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________________ ११४ पद्मपुराणे अथावोचत्ततः पद्मो'लक्ष्मणाय दिवाकरः । नैदाघो यावदत्यन्तं दुस्सहत्वं न गच्छति ॥१८५॥ तावदुत्तिष्ठ गच्छावः पुरस्यास्यान्तिकं भुवम् । जानकीयं तृषाश्रान्ता कुर्वाहारविधि द्रुतम् ॥१८६॥ एवमित्युदिते यातां दशाङ्गनगरस्य ते । समीपे चन्द्रभासस्य चैत्यालयमनुत्तमम् ॥१८७॥ तस्मिन् सजानकीरामः प्रणम्यावस्थितः सुखम् । तदाहारोपलम्भाय लक्ष्मणः सधनुगतः ॥१८८॥ विशन् सिंहोदरस्यासौ शिबिरं रक्षिमानवैः । निरुद्धः कृत निस्वानैः समीरण इवादिमिः ॥१८९॥ इमकैर्दुकुलोत्पन्नः किं विरोधेन मे समम् । इति सञ्चित्य यातोऽसौ नगरं तेन पण्डितः ॥१९॥ गोपुरं च समासीददनेकभटरक्षितम् । यस्योपरि स्थितः साक्षाद्वज्रकर्णः प्रयत्नवान् ॥१९१॥ चिरे तस्य भृत्यास्तं कस्त्वमेतः कुतोऽपि वा । किमर्थं वेति सोऽवोचदात्प्राप्तोऽन्न लिप्सया ॥१९२॥ ततस्तं बालकं कान्तं दृष्टा विस्मयसंगतः । आगच्छ प्रविश क्षिप्रमिति वज्रश्रवा जगौ ॥१९३॥ ततस्तुष्टः प्रयातोऽसौ समीपं कुलिशश्रतेः । विनीतवेषसंपन्नो वीक्षितं सादरं नरैः ॥१९४॥ जगाद वज्रकर्णश्च नरमाप्तमयं द्रुतम् । अन्नं प्रसाधितं मह्यं मोज्यतां रचितादरः ॥१९५॥ सोऽवोचन्नात्र भुझेऽहमिति मे गुरुरन्तिके । तमादौ भोजयाम्यन्नं नयाम्यस्याहमन्तिकम् ॥१९६॥ एवमस्त्विति संभाष्य नृपोऽन्नमतिपुष्कलम् । अदीदपद् वरं तस्मै चारुच्यञ्जनपानकम् ॥१५.७॥ लक्ष्मीधरस्तदादाय गतो द्विगुणरंहसा । भुक्तं च तैः क्रमेणैतत्तृप्तिं च परमां गताः ॥१९८।। वह पथिक उसे लेकर तथा विश्वासपूर्वक उन्हें प्रणाम कर अपने घर वापस लौट गया और राजाके समान सम्पन्न हो गया ।।१८४|| अथानन्तर रामने कहा कि हे लक्ष्मण ! यह ग्रीष्मकालका सूर्य जबतक अत्यन्त दुःसह अवस्थाको प्राप्त नहीं हो जाता है तबतक उठो इस नगरके समीपवर्ती प्रदेशमें चलें। यह जानकी प्याससे पीड़ित है इसलिए शीघ्र ही आहारकी विधि मिलाओ ।।१८५-१८६।। इस प्रकार कहनेपर वे तीनों दशांगनगरके समीप चन्द्रप्रभ भगवान्के उत्तम चैत्यालयमें पहुँचे ।।१८७|| वहाँ जिनेन्द्रदेवको नमस्कार कर सीता सहित राम तो उसी चैत्यालयमें सुखसे ठहर गये और लक्ष्मण धनुष लेकर आहार प्राप्तिके लिए निकला ॥१८८|| जब वह राजा सिंहोदरकी छावनी में प्रवेश करने लगा तब रक्षक पुरुषोंने जोरसे ललकारकर उसे उस तरह रोका जिस तरह कि पर्वत वायुको रोक लेते हैं ॥१८९।। 'इन नीच कली लोगोंके साथ विरोध करनेसे मझे क्या प्रयोजन है' ऐसा विचारकर यह बुद्धिमान् लक्ष्मण नगरको ओर गया ॥१९०॥ जब वह अनेक योद्धाओंके द्वारा सुरक्षित उस गोपुर द्वारपर पहुंचा जिसपर कि साक्षात् वज्रकर्ण बड़े प्रयत्नसे बैठा था ।।१९१।। तब उसके, भृत्योंने कहा कि तुम कौन हो? कहाँसे आये हो? और किसलिए आये हो? इसके उत्तरमें लक्ष्मणने कहा कि मैं बहुत दूरसे अन्न प्राप्त करनेकी इच्छासे आया हूँ ॥१९२|| तदनन्तर उस बालकको सुन्दर देख आश्चर्यचकित हो वज्रकर्णने कहा कि आओ, शीघ्र प्रवेश करो ॥१९३।। तत्पश्चात् सन्तुष्ट होकर लक्ष्मण विनीत वेषमें वज्रकणके पास गया। वहाँ सब लोगोंने उसे बड़े आदरसे देखा ॥१९४|| वज्रकणं ने एक आप्त पुरुषसे कहा कि जो अन्न मेरे लिए तैयार किया गया है यह इसे शीघ्र ही आदरके साथ खिलाओ ॥१९५।। यह सुन लक्ष्मणने कहा कि मैं यहाँ भोजन नहीं करूँगा। पास ही . मेरे गुरु अग्रज ठहरे हुए हैं पहले उन्हें भोजन कराऊँगा इसलिए मैं यह अन्न उनके पास ले जाता हूँ ॥१९६॥ 'एवमस्तु-ऐसा ही हो' कहकर राजाने उसे उत्तमोत्तम व्यंजन और पेय पदार्थोसे युक्त बहुत भारी अन्न दिला दिया ॥१९७।। लक्ष्मण उसे लेकर दूने वेगसे रासके पास गया । सबने उसे यथाक्रमसे खाया और खाकर परम तृप्तिको प्राप्त हुए ।।१९८॥ १. लक्ष्मणोऽयं म.। २. जाता म.। ३. रक्ष्यमानस: म. । ४. निरुद्धकृतिनिस्वानः म. । ५. द्रमकै: म.. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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