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________________ १९२ पपपुराणे शृणु नाथ ! दयाधार! शरणागतवत्सल! । अम्बयाऽहं विना दोषादद्य निर्वासिता गृहात् ॥१९७।। काषायप्रावृता चाहं भवदीयामिमां स्थितिम् । आचरामि प्रसादं मे कुरु नाथानुमोदनात् ॥१९८॥ शुश्रूषां भवतः कृत्वा दिवा नक्तं च सक्तया । इह लोको मया लब्धः परलोकश्च जायते ॥१९९॥ किं तद्धर्मार्थकामेषु न यद्भवति लभ्यते । निधानमसि काम्यानां मया पुण्येन वीक्षितः ॥२०॥ इति संभाषिते तस्याः विज्ञाय प्रगुणं मनः । स्मरेण दह्यमानोऽसावब्रवीदिति विक्लवः ॥२०१॥ मद्रे कोऽहं प्रसादस्य प्रसीद स्वं ममोत्तमे । भजस्व भक्तिमेषोऽहं यावजीवं करोमि ते ॥२०२।। इत्युक्त्वालिङ्गितं क्षिप्रं तं प्रसारितबाहुकम् । अगदीत् पाणिना कन्या वारयन्तीति सादरा ॥२०३॥ न वर्तते इदं कतु कन्याहं विधिवर्जिता । पृच्छ मे मातरं गत्वा गृहेऽस्मिन् दृश्य तोरणे ॥२०॥ परा कारुण्ययुक्तयं भवतः शेमुषो यथा । एतां प्रसादयावश्यं तुभ्यमेषा ददाति माम् ॥२०५॥ एवमुक्तस्तया साकं स्वरया व्याकुलक्रमः । वेश्माविशद्विलासिन्याः सवितर्यस्तमागते ॥२०६॥ 'मन्मथाकृष्टनिःशेषहृषीकविषयो ह्यसौ। किंचिद्वेत्ति स्म नोपायं विशन्वारीमिव द्विषः ॥२०७॥ न शृणोति स्मरग्रस्तो न जिघ्रति न पश्यति । न जानात्यपरस्पर्श न बिभेति न लजते ॥२०८॥ आश्चर्य मोहतः कष्टमनुतापं प्रपद्यते। अन्धो निपतितः कृपे यथा पनगसेविते ॥२०९।। वेश्याचरणयोश्चासौ कृत्वा विलुठितं शिरः । याचते कन्यकां पूर्वसंज्ञितश्चाविशन्नृपः ॥२१॥ ऊपर उठाती, चंचल नील कमलके समान कान्तिके धारक नेत्रोंको धारण करती, कुछ-कुछ दीनताको प्राप्त होती तथा अधरोष्ठको बार-बार हिलाती हुई बोली ॥१९५-१९६॥ कि हे नाथ ! हे दयाके आधार! हे शरणागत वत्सल ! सुनिए, आज मेरो माताने मुझे अपराधके बिना ही घरसे निकाल दिया है ॥१९७॥ सो हे नाथ ! अब मैं गेरुआ वस्त्र धारण कर आपकी इस वृत्तिका आचरण करूंगी, आप अनुमति देकर मुझपर प्रसाद कीजिए ॥१९८॥ रात-दिन आपकी सेवा करनेसे मेरा यह लोक तथा परलोक दोनों ही सुधर जावेंगे ॥१९९॥ धर्म, अर्थ और काममें ऐसा कौन पदार्थ है जो आपके पास प्राप्त न हो सके, आप समस्त मनोरथोंके भाण्डार हैं । पुण्यसे ही आपके दर्शन हुए हैं ।।२००। इस प्रकार कहनेपर उसका मन वशीभूत जान कामसे जलता हुआ तापस व्याकुल होता हुआ इस प्रकार बोला ॥२०१॥ कि हे भद्रे ! प्रसाद करनेके लिए मैं कौन होता हूँ ? हे उत्तम ! तुम्हीं मुझपर प्रसाद करो, स्वीकृत करो, मैं जीवन-पर्यन्त तुम्हारी भक्ति करूंगा ॥२०२॥ ऐसा कहकर उसने आलिंगन करनेके लिए शीघ्र ही अपनी भुजा पसारी तब आदरके साथ उसे हाथसे रोकती हुई कन्याने कहा ॥२०३।। कि यह करना उचित नहीं है, मैं कुमारी कन्या हूँ जिसका तोरण दिखाई दे रहा है, ऐसे इस घरमें जाकर मेरी मातासे पूछो॥२०४॥ आपकी बुद्धिके समान वह परम दयासे युक्त है, उसे प्रसन्न करो, वह अवश्य ही मुझे तुम्हारे लिए दे देगी ॥२०५।। इस प्रकार नागदत्ताके कहनेपर वह सूर्यास्तके अनन्तर अटपटे पैर रखता हुआ उसके साथ वेश्याके घर गया ॥२०६|| जिसके समस्त इन्द्रियोंके विषय कामसे आकृष्ट हो चुके थे, ऐसा वह तापस वारी (बन्धन ) में प्रवेश करनेवाले हाथी के समान कुछ भी उपाय नहीं जानता था ||२०७॥ सो ठीक ही है, क्योंकि कामसे ग्रस्त मनुष्य न सुनता है, न सूंघता है, न देखता है, न दूसरेका स्पर्श जानता है, न डरता है और न लज्जित ही होता है ॥२०८|| जिस प्रकार अन्धा मनुष्य साँपोंसे भरे कुएंमें गिरकर कष्ट और सन्तापको प्राप्त होता है उसी प्रकार यह कामी मनुष्य मोहवश कष्ट और सन्तापको प्राप्त होता है, यह आश्चर्यकी बात है ।।२०९।। तदनन्तर वह तापस वेश्याके चरणोंमें शिर झुकाकर कन्याकी याचना करता है और उसी समय पूर्वसंकेतानुसार राजा प्रवेश करता है ।।२१०।। १. वित्तु वः म. । २. विशारदा म. । ३. पृच्छाव म. । ४. तत्कथा-म. । ५. विशत्वारी म. । दिशन्वारी ख. । ६. आचार्य म. ब. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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