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________________ पद्मपुराणे अपमानेन दग्धस्य व्याकुलस्यार्णचिन्तया । अजितप्रत्यनीकस्य विटाक्रान्ताबलस्य च ॥१५६॥ सशल्यस्य दरिद्रस्य मीरोश्च भवदुःखतः । निद्रा कृपापरीतेव सुदूरेण पलायते ॥ १५७॥ निहन्तास्मि न चेदेनं नमस्कारपराङ्मुखम् । वज्रकर्णं ततः किं मे जीवितेन हतौजसः ॥ १५८ ॥ ततोsहं कुलिशेनेव हृदये कृतताडनः । रहस्यरत्नमादाय त्यक्त्वा कुण्डलशेमुषीम् ॥१५९॥ धर्मोद्यतमनस्कस्य सततं साधुसेविनः । भवतोऽन्तिकमायातो ज्ञात्वा कुरु निवर्तनम् ॥ १६० ॥ नागैरञ्जनशैलाभैः प्रक्षरद्गण्डभित्तिभिः । सप्तिभिश्च महावेगैर्भटैःश्च कवचावृतैः ॥१६१ ॥ तदाज्ञानया मार्गों निरुद्धोऽयं पुरोऽखिलः । सामन्तैः परमं क्रूरैर्भवन्तं हन्तुमुद्यतैः ॥ १६२ ॥ प्रसादं कुरु गच्छाशु प्रतीपं धर्मवत्सल । पतामि पादयोरेष तव मद्वचनं कुरु ॥ १६३ ॥ अर्थ प्रत्येषि नो राजन् ततः पश्यैतदागतम् । धूलीपटल संच्छन्नं परचक्रं महारत्रम् ॥ १६४ ॥ तावत्परागतं दृष्ट्वा साधनं कुलिशश्रवाः । समेतो विद्युदङ्गेन निवृत्तो वेगिवाहनः ॥ १६५ ॥ प्रविश्य च पुरं दुर्ग सुधीरः प्रत्यवस्थितैः । विधाय वञ्चितारोधं सामन्ताश्चावतस्थिरे ॥ १६६॥ प्रविष्टं नगरं श्रुत्वा वज्रकर्णं रुषा ज्वलन् । सिंहोदरः समायातः सर्व साधनसंयुतः ॥ १६७॥ पुरस्यात्यन्तदुर्गत्वात् साधनक्षयकातरः । न स तद्ग्रहणे बुद्धिं चकार सहसा नृपः ॥ १६८ ॥ समावास्य समीपे च स्वरितं प्राहिणोन्नरम् । वज्रकर्णं स गत्वेति बभाणात्यन्तनिष्ठुरम् ॥ १६९॥ ११२ तबतक मेरा चित्त व्याकुल है अतः निद्रा कैसे आ सकती है ? || १५५ || जो अपमानसे जल रहा हो, ऋणकी चिन्तासे व्याकुल हो, जो शत्रुको नहीं जीत सका हो, जिसकी स्त्री विटपुरुषके चक्रमें पड़ गयी हो, जो शल्यसे सहित दरिद्र हो तथा जो संसार के दुःख से भयभीत हो ऐसे मनुष्यसे दयायुक्त होकर ही मानो निद्रा दूर भाग जाती है || १५६ - १५७।। यदि मैं नमस्कारसे विमुख रहनेवाले इस वज्रकर्णको नहीं मारता हूँ तो मुझ निस्तेजको जीवनसे क्या प्रयोजन है ? || १५८ || तदनन्तर यह सुनकर जिसके हृदयमें मानो वज्रकी ही चोट लगी थी ऐसा मैं इस रहस्य - रूपी. रत्नको लेकर और कुण्डलकी भावना छोड़कर आपके पास आया हूँ क्योंकि आपका मन सदा धर्मं में तत्पर रहता है तथा आप सदा साधुओंकी सेवा करते हैं । हे नाथ ! यह जानकर आप लोट जाइए, उज्जैन मत जाइए । १५९ - १६० | उसकी आज्ञा पाकर नगरका यह समस्त मार्ग, जिनके गण्डस्थलसे मद झर रहा है ऐसे अंजनगिरिके समान आभावाले हाथियों, महावेगशाली घोड़ों, कवचोंसे आवृत योद्धाओं तथा आपको मारनेके लिए उद्यत क्रूर सामन्तोंसे घिरा हुआ है ।।१६१- १६२ || अतः हे धर्मवत्सल ! प्रसन्न होओ, शीघ्र ही उलटा वापस जाओ, मैं आपके, चरणोंमें पड़ता हूं | आप मेरा वचन मानो || १६३ ।। हे राजन् ! यदि आपको विश्वास नहीं हो तो देखो, धूलिके समूहसे व्याप्त तथा महा' कल-कल शब्द करता हुआ यह शत्रुका दल आ पहुँचा है ।।१६४|| इतनेमें शत्रुदलको आया देख वज्रकर्ण विद्युदंगके साथ वेगशाली घोड़ेसे वापस लोटा || १६५ || और अपने दुर्गम नगर में प्रवेश कर धीरता के साथ युद्धकी तैयारी करता हुआ स्थित गया। बड़े-बड़े सामन्त गोपुरोंको रोककर खड़े हो गये || १६६ ॥ तदनन्तर वज्रकर्णको नगरमें प्रविष्ट सुन, क्रोधसे जलता हुआ सिंहोदर अपनी सर्व सेनाके साथ वहाँ आया || १६७॥ वज्रकर्णंका नगर अत्यन्त दुर्गम था । इसलिए सेनाके क्षयसे भयभीत हो राजा सिंहोदरने उसपर तत्काल ही आक्रमण करनेकी इच्छा नहीं की ।। १६८ ।। किन्तु सेनाको समीप ही ठहराकर शीघ्र ही एक दूत भेजा । वह दूत वज्रकणके पास जाकर बड़ी निष्ठुरता से १. ऋणसंबन्धिचिन्तया । २. भवदुखितः म । ३. विश्वासं नो करोषि । ४. वज्रकर्णः म. । ५. समवस्थितः म. । ६. प्रतोलीरोधं । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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