही थी ऐसा जटाय वेगसे आकाश में उड़कर खुनसे गीले रावणके वक्षःस्थलरूपी खेतको अत्यन्त तीक्ष्ण अग्रभागको धारण करनेवाले नखरूपी हलोंके द्वारा जोतने लगा ॥८५-८६।। तत्पश्चात् अतिशय बलवान् जटायुने वायुके द्वारा वस्त्रोंको फाड़नेवाले कठोर तथा वेगशाली पंखोंके आघातसे रावणके समस्त शरीरको छिन्न-भिन्न कर डाला ||८७।। तदनन्तर इष्ट वस्तुमें बाधा डालनेसे क्रोधको प्राप्त हुए रावणने हस्ततलके प्रहारसे ही जटायुको मारकर पृथ्वीतलपर भेज दिया अर्थात नीचे गिरा दिया।।८८|| तदनन्तर कठोर प्रहारसे जिसका मन अत्यन्त विकल हो रहा था ऐसा दुःखसे भरा जटायु पक्षी के-कें करता हुआ मूच्छित हो गया ।।८९।। तत्पश्चात् बिना किसी विघ्न-बाधाके सीताको पुष्पक विमानपर चढ़ाकर कामको ठीक जाननेवाला रावण इच्छानुसार चला गया ॥९०॥ सीताका राममें अत्यधिक राग था इसलिए अपने आपको अपहृत जान शोकके वशीभूत हो वह आतंनाद करती हुई विलाप करने लगी ॥९१॥ तदनन्तर अपने भर्ता में जिसका चित्त आसक्त था ऐसी सीताको रोती देख रावण कुछ विरक्त-सा हो गया ॥९२।। वह विचार करने लगा कि इसके हृदयमें मेरे लिए आदर ही क्या है यह तो किसी दूसरेके लिए ही करुण रुदन कर रही है उसमें ही इसके प्राण आसक्त हैं तथा उसीके विरहसे आकुल हो रही है ॥९३।। सत्पुरुषोंको इष्ट हैं ऐसे अन्य पुरुष सम्बन्धी गुणोंका बार-बार कथन करती हुई यह अत्यन्त शोकके धारण करने में तत्पर है ।।९४।। तो क्या इस खड्गसे इस मूर्खाको मार डालूँ अथवा नहीं, स्त्रीको मारनेके लिए चित्त प्रवृत्त नहीं होता ॥९५।। अथवा अधीर होनेकी बात नहीं है क्योंकि जो राजा कुपित होता है उसे शीघ्र ही प्रसन्न नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार इष्ट वस्तुका पाना, कान्ति अथवा कीर्तिका प्राप्त करना अभीष्ट विद्या, पारलौकिकी क्रिया, मनको आनन्द देनेवाली भार्या अथवा ओर भी जो कुछ अभिलषित पदार्थ हैं वे सहसा प्राप्त नहीं हो जाते--उन्हें प्राप्त करने के लिए समय लगता ही है ।।९६-९७।। मैंने साधुओंके समक्ष पहले यह नियम लिया था कि १. नखरूपहलैः। २. दशाननस्येदं दाशाननम् । दशानन-म., ख.। ३. निस्वनान् म.। ४. मूढा म.। ५. अभीष्टाल्लभ । अभीष्टलब्ध ज. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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