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________________ त्रयस्त्रिशत्तमं पर्व १२३ लक्ष्मीधरस्ततोऽवोचद् दारसङ्गं करोम्यहम् । न तावन्न कृतं यावत् पदं भुजबलार्जितम् ॥३१५॥ पद्मश्च तानुवाचैवं नास्माकं वसतिः कचित् । भरतस्याधिराज्येऽस्मिन् देशे स्वर्गतलोपमे ॥३१६॥ देशान् सर्वान् समुल्लङ्घय करिष्याम्यालयं ततः । आश्रित्य चन्दनगिरि दक्षिणार्णवमेव वा ॥३१७॥ एका वेलामिह ततो जनन्यौ नेतुमुत्सुके । आगन्तव्यं मयावश्यं द्रागयोध्यामनेन वा ॥३१८॥ काले तत्रैव नेष्यन्ते कन्यका अपि भो नृपाः । अज्ञातनिलयस्यास्य कीदृशो दारसंग्रहः ॥३१९॥ एकमुक्ते कुमारीणां तवृन्दं शुशुभे न च । आकुलं पङ्कजवनं हिमवाताहतं यथा ॥३२०॥ प्रियस्य विरहे प्राणान् त्यक्ष्यामो यदि तत्पुनः । अवाप्स्यामः कुतोऽनेन समागमरसायनम् ॥३२१॥ प्राणांश्च धारयन्तीनां कैतवं मन्यते जनः । दयते च समिद्धेन मनो विरहवह्निना ॥३२२॥ सुमहान भृगुरेकत्र व्याघ्रोऽन्यत्रातिदारुणः । अहो कष्ट कमाधारं व्रजामोऽत्यन्तदुस्सहाः ॥३२३॥ अथवा विरहव्याघ्र संगमाशयविद्यया । संस्तम्भ्य धारयिष्यामः शरीरमिति सांप्रतम् ॥३२४॥ एवं विचिन्तयन्तीभिः सार्ध तामिमहीभृतः । गता यथागतं कृत्वा रामादीनां यथोचितम् ॥३२५॥ सच्चेष्टाः पूज्यमानास्तां पितृवर्गण कन्यकाः । नानाविनोदनासक्तास्तस्थुस्तद्गतमानसाः ॥३२६॥ आनायितः पिता भूत्या सबन्धुदेशमात्मनः । विद्युदङ्गेन चक्रे च परमः सङ्गमोत्सवः ॥३२७॥ परमेऽथ निशीथे 'ते नत्वा चैत्यालयात्ततः । शनैर्निर्गत्य पादाभ्यां स्वेच्छया सुधियो ययुः ॥३२८॥ चैत्यालयं प्रमाते तं दृष्ट्वा शून्यं जनोऽखिलः । रहिताशेषकर्तव्यो वितानहृदयस्थितः ॥३२९॥ तदनन्तर उसके उत्तरमें लक्ष्मणने कहा कि मैं जबतक अपने बाहुबलसे अजित स्थान प्राप्त नहीं कर लेता हूँ तबतक स्त्री समागम नहीं करूंगा ॥३१५॥ रामने भी उनसे इसी प्रकार कहा कि अभी हमारा कहीं निश्चित निवास नहीं है। स्वर्गके समान भरतके. राज्यमें जो देश हैं उन सबको पार कर हम मलयगिरि अथवा दक्षिण समुद्रके पास अपना घर बनवावेंगे। वहाँ उत्कण्ठासे भरी अपनी माताओंको ले जानेसे लिए एक बार हम अथवा लक्ष्मण अवश्य ही अयोध्या आवेंगे। हे राजाओ! उसी समय आपकी इन कन्याओंको ले आवेंगे। तुम्हीं कहो जिसके रहनेका ठिकाना नहीं उसका स्त्री-संग्रह कैसा ?॥३१६-३१९॥ इस प्रकार कहनेपर वह कन्याओंका समूह तुषार वायुसे आहत कमलवनके समान आकुल होता हुआ शोभित हुआ ॥३२०।। कन्याएँ विचार करने लगी कि यदि हम पतिके विरहमें प्राण छोड़ देगी तो फिर इसके साथ समागमरूपी रसायनको कैसे प्राप्त कर सकेंगी? ॥३२१|| और यदि प्राण धारण करती हैं तो लोग कपट मानते हैं तथा देदीप्यमान विरहानलसे मन जलता है ॥३२२॥ अहो ! एक ओर तो बड़ी भारी ढालू चट्टान है और दूसरी ओर अत्यन्त निर्दय व्याघ्र है। अतः अत्यन्त दुखसे भरी हुई हम किस आधारको प्राप्त हों ? ॥३२३॥ अथवा इस समय हम समागमकी अभिलाषारूपी विद्यासे विरहरूपी व्याघ्रको कीलकर शरीर धारण करेंगी ॥३२४|| इस प्रकार विचार करती हुई उन कन्याओंके साथ राजा लोग राम आदिका यथोचित सत्कार कर जैसे आये थे वैसे चले गये ॥३२५॥ जिनकी उत्तम चेष्टा थी, पितृवर्ग जिनका निरन्तर सत्कार करता था और जो नाना प्रकारके विनोदमें आसक्त थीं ऐसी कन्याएं लक्ष्मणमें मन लगाकर रह गयीं ॥३२६॥ तदनन्तर विद्युदंगने भाई-बान्धवोंसे सहित पिताको बड़े ठाट-बाटसे अपने देशमें बुलाया और पहुँचनेपर उनके समागमका बहुत भारी उत्सव किया ॥३२७॥ ___अथानन्तर बुद्धिमान् राम-लक्ष्मण सीताके साथ-साथ घनघोर आधी रातके समय भगवान्को नमस्कार कर चुपके-चुपके चैत्यालयसे निकलकर इच्छानुसार पैदल चले गये ॥३२८॥ प्रभात होनेपर चैत्यालयको शून्य देख सब लोग अपना-अपना कर्तव्य भूलकर शून्य हृदय हो गये ॥३२९।। १. रामादयः । २. शून्यहृदयः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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