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________________ १९१ एकोनचत्वारिंशत्तमं पर्व अवरुद्धा च सच्चेष्टा मदनेति विलासिनी । पताका मदनेनेव जित्वा लोकमुपार्जिता ॥१८२॥ साधुदत्तमने पाश्च सम्यग्दर्शनमैदसौ। तत्प्राप्येतरतीर्थानि तृणतुल्यान्यमन्यत ।।१८३।। तस्याः पुरोऽथ रहसि कदाचिदवदन्नृपः । अहोऽसौ तापस: स्थानं महतां तपसामिति ॥१८॥ ततो मदनयाऽवाचि कीदृग्नाथेदृशां तपः। मिथ्यादृशामविज्ञानलोकदम्भनकारिणाम् ॥१८५॥ तच्छ्रुत्वा भूपतिस्तस्यै क्रुद्धः सा चागदत् पुनः । मा रुषः पश्य नाथेमं मेऽचिरात्पादवर्तिनम् ॥१८६॥ इत्युक्त्वा स्वगृहं गत्वा शिक्षयित्वा मनोहरम् । आत्मजां नागदत्ताख्यां प्रेषयत्तापसाश्रमम् ॥१८७॥ तस्मै सैकान्तयाताय योगस्थाय सुविभ्रमा । आस्थितामरकन्येव परमाकल्पधारिणी ॥१८८॥ वातेरिताम्बरव्याजादूरूकाण्डमदर्शयत् । मारस्यान्तःपुरस्थानं लावण्यरसनिर्भरम् ॥१८९॥ समाधानोपदेशेन कुङ्कुमद्रवपिञ्जरम् । मारवारणकुम्माभं तथा वक्षसिजद्वयम् ॥१९०॥ कुसुमग्रहणव्याजात् त्रस्तनीविरतेहम् । नामिमण्डलमुत्तेजः कक्षोद्देशं च सुन्दरी ॥१९॥ अज्ञानयोगमेतस्य मित्त्वा लोचनमानसे । अपप्ततां प्रदेशेषु तेषु तस्याः सुबन्धने ॥१९२॥ ताडितः स्मरबाणैश्च समुत्थाय समाकुलः । गत्वा शनैरपृच्छत्तां त्वं बाले कान वर्तसे ।।१९३॥ संध्याकालेऽत्र ये केचित् प्राणिनः भद्रका अपि । आलयं स्वं निषेवन्ते ननु त्वं सुकुमारिका ॥१९॥ साबोचन्मधुरैर्वणः मिन्दन्ती हृदयस्थलीम् । लीलया बाहुलतिकामुन्नयन्ती मुखं प्रति ॥१९॥ चलनोलोल्पलच्छाये धारयन्ती विलोचने । किंचिदन्यमिव प्राप्ता बहुविस्फुरिताघरा ॥१९॥ रतवती उसकी स्त्री थी जो सैकड़ो स्त्रियोंमें प्रधान तथा परम सुन्दरी थी ॥१८१॥ उसी राजाके उत्तम चेष्टाको धारण करनेवाली एक मदना नामको विलासिनी ( वेश्या) स्त्री थी, जो ऐसी जान पड़ती थी मानो संसारको जीतकर कामदेवके द्वारा प्राप्त की हुई पताका ही हो ॥१८२॥ उस मदनाने साधुदत्त मुनिके पास सम्यग्दर्शन प्राप्त किया था जिसे पाकर वह अन्य धर्मोको तृणके समान तुच्छ मानती थी ॥१८३।। अथानन्तर किसी दिन राजाने मदनाके सामने कहा कि अहो! यह तापस महातपोंका स्थान है ॥१८४॥ यह सुन मदनाने कहा कि हे नाथ ! इन मिथ्यादृष्टि, अज्ञानी तथा लोगोंको ठगनेवाले लोगोंका तप कैसा ? ॥१८५॥ यह सुन राजा उसके लिए क्रुद्ध हुआ पर उसने फिर कहा कि हे नाथ ! क्रोध मत कीजिए तथा इसे मेरे चरणोंमें वर्तमान देखिए ॥१८६।। यह कहकर तथा घर जाकर उसने अपनी नागदत्ता नामकी सुन्दरी पुत्रीको सिखाकर उस तापसके आश्रममें भेजा ॥१८७।। ___ सुन्दर हावभाव और उत्तम वेष-भूषाको धारण करनेवाली नागदत्ता देवकन्याके समान जान पड़ती थी। वह एकान्तमें योग लेकर बैठे हुए उस तापसके पास जाकर खड़ी हो गयी॥१८८॥ हवासे हिलते हुए वस्त्रके बहाने उसने कामदेवके अन्तःपुरके समान, सौन्दयं रससे भरे अपने ऊरू दिखाये ॥१८९॥ समाधानके बहाने केशरके द्रवसे पीले तथा कामदेवके गण्डस्थलकी तुलना धारण करनेवाले दोनों स्तन प्रकट किये ॥१९०॥ पुष्प ग्रहणके बहाने नीवी ढीली कर जघन स्थान दिखाया, देदीप्यमान नाभिभण्डल और सुन्दर बगलें भी दिखलायी ॥१९१।। उस तापसके नेत्र और मन अज्ञानपूर्ण योगका भेदनकर उस नागदत्ताके उन-उन प्रदेशोंपर पड़ने लगे तथा वहीं बन्धनसे युक्त हो गये ।.१९२।। तदनन्तर कामके बाणोंसे ताड़ित तपस्वी अत्यन्त व्याकुल होता हुआ उठकर उसके पास गया और धीरे-से उससे पूछने लगा कि हे बाले! तू कौन है ? और यहाँ कहाँ आयी है ?॥१९३॥ इस सन्ध्याके समय छोटे-मोटे प्राणी भी अपने घर रहते हैं फिर तू तो अत्यन्त सुकुमार है ॥१९४॥ नागदत्ता मधुरवोंसे उसका हृदयस्थल भेदती, लोलापूर्वक भुजलताको मुखकी ओर १. समुच्छाय म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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