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________________ २२० पद्मपुराणे चिरान्मामुपनिर्मुक्त श्रमन्त्यास्मिन् वने मया । भवन्तः साधवो दृष्टाः क्षयात् पापस्य कर्मणः ॥१०॥ जनोऽविदितपूर्वो यो जने बध्नाति सौहृदम् । अनाहूतश्च सामीप्यं व्रजति पयोज्झितः ॥१०५।। अनादृतः प्रभूतं च भाषते शून्यमानसः । उत्पादयति विदेषं कस्य नासो क्रमोज्झितः ॥१०६॥ एवंभूतापिनो यावटाणान् सुञ्चामि सुन्दर । तावदधव मामिच्छ दु:खितायां दयां कुरु ।।१०७॥ न्यायेन संगतां साध्वी सर्वोपप्लववर्जिताम् । को वा नेच्छति लोकेऽस्मिन् कल्याणप्रकृतिस्थितिम् ॥१०८॥ श्रुत्वा तद्वचनं तस्यास्त्रपया परिवर्जितम् । परस्परं समालोक्य स्थिती तूष्णी नरोत्तमौ ।।१०९॥ सर्वशास्त्रार्थबोधाम्वुक्षालितं हि तयोर्मनः । कृत्याकृत्यविवेकेषु मलमुक्तं प्रकाशते ॥१०॥ निर्मुक्तदुःखनिश्वासं गच्छामीति तयोदिते । पानामादिभिः सोक्ता यथेष्टं क्रियतामिति ॥१११।। तस्यां प्रयातमात्रायां तदाशालीनताहृतौ । ससीती विस्मितौ वीरौ स्मेरवक्त्रौ बभूवतुः ॥११२॥ अन्तर्हत्य च संक्रुद्धा समुत्पत्य त्वरावती । याता चन्द्रनखा धाम निजं शोकसमाकुला ॥११३॥ शोभधापहृतस्तस्था लक्ष्मणस्तरलेक्षणः । पुनरालोकनाकाक्षो विरहादाकुलोऽभवत् ॥११४॥ उत्थायान्यापदेशेन रामदेवसकाशतः । अटवीं पादपद्माभ्यां बनामान्वेषणातुरः ॥१६५॥ अचिन्तयञ्च खिन्नात्मा वाप्यव्याकुललोचनः । आत्मन्यनादतप्रीतिरिति तत्प्रेमनिर्भरः ॥११६॥ रूपयौवनलावण्यगुणपूर्णा धनस्तनी। मदनाविष्टनागेन्द्र वनितासमगामिनी ॥११७॥ आयान्त्येव सत्ती कस्मादृष्टमात्रा न सा मया । स्तनोपपीडनाश्लेषं परिब्धा हतात्मना ॥११८॥ मैं यद्यपि मृत्युकी इच्छा करती हूँ फिर भी इस महाभयंकर वनमें दुष्ट जीव भी मुझे छोड़ देते हैं ॥१०३।। चिरकालसे इस निर्जन वनमें भ्रमण करती हुई मैंने पापकर्मके क्षयसे आज आप सज्जनोंके दर्शन किये हैं ॥१०४॥ जो पहलेका अपरिचित मनुष्य किसी मनुष्यसे मैत्रीभाव प्रकट करता है, विना बुलाया निर्लज्ज हो उसके पास जाता है तथा बिना आदरके शन्यचित्त हो अधिक भाषण करता है वह क्रमहीन मनुष्य किसे द्वेष नहीं उत्पन्न करता ? ॥१०५-१०६॥ ऐसी होनेपर भी हे सुन्दर ! जबतक मैं प्राण नहीं छोड़ती हूँ तबतक आज ही मुझे चाहो, मेरी इच्छा करो मुझ दुःखिनीपर दया करो ।।१०७।। जो न्यायसे संगत है, साध्वी है, सर्व प्रकारकी बाधाओंसे रहित है, तथा जिसकी कल्याणरूप प्रकृति है ऐसी कन्याको इस संसारमें कौन नहीं चाहता?॥१०८।। राम-लक्ष्मण उसके लज्जाशून्य वचन सुनकर परस्पर एक दूसरेको देखते हुए चुप रह गये ॥१०९॥ समस्त शास्त्रोंके अर्थज्ञानरूपी जलसे धुला हुआ उनका निर्मल मन करने योग्य तथा नहीं करने योग्य कार्यों में अत्यन्त प्रकाशित हो रहा था ॥११०।। दुःख-भरी श्वास छोड़कर जब उसने कहा कि मैं जाती हूँ तब राम आदिने उत्तर दिया कि 'जैसो तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो' ॥१११।। उसके जाते ही उसकी अकुलीनतासे प्रेरित हुए शूरवीर राम-लक्ष्मण सीताके साथ आश्चर्यसे चकित हो हँसने लगे ।।११२।। तदनन्तर शोकसे व्याकुल चन्द्रनखा मनमार क्रुद्ध हो उड़कर शीघ्र ही अपने घर चली गयी ॥११३।। लक्ष्मण उसकी सुन्दरतासे हरे गये थे इसलिए उनके नेत्र चंचल हो रहे थे । वे उसे पुनः देखनेकी इच्छा करते हुए विरहसे आकुल हो गये ॥११४॥ वे किसी अन्य कार्यके बहाने रामके पाससे उठकर चन्द्रनखाकी खोजमें व्यग्र होते हुए पैदल ही वनमें भ्रमण करने लगे॥११५।। जिनका हृदय अत्यन्त खिन्न था, जिनके नेत्र आँसुओंसे व्याप्त थे, जिन्होंने अपने आपके विषयमें प्रकट हुए चन्द्रनखाके प्रेमकी उपेक्षा की थी तथा जो उसके प्रेमसे परिपूर्ण थे ऐसे लक्ष्मण इस प्रकार विचार १. भूतापितो (?) म. ! २. मुञ्चति म.। ३. तस्यः अशालीनता अकुलीनता तया हृतो। ४. उत्थायाज्ञापदेशेन म. । अन्यव्याजेन । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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