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________________ पञ्चत्रिंशत्तमं पर्व इत्युक्त्वा मोचयित्वा तं कृत्वा लक्ष्मणमग्रतः । सीतयाऽनुगतो रामः कुटीरारिगात्ततः ॥२९॥ धिग्- धिग् नीचसमासङ्गं दुर्वचः श्रुतिकारणम् । मनोविकार करणं महापुरुषवर्जितम् ॥३०॥ वरं तरुतले शीते' दुर्गमे विपिने स्थितम् । परित्यज्याखिलं ग्रन्थं विहृतं भुवने वरम् ॥३१॥ वरमाहारमुत्सृज्य मरणं सेवितुं सुखम् । अवज्ञातेन नान्यस्य गृहे क्षणमपि स्थितम् ॥३२॥ कूलेपु सरितामद्रेः कुक्षिष्वत्यन्तहारिपु । स्थास्यामो न पुनर्भूयः प्रवेक्ष्यामः खलालयम् ॥३३॥ * निन्दन्नेवं खलासङ्गमभिमानं परं वहन् । निर्गत्य ग्रामतः पद्मो वनस्य पदवीं श्रितः ॥ ३४ ॥ घनकालस्ततः प्राप्तो नीलयन्नखिलं नमः । पटुगर्जितसंतानप्रतिनादितगह्वरः ॥ ३५ ॥ ग्रहनक्षत्रपटलमुपगुह्य समन्ततः । सरावविद्युदुद्योतं जहासेव नमःस्फुटम् ॥ ३६ ॥ ग्रीष्मडामरकं घोरं समुत्सार्य घनाघनः । जगर्ज विद्युदङ्गुल्या 'प्रोषितानिव तर्जयन् ॥३७॥ नभोsन्धकारितं कुर्वन् धाराभिनींलतोयदः । अभिषेक्तुं समारेभे सीतां गज इव श्रियम् ॥ ३८ ॥ तिम्यन्तस्ते ततोऽभ्यर्णं पृथुन्यग्रोधपादपम् । उपसत्रुः पुरो गेहसमानस्कन्धमुन्नतम् ॥३९॥ "इभकर्णो गणस्तेषामभिभूतोऽथ तेजसा । गत्वा स्वामिनमित्यूचे नत्वा विन्ध्यर्वनाश्रितम् ॥४०॥ आगत्य नाकतः केऽपि मदीये नाथ सद्मनि । स्थिता यैस्तेजसैवाहं तस्माद्वासितो द्रुतम् ॥४१॥ तद्ववचनं स्मित्वा विनायकपतिः समम् । वधूभिः प्रस्थितो गन्तुं न्यग्रोधं वरलीलया ॥ ४२ ॥ १३५ नहीं हैं, ऐसा कहा गया है ||२८|| इतना कहकर रामने उसे छुड़ाया और लक्ष्मणको आगे कर वे सीता सहित उस ब्राह्मणकी कुटियासे बाहर निकल आये ||२९|| 'जो दुर्वचन सुननेका कारण है, मनमें विकार उत्पन्न करनेवाला है और महापुरुष जिसे दूरसे ही छोड़ देते हैं ऐसी नीच मनुष्यों की संगतिको धिक्कार है ||३०|| शीत ऋतुके समय दुर्गम वनमें वृक्षके नीचे बैठा रहना अच्छा है, समस्त परिग्रह छोड़कर संसार में भ्रमण करते रहना अच्छा है और आहार छोड़कर सुखपूर्वक मर जाना अच्छा है परन्तु तिरस्कार के साथ दूसरेके घर में एक क्षण भी रहना अच्छा नहीं है || ३१ - ३२ || 'हम नदियोंके तटों और पर्वतोंकी अतिशय मनोहर गुफाओंमें रहेंगे परन्तु अब फिर दुर्जनों घरमें प्रवेश नहीं करेंगे' इस प्रकार दुर्जन संसर्गकी निन्दा करते तथा परम अभिमानको धारण करते हुए रामने गाँवसे निकलकर वनका मार्ग लिया ||३३-३४॥ तदनन्तर समस्त आकाशको नीला करता और तीव्र गर्जनाके समूहसे गुफाओंको प्रतिध्वनित करता हुआ वर्षा काल आया || ३५ ॥ उस समय ग्रह और नक्षत्रोंके पटलको सब ओर से छिपाकर कड़कती हुई बिजलीके प्रकाशके बहाने आकाश ऐसा जान पड़ता था मानो हँस ही रहा हो ||३६|| ग्रीष्म कालके भयंकर विस्तारको दूर हटाकर मेघ गरज रहा था और बिजलीरूपी अंगुली द्वारा ऐसा जान पड़ता था मानो प्रवासी मनुष्योंको डांट ही दिखा रहा हो ||३७|| धाराओं के द्वारा आकाशको अन्धकारयुक्त करता हुआ श्यामल मेघ, सीताका अभिषेक करनेके लिए उस तरह तैयार हुआ जिस तरह हाथी लक्ष्मीका अभिषेक करनेके लिए तैयार होता है ||३८|| तदनन्तर वे भीगते हुए एक निकटवर्ती ऐसे विशाल वटवृक्षके नीचे पहुँचे कि जिसका स्कन्ध घरके समान सुरक्षित था तथा जो अत्यन्त ऊँचा था ||३९|| अथानन्तर उनके तेजसे अभिभूत हुआ इभकर्णं नामका यक्ष, विन्ध्याचल के वन में रहनेवाले अपने स्वामी के पास जाकर तथा नमस्कार कर इस प्रकार बोला कि हे नाथ! स्वर्गसे आकर कोई ऐसे तीन महानुभाव मेरे घरमें ठहरे हैं जिन्होंने अपने जसे अभिभूत कर मुझे शीघ्र ही घरके बाहर कर दिया है || ४०-४१ || इभकर्णके वचन सुनकर मन्द हास्य करता हुआ यक्षराज, अपनी १. सीते म., ब. । २. भावे क्तः, विहरणमित्यर्थः । ३. सेविते म । ४. निन्दन्नेव म. । ५. प्रेषितामिव म. । ६. इभकर्णनामधेयो यक्षः । ७. भूतोऽपि ब., म. । ८. विन्ध्यमुपाश्रितम् । For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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