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________________ एकोनचत्वारिंशतमं पर्व १९३ स्थापितो बन्धयित्वाऽसौ राज्ञा नक्तं समीक्षितः । खलीकारं प्रभाते च प्रकटं प्रापितः परम् ॥२७॥ ततोऽपमाननिर्दग्धः परं दुःखं समुद्वहन् । भ्राम्यन् महीं मृतः क्लेशयोनिषु भ्रमणं स्थितः ॥१२॥ ततः कर्मानुभावेन मनुष्यभवमागतः । दारिदयपङ्कनिर्मग्नं जनादरविवर्जितम् ॥२१३।। गर्भस्थ एव चैतस्मिन् विदेश जनको गतः । उद्वेजितः कुटुम्बिन्या कलहकरवाक्यया ॥२१४॥ कुमारे च हृता माता म्लेच्छेन विषयाहतौ । दुःखं च परमं प्राप्तः सर्वबन्धुविवर्जितः ॥२५॥ ततस्तापसतां प्राप्य कृत्वा बालतपः परम् । ज्योतिर्लोक समारुह्य नाम्ना वह्निमोऽमपत् ॥२१६॥ अनन्तवीर्यनामाथ केवली सेक्तिः सुरैः । इत्यन्तेवासिना पृष्टो धर्मचिन्तागतात्मना ॥२१॥ मुनिसुवतनाथस्य तीथऽस्मिन् भवता समः । कोऽन्योऽनुभविता भव्यो लोकस्योत्तरकारणम् ॥२१८॥ सोऽवोचम्मयि निर्वाणं गतेऽत्र श्रमणक्षितौ । देशभूषण इत्येको द्वितीयः कुलभूषणः ॥२१९।। भवितारौ जगत्सारी केवलज्ञानदर्शिनौ । यो समाश्रित्य लोकोऽयं तरिष्यति भवार्णवम् ॥२६॥ सोऽपि वह्निप्रभस्तस्माच्छ्रुत्वा केवलिनो मुखात् । अवस्थानं निजं यातो दुध्यो केवलिभाषितम् ॥२२॥ अन्यदावधिना ज्ञात्वा योगिनाविह नौ गिरौ । अनन्तवीयसर्वज्ञमिथ्यावाक्यं करोम्यहम् ॥२२॥ एकमुस्वामिमानेन परमेणातिसोहितः । आगतः पूर्ववैरेण कतु परमुपद्रवम् ॥२२३॥ चरमागधरं दृष्ट्वा स भवन्तमतिद्रुतम् । सुरेन्द्र कोपमीत्या च तिरोधानमुपागतः ॥२२४॥ नारायणसमेतेन प्रातिहार्य त्वया कृते । केवलज्ञानमस्माकं जातं घातिपरिक्षये ॥२२५|| राजाने उसे बंधवाकर रात्रि-भर रखा और सवेरे छान-बीनकर सबके समक्ष उसका परम तिरस्कार किया ॥२११।। तदनन्तर अपमानसे जला तापस परम दुःखको धारण करता हुआ पृथ्वीपर भ्रमण करता रहा और अन्तमें मरकर दुःखदायी योनियोंमें भटकता रहा ।।२१२।। तदनन्तर कर्मोके प्रभावसे मनुष्य भवको प्राप्त हुआ सो दरिद्रतारूपी कीचड़में निमग्न तथा लोगोंके आदररो रहित नीच कुलमें उत्पन्न हुआ ।।२१३॥ जब वह गर्भमें था तभी कलहके समय क्रूर वचन कहनेवाली स्त्रीसे उद्विग्न होकर इसका पिता परदेश चला गया था ॥२१४॥ तथा जब वह बालक ही था तभी म्लेच्छोंके द्वारा देशपर आक्रमण होनेसे इसकी माता मर गयी। इस तरह सर्व बन्धुओंसे रहित होकर वह परम दुःखको प्राप्त होता रहा ॥२१५।। तदनन्तर तापस होकर तथा कठिन बालतप कर ज्यौतिष लोकमें अग्निप्रभ नामक देव हुआ ॥२१६॥ अथानन्तर एक समय धर्मकी चिन्तामें जिसका मन लग रहा था ऐसे शिष्यने देवोंके द्वारा सेवित अनन्तवीयं नामा केवलीसे पूछा कि हे नाथ! मनिसुव्रत भगवानके इस तीर्थमें आपके समान ऐसा दूसरा कोन भव्य होगा जो संसार समुद्रसे पार होनेका कारण होगा ॥२१७-२१८॥ तब अनन्तवीर्य केवलीने उत्तर दिया कि मेरे मोक्ष चले जाने के बाद मुनियोंकी इस भूमिमें एक देशभूषण और दूसरा कुलभूषण इस प्रकार दो केवली होंगे । ये जगत्के सारभूत तथा केवलज्ञान और दर्शनके धारक होंगे। इनका आश्रय लेकर भव्यजीव संसार-सागरसे पार होंगे ॥२१९-२२०॥ वह अग्निप्रभदेव केवलोके मुखसे यह सुनकर तथा उन्हींके कथनका ध्यान करता हुआ अपने स्थानपर चला गया ॥२२१।। एक दिन अवधिज्ञानसे वह हम दोनों मुनियों को इस पर्वतपर विद्यमान जानकर 'मैं अनन्तवीर्य सर्वज्ञके वचन मिथ्या करता हैं। इस प्रकार कहकर तीन मोहसे मोहित होता हआ पूर्व वैरके कारण परम उपद्रव करने के लिए यहां आया ॥२२२-२२३॥ सो चरमशरीरी आपको देखकर तथा इन्द्रके क्रोधसे भयभीत हो शीघ्र ही तिरोधानको प्राप्त हुआ अर्थात् भाग गया ॥२२४॥ तुम बलभद्र हो और लक्ष्मण नारायण सो इसके साथ तुमने हमारा उपसर्ग दूर किया अतः धातिया कर्मोका क्षय होनेपर हमें केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है ॥२२५।। इस प्रकार वैर करनेवाले प्राणियोंकी १. देशाघाते सति । २-२५ For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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