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________________ १२२ पद्मपुराणे नियमस्त्वत्प्रसादेन ममायं जीवतोऽधुना । पालितो मम भाग्येन त्वमानीतो नरोत्तमः ॥३०१॥ वदन्नेवमसा ऊचे रक्ष्मणेन विचक्षणः । वदाभिरुचितं यत्ते क्षिप्रं संपादयाम्यहम् ॥३०२॥ सोऽवोचत् सुहृदं प्राप्य भवन्तमतिदुर्लभम् । न किंचिदस्ति लोकेऽस्मिन्निदं तु प्रवदाम्यहम् ॥३०३॥ तृणस्यापि न वाञ्छामि पीडां जिनमताश्रितः । अतो विमुच्यतामेष मम सिंहोदरप्रभुः ॥३०४॥ इत्युक्त लोकवक्त्रेभ्यः साधुकारः समुद्ययौ । प्राप्तद्वेषेऽपि पश्यायं मतिं धत्ते शुभामिति ॥३०५॥ अपकारिणि कारुण्यं यः करोति स सजनः। मध्यो कृतोपकारे वा प्रीतिः कस्य न जायते ॥३०६॥ एवमस्त्विति भाषित्वा लक्ष्मणेन तयोः कृता । हस्तग्रहणसंपन्ना प्रीतिः समयपूर्विका ॥३०७॥ उज्जयिन्या ददावधं वज्रकर्णाय शुद्धधीः । सिंहोदरो हृतं पूर्व विषयोद्वासने च यत् ॥३०८॥ चतुरङ्गस्य देशस्य गणिकानां धनस्य च । विमागं समभागेर निजस्याप्यकरोदसौ ॥३०९॥ वाहद्गतप्रसादेन तां वेश्यां तच्च कुण्डलम् । लेभे सेनाधिपत्यं च विद्युदङ्गः सुविश्रुतः ॥३१०॥ वज्रकर्णस्ततः कृत्वा रामलक्ष्मणयोः पराम् । पूजामानाययक्षिप्रमष्टौ दुहितरो वराः ॥३११॥ सजायो दश्यते ज्यायानिति तास्तेन दौकिताः । लक्ष्मीधरं कृतोदारविभूषाविनयान्विताः ॥३१२॥ नृपाः सिंहोदराद्याश्च ददुः परमकन्यकाः । एवं सन्निहितं तस्य कुमारीणां शतत्रयम् ॥३१३॥ ढौकित्वा वज्रकर्णस्ताः समं सिंहोदरादिभिः। जगाद लक्ष्मणं देव तवैता वनिता इति ॥३१४॥ तो भी हे महाभाग ! आप मेरे परम बान्धव हुए हैं ।।२९९-३००। इस समय मेरे जीवित रहते हुए मेरे इस नियमका पालन आपके ही प्रसादसे हुआ है और मेरे भाग्यसे ही आप पुरुषोत्तम यहां पधारे हैं ॥३०१।। इस प्रकार कहते हुए बुद्धिमान् वज्रकर्णसे लक्ष्मणने कहा कि जो तेरी अभिलाषा हो वह कह मैं शीघ्र ही पूर्ण कर दूं ॥३०२।। यह सुनकर वज्रकर्णने कहा कि आप-जैसे अत्यन्त दुर्लभ मित्रको पाकर इस संसारमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है। अतः मैं यह प्रार्थना करता हूँ कि मैं जिनमतका धारक होनेसे यह नहीं चाहता हूँ कि तृणको भी पीड़ा हो। इसलिए यह मेरा स्वामी राजा सिंहोदर छोड़ दिया जाये ||३०३-३०४|| वज्रकर्णके इतना कहते ही लोगोंके मुखसे 'धन्य-धन्य' शब्द निकल पड़ा। देखो यह भद्र पुरुष शत्रुके ऊपर भी शुभ बुद्धि धारण कर रहा है ॥३०५॥ अपकारीके ऊपर जो दया करता है वही सज्जन है। वैसे मध्यस्थ अथवा उपकार करनेवालेपर किसे प्रेम उत्पन्न नहीं होता ॥३०६॥ तदनन्तर 'एवमस्तु' कह लक्ष्मणने हाथ मिलाकर तथा कभी शत्रुता नहीं करेंगे, इस प्रकार शपथ दिलवाकर दोनोंकी मित्रता करा दी ॥३०७॥ निर्मल बुद्धिके धारक सिंहोदरने उज्जयिनीका आधा भाग तथा देशको उजाड़ करते समय जो कुछ पहले हरा था वह सब वजकर्णके लिए दे दिया ॥३०८।। अपनी चतुरंग सेना, देश, गणिका तथा धनका भी उसने बराबर-बराबर आधा भाग कर दिया ॥३०९॥ जिनभक्तिके प्रसादसे अतिशय प्रसिद्ध विद्युदंगने भी वह वेश्या, वह रत्नमयी कुण्डल और सेनापतिका पद प्राप्त किया ॥३१०॥ तदनन्तर वज्रकणंने राम-लक्ष्मणकी परम पूजा कर शीघ्र हो अपनी आठ पुत्रियाँ बुलवायीं ।।३११।। चूंकि बड़े भाई राम स्त्रीसे सहित दिखाई देते थे इसलिए उसने उत्तम आभूषणोंको धारण करनेवाली तथा विनयसे युक्त अपनी पुत्रियाँ लक्ष्मणको व्याह दीं ॥३१२।। इनके सिवाय सिंहोदर आदि राजाओंने भी उत्तमोत्तम कन्याएँ दीं। इस तरह सब मिलाकर लक्ष्मणको तीन सौ कन्याएँ प्राप्त हुई ॥३१३॥ उन सबको खड़ी कर वज्रकर्णने सिंहोदर आदि राजाओंके साथ लक्ष्मणसे कहा कि हे देव ! ये आपकी स्त्रियाँ हैं ।।३१४॥ १. जीविताधना क., ख., ज.। २. पालिता क.। ३. भागेन म.। ४. शुचिश्रुतः म.। ५. 'तव ज्यायान् ज्येष्ठो भ्राता रामः सजायो सवल्लभो दृश्यते अतस्त्वमपि सजाया भव' इति निर्दिश्य तेन ता दुहितरो लक्ष्मणं प्रापिता इति भावः। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org |
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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