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________________ १७६ पद्मपुराणे स्त्रियो मङ्गलहस्तास्तं सवालंकारभूषिताः । बुढोकिरेऽतिहारिण्यः समदस्फीतलोचनाः ॥१३१॥ रथादुतीर्य पद्मास्यः सहितो जितपद्मया । पतिः पपात पद्मायाः पद्मस्य चरणौ द्रुतम् ॥१३२॥ पद्मस्य प्रति कृत्वा सीताया अपि सत्रपः । निविश्य नातिनिकटे पद्मस्य विनयी स्थितः ॥ १३३ ॥ नृपाः शत्रुदमाद्याश्च क्रमात्कृत्वा नमस्कृतिम् । पद्मस्य सहसीतस्य यथास्थानमवस्थिताः ॥१३४॥ तत्र संकथया स्थित्वा कुशलप्रश्नपूर्वया । कृते च पुनरानन्दनर्तने पार्थिवैरपि ॥१३५॥ ऋदया परमया युक्तः ससीती लक्ष्मणी बलः । प्रविष्टः स्यन्दनारूडो नगरं प्रमदान्वितः ।। १३६ ।। तत्र लावण्यकिञ्जल्कयोषित्कुवलयाकुले | महाप्रासादसरसि स्वनद्भूषणपक्षिणि ॥१३७॥ नरेभकलमौ सत्यव्रतसिंहध्वनेरलम् । वासान् संकुचितस्वान्ती कुमारश्रीसमन्वितौ ॥१३८॥ शत्रुदमकृतच्छन्दौ किंचित्कालं महासुख । उषितौ सर्वलोकस्य चित्ताह्लादनदायिनी ॥ १३९ ॥ जितपद्म ततो भातां विरहादतिदुःखिताम् । परिसान्त्व्य प्रियैर्वाक्यैर्वनमालामिवादरात् || १४० | पद्मः सीतानुगो भूत्वा निशीथे स्वैरनिर्गतः । यातो लक्ष्मीधरो दत्वा पौराणामधृतिं पराम् ||३४१॥ शार्दूलविक्रीडितम् ये जन्मान्तरसंचितादिसुकृताः सर्वासुमाजां प्रियाः यं यं देशमुपव्रजन्ति विविधं कृत्यं भजन्तः परम् । तस्मिन्सर्वहृ पीकसौख्यचतुरस्तेषां विना चिन्तया मृष्टान्नादिविधिर्भवत्यनुपमो यो त्रिष्टपे दुर्लभः || १४२ || फैल रही थी ऐसी स्त्रियोंके समूहको नृत्य करता देख राम निश्चिन्त हो सीता के साथ पुनः बैठ गये ॥ १३० ॥ अथानन्तर जिनके हाथोंमें मंगल द्रव्य थे, जो सब प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत थीं, अतिशय मनोहर थीं और जिनके नेत्र मदसे फूल रहे थे ऐसी स्त्रियाँ रामके पास आयीं ॥१३१॥ कमलके समान मुखको धारण करनेवाले लक्ष्मण जितपद्मा के साथ रथसे उतरकर शीघ्र ही रामके चरणोंमें जा पड़े ||१३२|| तदनन्तर राम और सीताको प्रणाम कर लजाते हुए लक्ष्मण रामसे कुछ दूर हटकर विनयपूर्वक बैठ गये ||१३३ ॥ शत्रुन्दम आदि राजा भी क्रम क्रमसे राम तथा सीताको नमस्कार कर यथा स्थान बैठ गये || १३४|| कुशल समाचार पूछकर सब वार्तालाप करते हुए सुखसे बैठे तथा राजाओंने आनन्द-नृत्य किया ॥ १३५ ॥ तदनन्तर परम सम्पदा से युक्त तथा हर्षसे भरे राम लक्ष्मण और सीताने रथपर सवार हो नगरमें प्रवेश किया || १३६ || वहाँ राजमहल में पहुँचे । वह राजमहल एक सरोवरके समान जान पड़ता था क्योंकि सौन्दर्यं रूपी केशरसे युक्त स्त्रियों रूपी नील कमलोंसे वह व्याप्त था और शब्द करते हुए आभूषण रूपी पक्षियोंसे युक्त था ॥ १३७ ॥ सत्यव्रत रूपी सिंहकी गर्जनाके भयसे जिनके चित्त अत्यन्त संकुचित रहते थे, जो कुमार लक्ष्मी सहित थे, राजा शत्रुन्दम जिनको इच्छानुसार सब सेवा करता था, जो महा सुखसे सहित थे तथा जो समस्त लोगों के चित्तको आनन्द देनेवाले थे ऐसे नर श्रेष्ठ राम लक्ष्मण उस राजमहल में कुछ समय तक सुखसे रहे ||१३८ - १३९|| तदनन्तर राम अर्धरात्रिके समय सीताके साथ इच्छानुसार राजमहल से बाहर निकल पड़े और लक्ष्मण भी वनमाला के समान विरहसे भयभीत अतिशय दुःखी जितपद्माको प्रिय वचनों द्वारा आदर पूर्वक सान्त्वना दे रामके साथ चले। इन सबके जानेसे नगरवासियोंका धैर्यं जाता रहा ।।१४०-१४१ ॥ गोतमस्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! जिन्होंने जन्मान्तरमें बहुत १. पद्मायाः पतिः = लक्ष्मणः । २. छित्वा म । ३. निखिलप्राणिनाम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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