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________________ अष्टत्रिंशत्तमं पर्व १७५ वन्यानपि महानागान् गण्डशैलसमत्विषः । विमदीकृतवानस्मि सोऽयमन्य इवामवम् ॥११६॥ अहो वीर्यमहो रूपं सदृशाः शुम ते गुणाः । अहोनुद्धततात्यन्तं प्रश्यश्च तवाद्भुतः ॥११७॥ भाषमाणे गुणानेवं राज्ञि संसद्यवस्थिते । लक्ष्मीधरस्त्रपातोऽभूत् क्वापि यात इव क्षणम् ॥११८॥ अथ लब्धाम्बुदवातघोषभेर्यः समाहताः । राजादेशात् समाध्माताः शङ्खाः संशितवारणाः ॥११९॥ यथेष्टं दीयमानेषु धनेषु परमस्ततः । आनन्दोऽवर्तताशेषनगरक्षोमदक्षिणः ॥१२०॥ ततो लक्ष्मीधरोऽवाचि राज्ञा पुरुषपुङ्गव । त्वया दुहितुरिच्छामि पाणिग्रहणमीक्षितुम् ॥१२१॥ सोऽवोचन्नगरस्यास्य प्रदेशे निकटे मम । ज्येष्टस्तिष्ठति तं पृच्छ स जानाति यथोचितम् ॥१२२॥ ततः स्यन्दनमारोप्य जितपद्मा सलक्ष्मणाम् । सदारबन्धुरभ्याशं प्रतस्थे तस्य सादरः ॥१२३॥ ततः क्षुब्धापगानाथनिर्घोषप्रतिमध्वनिम् । श्रुत्वा वोक्ष्य विशालं च धूलीपटलमुद्गतम् ॥१२॥ जानुन्यस्तमुहुःसस्तकरा कृच्छात्समुत्थिता। सीता जगाद संभ्राता गिरा प्रस्खलिता भुहुः ॥१२५॥ कृतं सौमित्रिणा नूनं राघवोद्धतचेष्टितम् । आशेयमाकुलात्यन्तं दृश्यते कृत्यमाश्रयः ॥१२६॥ आश्लिष्य जानकी देवि मा भैषीरिति शब्दयन् । उत्तस्थौ राधवः क्षिप्रं दृष्टिं धनुषि पातयन् ॥१२७॥ तावच्च नरवृन्दस्य महतः स्थितमग्रतः । सुतारगीतनिस्वानमीक्षांचक्रेऽङ्गनाजनम् ।।१२८॥ क्रमेण गच्छतश्चास्य प्रत्यासत्तिं मनोहराः विभ्रमाः समदृश्यन्त सुदारावयवोस्थिताः ॥१२९॥ नृत्यन्तं च समालोक्य तारनूपुरशिञ्जितम् । विश्रब्धः सीतया साकं पद्मः पुनरूपाविशत् ॥१३०॥ भयंकर युद्धोंमें मदस्रावी कुपित हाथियोंको क्षणभरमें जीता था वह मैं आज तुम्हारे द्वारा जीता गया ॥११५।। जिसने गोल काली चट्टानोवाले पर्वतके समान कान्तिके धारक बड़े-बड़े जंगली हाथियोंको मदरहित किया था वह मैं आज मानो अन्य ही हो गया हूँ॥११६।। धन्य तुम्हारी अनुद्धतता और धन्य तुम्हारी अद्भुत विनय। अहो शोभनीक ! तुम्हारे गुण तुम्हारे अनुरूप ही हैं ।।११७|| इस प्रकार सभामें बैठा राजा शदम जब लक्ष्मणके गुणोंका वर्णन कर रहा था तब लक्ष्मण लज्जाके कारण ऐसे हो गये मानो क्षणभरके लिए कहीं चले ही गये हों ॥११८॥ अथानन्तर राजाकी आज्ञासे मेघसमूहको गर्जनाके समान विशाल शब्द करनेवाली भेरियां बजायी गयीं और हाथियोंकी चिंघाड़का संशय उत्पन्न करनेवाले शंख फूंके गये ॥११९॥ इच्छानुसार धन दिया जाने लगा और समस्त नगरको क्षोभित करनेमें समर्थ बहुत भारी आनन्द प्रवृत्त हुआ ।।१२०।। तदनन्तर राजाने लक्ष्मणसे कहा कि हे श्रेष्ठ पुरुष ! मैं तुम्हारे साथ पुत्रीका पाणिग्रहण देखना चाहता हूँ ॥१२१।। इसके उत्तरमें लक्ष्मणने कहा कि इस नगरके निकटवर्ती प्रदेशमें मेरे बड़े भाई विराजमान हैं सो उनसे पूछो वही ठीक जानते हैं ॥१२२॥ त सहित जितपद्माको रथ पर बैठाकर स्त्रियों तथा भाई-बन्धुओंसे सहित राजा श@दम बड़े आदरके साथ रामके समीप चला ।।१२३।। तदनन्तर क्षोभको प्राप्त हुए समुद्रको गर्जनाके समान जोरदार शब्द सुनकर और उठे हुए विशाल धुलिपटलको देखकर घुटनोपर बार-बार हाथ रखती हुई सीता बडे कष्टसे उठी और घबडाकर स्खलित वाणीमें रामसे बोली कि हे राघव ! जान पडता है लक्ष्मणने कोई उद्धत चेष्टा की है। यह दिशा अत्यन्त आकुल दिखाई देती है इसलिए सावधान होओ और जो कुछ करना हो सो करो ॥१२४-१२६।। तब सीताका आलिंगन कर 'हे देवि ! भयभीत मत होओ' यह कहते तथा शीघ्र ही धनुषपर दृष्टि डालते हुए राम उठे ।।१२७।। इतनेमें ही उन्होंने विशाल नर-समूहके आगे उच्चस्वरसे मंगल गीत गानेवाली स्त्रियोंका समूह देखा ॥१२८।। वह स्त्रियोंका समूह जब क्रम-क्रमसे पास आया तब सुन्दर स्त्रियोंके शरीरसे उत्पन्न होनेवाले मनोहर हाव-भाव दिखाई दिये ।।१२९।। तदनन्तर जिनके नूपुरोंकी जोरदार झनकार १. शंसित म. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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