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________________ द्वात्रिंशत्तम पर्व दृष्टा परमशोकेन निर्भरीकृतमानसा । हाकारमुखरा चेतावालिङ्गय रुदिता चिरम् ॥१२६॥ ततोऽस्रसरितश्छेदे विप्रलापेऽतिखेदिता । क्रमासंभाषणं कृत्वा केकयैवममाषत ॥१२७॥ पुत्रोत्तिष्ठ पुरी यामः कुरु राज्यं सहानुजः । ननु त्वया विहीनं मे सकलं विपिनायते ॥१२८॥ मरतः शिक्षणीयोऽयं तवात्यन्तमनीषिणः । स्त्रैणेन नष्टबुद्ध में क्षमस्व दुरनुष्ठितम् ॥१२९॥ ततः पद्मो जगादेवं किं न वेत्सि त्वमम्बिके । क्षत्रिया ननु कुर्वन्ति सकृकार्यमनन्यथा ॥१३॥ उक्तं तातेन यत्सत्यं तत्कर्तव्यं मया त्वया । भरतेन च दुष्कीर्तिर्माभूदस्य जगत्त्रये ॥१३१॥ पुनश्चोवाच भरतं भ्रातर्मा गा विचित्तताम् । शङ्कसे यद्यनाचारासायं सदनुमोदनात् ॥१३२॥ इत्युक्त्वा पुनरप्यस्य पद्मो राज्याभिषेचनम् । चकार कानने रम्ये समक्षं सर्वभूभृताम् ॥१३३॥ प्रणम्य केकयां सान्त्वं संभाष्य च पुनः पुनः । भ्रातरं च परिष्वज्य प्राहिणोत् सोऽतिकृच्छ्रत: ॥१३४॥ तौ विधाय यथायोग्यमुपचारं ससीतयोः। रामलक्ष्मणयोर्याती मातापुत्रौ यथागतम् ॥१३५।। परिध्वस्ताखिलद्वेषं सर्वप्रकृतिसौख्यदम् । चकार भरतो राज्यं प्रजासु जनकोपमः ॥१३६॥ राज्ये तथाविधेऽप्यस्य तिर्नाभूदपि क्षणम् । दुस्सहं दधमानस्य शोकशल्यं मनस्विनः ॥१३७॥ त्रिकालमरनाथस्य वन्दारुर्भोगमन्दधीः । ययौ श्रोतुं च सद्धमं चैत्यमस्येयती पतिः ॥१३८॥ वेगशाली रथपर सवार हो वहाँ आ पहुँची ॥१२५|| राम लक्ष्मणको देखकर इसका हृदय बहुत भारी शोकसे भर गया। हा हा कार करती हुई वह दोनोंका आलिंगन कर चिरकाल तक रोती रही ॥१२६॥ तदनन्तर जो विलाप करती-करती अत्यन्त खिन्न हो गयी थी ऐसी केकयी अश्रुरूपी नदीकी धारा टूटनेपर क्रमसे वार्तालाप कर इस प्रकार बोली कि हे पुत्र ! उठो, नगरीको चलें, छोटे भाइयोंके साथ राज्य करो, तुम्हारे बिना मुझे यह सब राज्य वनके समान जान पड़ता ॥१२७-१२८॥ तम अतिशय बद्धिमान हो. यह भरत तम्हारी शिक्षाके योग्य है अर्थात इसे शिक्षा देकर ठीक करो, स्त्रीपनाके कारण मेरी वद्धि नष्ट हो गयी थी अतः मेरे इस कुकृत्यको क्षमा करो ॥१२९।। तदनन्तर रामने कहा कि हे माता! क्या तुम यह नहीं जानती हो कि क्षत्रिय स्वीकृत कार्यको कभी अन्यथा नहीं करते हैं--एक बार कार्यको जिस प्रकार स्वीकृत कर लेते हैं उसी प्रकार उसे पूर्ण करते हैं ।।१३०।। 'पिताकी अपकीर्ति जगत्त्रयमें न फैले' इस बातका ध्यान रखना आवश्यक है ॥१३१॥ केकयीसे इतना कहकर उन्होंने भरतसे कहा कि हे भाई ! तू वैचित्य अर्थात् द्विविधाको प्राप्त मत हो। यदि तू अनाचारसे डरता है तो यह अनाचार नहीं है क्योंकि मैं स्वयं इस कार्यकी तुझे अनुमति दे रहा हूँ ॥१३२॥ इतना कहकर रामने मनोहर वनमें सब राजाओंके समक्ष भरतका पुनः राज्याभिषेक किया ||१३३॥ तदनन्तर केकयीको प्रणाम कर सान्त्वना देते हुए बार-बार सम्भाषण कर और भाईका आलिंगन कर बड़े कष्टसे सबको वापस विदा किया ॥१३४।। इस प्रकार माता और पुत्र अर्थात् केकयी और भरत, सीता सहित राम-लक्ष्मणका यथायोग्य उपचार कर जैसे आये थे वेसे लौट गये ॥१३५।। ___ अथानन्तर भरत, पिताके समान, प्रजापर राज्य करने लगा। उसका राज्य समस्त शत्रुओंसे रहित तथा समस्त प्रजाको सुख देनेवाला था ॥१३६।। तेजस्वी भरतने अपने मनमें असहनीय शोकरूपी शल्यको धारण कर रहा था इसलिए ऐसे व्यवस्थित राज्यमें भी उसे क्षणभरके लिए सन्तोष नहीं होता था ॥१३७॥ वह तीनों काल अरनाथ भगवान्की वन्दना करता था, भोगोंसे सदा उदास रहता था और समीचीन धर्मका श्रवण करनेके लिए मन्दिर जाता था १. विपिनमिवाचरति । २. विचिन्ततां म.। ३. 'संकासय घनारातीन्नायं मदनुमोदनात' ब. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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