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________________ ११. पद्मपुराणे चतुष्पदिकावृत्तम् अत्र विभाति व्योमगवृन्दं बहुविधजलभववनकृतचरणम् । प्रेमनिबद्धं तारविरावं क्वचिदतिमदवशपरिचितकलहम् ॥६९॥ सैकतमस्या राजति चेदं सवनितखगकुलकृतपदपदवि । त्वजघनस्य प्राप्तसुसमत्वं गतघनसुरपथशशधरवदने ॥७०॥ मत्तमयूरच्छन्दः एषा यातानेकविलासाकुलिताम्बुस्तोयाधीशं वीचिवरभूरतिकान्ता । तद्वच्चारुस्फीतगुणौघं शुमचेष्टं विष्टपसुन्दरमुत्तमशीला मरतेशम् ।।७१॥ रुचिरावृत्तम् इमे प्रिये फलकुसुमैरलंकृतास्तटीरुहो विविधविहङ्गसंकुलाः । निरन्तराः सजलघनौघसंनिभाः इमामिता रतिमिव कर्तुमावयोः ॥७२।। अपरवक्त्रच्छन्दः इति निगदति राघवोत्तमे परमविचित्रपदार्थसंगतम् । प्रमदभरवशंगता सती जनकसुता निजगाद सादरम् ॥७३॥ प्रहर्षिणीवृत्तम् नयेषा विमलजला तरङ्गरम्या हंसाः खगनिवहैः कृताभिलापाः । एतस्यां प्रियतम ते मनोगतं चेत्तोयेऽस्याः किमिति रतिक्षणं न कुर्मः ॥७४॥ है तथा बहाव छोड़कर पाताल तक भरा है ऐसा इस नदीका जल कहीं तो तुम्हारे मनके समान परम गाम्भीर्यको धारण कर रहा है और कहीं भ्रमरोंसे व्याप्त तथा कुछ-कुछ हिलते हुए नील कमलोंसे उत्तम स्त्रीके देखनेसे समत्पन्न नेत्रोंकी शोभा धारण कर रहा है ॥६८|| इधर कहीं जो नाना प्रकारके कमलवनोंमें विचरण कर रहा है. प्रेमसे यक्त है, उच्च शब्द कर रहा है और तीव्र मदसे विवश हो जो परस्पर कलह कर रहा है ऐसा पक्षियोंका समह सुशोभित हो रहा है॥६९।। मेघरहित ओकाशमें विद्यमान चन्द्रमाके समान उज्ज्वल मुखको धारण करनेवाली हे प्रिये ! इधर जिसपर स्त्रियों सहित क्रीड़ा करनेवाले पक्षियोंके समुहने अपने चरण-चिह्न बना रखे हैं ऐसा इस नदीका यह बालुमय तट तुम्हारे नितम्बस्थलकी सदृशता धारण कर रहा है ॥७०॥ जिस प्रकार अनेक उत्तम विलासों-हावभावरूप चेष्टाओंसे सहित तरंगके समान उत्तम भौंहोंसे युक्त एवं उत्तम शीलको धारण करनेवाली सुभद्रा सुन्दर एवं विस्तत गुणसमूहसे युक्त, शुभ चेष्टाओंके धारक तथा संसारमें सर्वसुन्दर भरत चक्रवर्तीको प्राप्त हुई थी उसी प्रकार अनेक विलासोंपक्षियोंके संचारसे युक्त जलको धारण करनेवाली, भौंहोंके समान उत्तम तरंगोंसे युक्त, अतिशय मनोहर यह नदी, अत्यन्त सुन्दर तथा विस्तत गणसमहसे सहित शभ चेष्टासे यक्त एवं जगत्सुन्दर लवणसमुद्रको प्राप्त हुई है ॥७१॥ हे प्रिये! जो फल और फूलोंसे अलंकृत हैं, नाना प्रकारके पक्षियोंसे व्याप्त हैं, निरन्तर हैं तथा जलसे भरे मेघ-समूहके समान जान पड़ते हैं ऐसे ये किनारेके वृक्ष हम दोनोंको प्रीति उत्पन्न करनेके लिए ही मानो इस नदीकूलमें प्राप्त हुए हैं ॥७२।। इस प्रकार जब रामने अत्यन्त विचित्र शब्द तथा अर्थसे सहित वचन कहे तब हर्षित होती हुई सीताने आदरपूर्वक कहा ॥७३।। कि हे प्रियतम ! यह नदी विमल जलसे भरी है, लहरोंसे रमणीय है, हंसादि पक्षियोंके समूह इसमें इच्छानुसार क्रीड़ा कर रहे हैं और आपका मन भी इसमें लग रहा है १. अत्र चतुर्थचरणे छन्दोभङ्गः, पाठस्तूपलब्धपुस्तकेष्वेवं विध एव । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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