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________________ त्रयस्त्रिशत्तम पर्व ११३ जिनशासनवर्गेण सदावष्टब्धमानसः । ऐश्वर्यकण्टकस्त्वं मे जातः सद्भाववर्जितः ॥१७॥ कुटुम्बभेदने दक्षः श्रमणैर्दुविचेष्टितैः । प्रोत्साहितो गतोऽस्येतामवस्थां नयवर्जितः ॥१७॥ भुझे देशं मया दत्तमहन्तं च नमस्यति । अहो ते परमा माया जातेयं दुष्टचेतसः ॥१७२॥ आगच्छाशु ममाभ्याशं प्रणामं कुरु संमतिः । अन्य था पश्य' यातोऽसि मृत्युना सह संगतम् ॥१७३॥ ततस्तद्वचनाद्गत्वा दूतोऽवददिदं पुनः । एवं वज्रेश्रुति थ ब्रवीति कृतनिश्चयः ।।१७४॥ नगरं साधनं कोषं गृहाण विषयं विभो । धर्मद्वारं सभार्यस्य यच्छ मे केवलस्य वा ॥१७५॥ कृता मया प्रतिज्ञेयं मुञ्चास्येनां मृतोऽपि न । द्रविणस्य भगवान् स्वामी शरीरस्य तु नो मम ॥१७६॥ इत्युक्तोऽध्यपरित्यक्तक्रोधः सिंहोदरः पुरः । कृत्वा रोधमिमं देशमुदैवासयदुज्ज्वलम् ॥१७७॥ इदं ते कथितं देव देशोद्वासनकारणम् । गच्छामि सांप्रतं शून्य प्रामधानमितोऽन्तिकम् ॥१७८॥ तस्मिन् विमानतुल्येषु दह्यभानेषु सद्मसु । मदीया दुष्कुटी दग्धा तृणकाष्ठविनिर्मिता ॥१७९॥ तत्र गोपायितं सूपं घटं पिठरमेव च । आनयामि कुगहिन्या प्रेरितः करवाक्यया ॥१८॥ गृहोपकरणं भूरि शून्यग्रामंपु लभ्यते । आनयस्व त्वमेवेति सा तु मां भाषते मुहः ॥१८॥ अथवात्यन्तमेवेदं तया में जनितं हितम् । देव कोऽपि भवान् इष्टो मया येन सुकर्मणा ॥१८२॥ इत्युक्ते करुणाविष्टः पथिक वीक्ष्य दुःखितम् । पद्मोऽस्मे रत्नसंयुक्तं ददौ काञ्चनसूत्रकम् ॥१८३॥ प्रतीतः प्रणिपत्यासौ तदादाय स्वरान्वितम् । प्रतियातो निजं धाम बभूव च नृपोपमः ॥१८४॥ बोला ॥१६९।। कि जिन शासनके वर्गसे जिसका मन सदा अहंकारपूर्ण रहता है तथा जो समीचीन भावोंसे रहित है ऐसा तू मेरे ऐश्वर्यका कण्टक बन रहा है ।।१७०॥ कुटुम्बोंके भेदन करनेमें चतुर, तथा खोटी चेष्टाओंसे युक्त मुनियोंके द्वारा प्रोत्साहित होकर तू इस अवस्थाको प्राप्त हुआ है, स्वयं नीतिसे रहित है ॥१७१।। मेरे द्वारा प्रदत्त देशका उपभोग करता है और अरहन्तको नमस्कार करता है। अहो, तुझ दुष्ट हृदयको यह बड़ी माया ॥१७२।। तू सुवुद्धि है अतः शीघ्र ही मेरे पास आकर प्रणाम कर अन्यथा देख, अभी मृत्यके साथ समागमको प्राप्त होता है ||१७३|| तदनन्तर वज्रकर्णका उत्तर ले दूतने वापस जाकर सिंहोदरसे कहा कि हे नाथ ! निश्चयको धारण करनेवाला वज्रकर्ण इस प्रकार कहता है कि हे विभो! नगर, सेना, खजाना और देश सब कुछ ले लो पर भार्या सहित केवल मुझे धर्मका द्वार प्रदान कीजिए अर्थात् मेरी धर्माराधनामें बाधा नहीं डालिए ॥१७४-१७५।। मैंने जो यह प्रतिज्ञा की है कि मैं अरहन्त देव और निर्ग्रन्थ गुरुको छोड़ अन्य किसीको नमस्कार नहीं करूँगा सो मरते-मरते इस प्रतिज्ञाको नहीं छोड़ें गा। आप मेरे धनके स्वामी हैं शरीरके नहीं ॥१७६।। इतना कहनेपर भी सिंहोदरने क्रोध नहीं छोड़ा और नगरपर घेरा डालकर तथा आग लगाकर इस देशको उजाड़ दिया व! मैंने आपसे इस देशके उजड होनेका कारण कहा है अब यहाँ पास ही अपने उजड़े गाँवको जाता हूँ ॥१७८।। उस गाँवमें विमानके तुल्य जो अच्छे-अच्छे महल थे वे जल गये और उनके साथ तृण तथा काष्ठसे निर्मित मेरी टूटी-फूटी कुटिया भी जल गयी ॥१७९|| उस कुटिया में एक जगह सूपा घट तथा मटका छिपाकर रखे थे सो दुष्ट वचन बोलनेवाली स्त्रीसे प्रेरित हो उन्हें लेने जा रहा हूँ ॥१८०॥ 'सूने गाँवोंमें घर-गृहस्थीके बहुत-से उपकरण मिल जाते हैं इसलिए तू भी उन्हें ले आ' इस प्रकार वह बार-बार मुझसे कहती रहती है ।।१८१।। अथवा उसने मेरा यह बहुत भारी हित किया है कि हे देव ! पुण्योदयसे मैं आपके दर्शन कर सका १८२।। इस प्रकार उस पथिकको दुःखी देख दयासे स्वयं दुःखी होते हुए रामने उसके लिए अपना रत्नजटित स्वर्णसूत्र दे दिया ।।१८३।। १. पश्य जातोऽसि मृत्युना सहसंगतः ज., ब.। २. वज्रकर्णः। ३. जनरहितमकरोत् । २-१५ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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