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________________ १७२ पद्मपुराणे नवयौवनसंपन्ना कलालंकारधारिणी । पुंसोऽपि त्रिदशान् द्वेष्टि मनुष्येषु कथात्र का ॥७॥ उच्चारयति नो शब्दमपि पुल्लिङ्गवर्तिनम् । व्यवहारः समस्तोऽस्याः पुरुषार्थविवर्जितः ॥७५॥ अदः पश्यसि कैलाससदृशं मवन वरम् । अत्र तिष्ठत्यसौ कन्या शतसेवनलालिता।।७६॥ शक्ति यः पाणिना मुक्तां पित्रास्याः सहते नरः । वृणुते तमियं दग्ध-समीहा कृच्छशालिनी ॥७७॥ लक्ष्मीधरः समाकर्ण्य सकोपस्मयविस्मयः । दध्यौ सा कीदृशी नाम कन्या यैवं समीहते ॥७॥ दुष्टचेष्टामिमां तावत्कन्यां पश्यामि गर्विताम् । अहो पुनरभिप्रायः प्रौढोऽयमनया कृतः ॥७९॥ । ध्यायन्निति महोती राजमार्गण चारुणा । विमानामान् महाशब्दान् प्रासादान्विधुपाण्डुरान् ॥८॥ दन्तिनो जलदाकारांस्तुरंगांश्चलचामरान् । बलमीनृत्यशालांश्च पश्यन् मन्थरचक्षुषा ॥१॥ नानानि!हसंपन्नं विचित्रध्वजशोमितम् । शुभ्राभ्रराशिसंकाशं प्राप शबूंदमालयम् ॥४२॥ मास्वद्भक्तिशताकीणं तुङ्गप्राकारयोजितम् । द्वारं तस्य डुढौकेऽसौ शक्रचापामतोरणम् ॥८॥ शस्त्रिवृन्दावृते तस्मिन्नानोपायनसंकुले । निर्गच्छद्भिर्विशनिश्च सामन्तैरतिसंकटे ॥८४॥ द्वाःस्थेन प्रविशन्नेष बभाषे सौम्यया गिरा । कस्त्वमज्ञापितो भद्र विशसि क्षितिपालयम् ॥८५॥ सोऽवोचवष्टुमिच्छामि राजानं गच्छ वेदय । स्वपदेऽन्यमसौ कृत्वा गत्वा राज्ञे न्यवेदयत् ॥८६॥ दिदृक्षुस्त्वां महाराज पुमानिन्दीवरप्रमः । राजीवलोचनः श्रीमान् सौम्यो द्वारेऽवतिष्ठते ।।८७॥ अथवा सर्व शरीरसे लक्ष्मीको जीत लिया है इसलिए यह जितपदा कहलाती है ।।७३।। नवयौवनसे सम्पन्न तथा कलारूपी अलंकारोंको धारण करनेवाली यह कन्या पुंवेदधारी देवोंसे भी द्वेष करती है फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या है ? |७४।। जो शब्द व्याकरणको दृष्टिसे पुंलिंग होता है यह उसका भी उच्चारण नहीं करती है। इसका जितना भी व्यवहार है वह सब पुरुषोंके प्रयोजनसे रहित है ।।७५।। सामने जो कैलास पर्वतके समान बड़ा भवन देख रहे हो उसीमें यह सैकड़ों प्रकारकी सेवाओंसे लालित होती हुई रहती है ॥७६|| जो मनुष्य इसके पिताके हाथसे छोड़ी हुई शक्तिको सहन करेगा उसे ही यह वरेगी ऐसी कठिन प्रतिज्ञा इसने ले रखी है ।।७७॥ यह सुनकर लक्ष्मण क्रोध, गर्व और आश्चर्यसे युक्त हो विचार करने लगे कि वह कन्या कैसी होगी जो इस प्रकारकी चेष्टा करती है ।।७८।। दुष्ट चेष्टासे युक्त तथा गर्वसे भरी इस कन्याको देखू तो सही। अहो! इसने यह बड़ा कठोर अभिप्राय कर रखा है ॥७९॥ इस प्रकार विचार करते हुए लक्ष्मण महावृषभकी नाई सुन्दर चालसे चलकर मनोहर राजमार्गमें आगे बढ़े। वहां वे विमानके समान आभावाले तथा चन्द्रमाके समान धवल उत्तमोत्तम भवनों, मेघोंके समान हाथियों, चंचल चमरोंसे सुशोभित घोड़ों, छपरियों और नृत्यशालाओंको धीमी दृष्टिसे देखते जाते थे ॥८०-८१।। तदनन्तर जो नाना प्रकारके नियूँहोंसे युक्त था, रंगबिरंगी ध्वजाओंसे सुशोभित था, तथा जो सफ़ेद घावलीके समान था ऐसे राजा शत्रंदमके महलपर पहुंचे ॥८२॥ महलका द्वार सैकड़ों देदीप्यमान बेलबूटोंसे सहित था, ऊँचे प्राकारसे युक्त था, और इन्द्रधनुषके समान रंग-बिरंगे तोरणोंसे सुशोभित था ॥८३॥ तदनन्तर जो शस्त्रधारी पहरेदारोंके समूहसे आवृत था, नाना प्रकारके उपहारोंसे युक्त था और जहाँ बाहर निकलते तथा भीतर प्रवेश करते हुए सामन्तोंकी बड़ी भीड़ लग रही थी ऐसे द्वारमें लक्ष्मण प्रवेश करने लगे तो द्वारपालने सौम्यवाणीसे कहा कि हे भद्र ! तू कौन है जो बिना आज्ञा ही राजमहल में प्रवेश कर रहा है ।।८४-८५।। तब लक्ष्मणने कहा कि मैं राजाके दर्शन करना चाहता हूँ सो राजाको खबर दे दो। यह सुन अपने स्थानपर दूसरेको नियुक्त कर द्वारपालने भीतर जाकर राजासे निवेदन किया कि ॥८६॥ हे महाराज ! जो आपके दर्शन करना चाहता है, १. मोहोक्षण न. । महोक्षेति म. 'महावषगतिः' इति 'ज' पुस्तके टिप्पणी। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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