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________________ २१९ द्विचत्वारिंशत्तमं पर्व वियोगिनीच्छन्दः अथ राजसुतासमीरितं तद्वाक्यं राघवगोत्रचन्द्रमाः। अनुजानुगतोऽभिनन्दनात् भेजे रम्यभुवं रथालयात् ॥७५।। पूर्व चक्रे लक्ष्मीनाथः स्नपनमभिनवतगजपतिवनपथपरिचितश्रमप्रतिनोदनम् । तस्मादूर्व नानास्वादप्रवरकिसलयकुसुमसमुच्चयमुचितां च परिक्रियाम् ॥७६॥ (?) पश्चात् स्रोतः संसक्तापद्रुमनिवहपरिचलनकरणवरसहितमतुलं विचेष्टितमीप्सितम् । रामेणामा स्नातुं सक्तो विविधजलविहृतिविषयपरमविधिसमुपचितं गुणाकरमानसः ।।७।। पृथ्वीवृत्तम् सफेनवलया लसत्यकटवीचिमालाकुला विमर्दितसितासितारुणपयोजपत्राचिता । समुद्गतकलस्वनातिरहसंगमासेविता समं रघुकुलेन्दुना रतिमिवाकरोदापगा ॥७८॥ वियोगिनीवृत्तम् विनिमज्ज्य सुदरयायिना बिसिनीखण्डतिरोहितात्मना । पुनराशुसमागमाश्रिता रघुपुत्रेण रता नृपात्मजा ॥७९॥ मुक्त्वा नानाकृत्यासंगं कुसुमवनचरणजरजोविराजिगरुभृतम् । गत्वा क्षिप्रं तीरोद्देशं स्वरितकृतविविधरसिताः पुरोगतयोषितः॥४०॥ तेषां द्रष्टं सक्ताः श्रेष्ठामपरविषयगमनरहितं विधाय मनो भृशम् । तिर्यञ्चोऽपि ह्येते रम्यं परुषकृतिरहितमनसां विदन्ति समीहितम् ॥८॥ तो इसके जलमें हम लोग भी क्यों नहीं क्षण-भर क्रीड़ा करें ॥७४॥ तदनन्तर छोटे भाई लक्ष्मणके साथ-साथ रामने सीताके वचनोंका समर्थन किया और सब रथरूपी घरसे उतरकर मनोहर भूमिपर आये ||७५|| सर्वप्रथम लक्ष्मणने नवीन पकड़े हुए हाथीको जंगली मार्गोंके बीच चलनेसे उत्पन्न हई थकावटको दर करनेवाला स्नान करा बाद उसे नाना प्रकारके स्वादिष्ट उत्तमोत्तम कोमल पत्ते और फूलोंका समूह इकट्ठा किया तथा उसकी योग्य परिचर्या को ॥७६॥ तदनन्तर जिनका मन नाना प्रकारके गुणोंकी खान था ऐसे लक्ष्मणने रामके साथ-साथ नदीमें स्नान करना प्रारम्भ किया। वे कभी जलके प्रवाहमें आगे बढ़े हुए वृक्षोंके समूहपर चढ़कर जलमें कूदते थे, कभी अनुपम चेष्टाएँ करते थे और कभी नाना प्रकारकी जलक्रीड़ा सम्बन्धी उत्तमोत्तम विधियोंका प्रयोग करते थे ॥७७|| जो फेनके वलय अर्थात् समूह अथवा फेनरूपी चूड़ियोंसे सहित थी, जो प्रकट उठती हुई तरंगरूपी मालाओंसे युक्त थी, जो मसले हुए सफेद-नीले और लाल कमलपत्रोंसे व्याप्त थी, जिसमें मधुर शब्द उत्पन्न हो रहा था और जो एकान्त समागमसे सेवित थी ऐसी वह नदीरूपी स्त्री ऐसी जान पडती थी मानो रघुकुलके चन्द्र-रामचन्द्रके साथ उपभोग ही कर रही हो ॥७८॥ रामचन्द्रजी पानीमें गोता मार बहुत दूर लम्बे जाकर कमल वनमें छिप गये तदनन्तर पता चलनेपर शीघ्र ही सीता उनके पास जाकर क्रीड़ा करने लगी ॥७९|| पहले जो हंसादि पक्षी अपनी स्त्रियोंके साथ जलमें क्रीड़ा कर रहे थे और कमलोंके वनमें विचरण करनेसे उत्पन्न परागसे जिनके पंख सुशोभित हो रहे थे वे अब शीघ्र ही किनारोंपर आकर नाना प्रकारके मधुर शब्द करने लगे तथा नाना कार्यों की आसक्ति छोड़कर तथा मनको विषयान्तरसे रहित कर राम-लक्ष्मण-सीताकी श्रेष्ठ जलक्रीड़ा देखने Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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