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________________ ९६ पद्मपुराणे तत्राचार्यो द्युतिर्नाम 'स्वपरागमपारगः । महता साधुसंघेन सततं कृतसेवनः || १३५ || अग्रतोऽवग्रहं तस्य चकार भरतः सुधीः । पद्मदर्शनमात्रेण करिष्ये मुनितामिति ॥ १४०॥ कृतावग्रहमेवं तमुवाच भगवान् द्युतिः । कुर्वन् मयूरवृन्दानां तु धीरया गिरा ॥ १४१ ॥ अव्य भो यावदायाति पद्मः पद्मनिरीक्षणः । तावद्गृहस्थधर्मेण भवाप्तपरिकर्मकः ॥ १४२ ॥ अत्यन्तदुस्सहा चेष्टा निर्ग्रन्थानां महात्मनाम् । परिकर्म विशुद्धस्य जायते सुखसाधना ॥१४३॥ उपरिष्टात् करिष्यामि काले तप इति ब्रुवन् । अनेको मृत्युमायाति नरोऽतिजडमानसः ॥ १४४ ॥ अनर्घ्यरत्नसदृशं तपो दिग्वाससामिति । एवमप्यक्षमं वक्तुं परस्तस्योपमा कुतः ॥ १४५॥ कनीयांस्तस्य धर्मोऽयमुक्तोऽयं गृहिणां जिनैः । अप्रसादी भवेत्तस्मिनिरतो बोधदागिनि ॥ १४६ ॥ यथा रत्नाकरद्वीपं मानवः कश्चिदागतः । रत्नं यत्किंचिदादत्ते यात्यस्य तदनर्घताम् ||१४७ || तथास्मिन्नियमद्वीपे शासने धर्मचक्रिणाम् । य एव नियमः कश्चिद् ग्रहीतो यात्यनर्घताम् ॥ १४८ ॥ अहिंसारत्नमादाय विपुलं यो जिनाधिपम् । भक्त्यार्चयत्यसौ नाके परमां वृद्धिमश्नुते || १४९|| सत्यधरः स्रग्मिर्यः करोति जिनार्चनम् । भवत्यादेयवाक्योऽसौ सकीर्तिव्याप्तविष्टपः ॥ १५८ ॥ अदत्तादाननिर्मुक्तो जिनेन्द्रान् यो नमस्यति । जायते रत्नपूर्णानां "निधीनां स विभुर्नरः ॥ १५१ ॥ यो रतिं परनारीषु न करोति जिनाश्रितः । सोऽथ गच्छति सौभाग्यं सर्वनेत्रमलिम्लुचः || १५२ ।। जिनानर्चति यो भक्त्या कृतावधिपरिग्रहः । लभतेऽसावतिस्फीतान् लाभान् लोकस्य पूजितः ॥ १५३ ॥ यही इसका नियम था || १३८ || वहीं स्व और परशास्त्रोंके पारगामी तथा अनेक मुनियोंका संघ जिनकी निरन्तर सेवा करता था ऐसे द्युति नामके आचार्यं रहते थे || १३९ || उनके आगे बुद्धिमान् भरतने प्रतिज्ञा की कि मैं रामके दर्शन मात्रसे मुनिव्रत धारण करूँगा || १४०|| तदनन्तर अपनी गम्भीर वाणी से मयूरसमूहको नृत्य कराते हुए भगवान् द्युति भट्टारक इस प्रकारको प्रतिज्ञा करनेवाले भरतसे बोले || १४१ || कि हे भव्य ! कमलके समान नेत्रोंके धारक राम जबतक आते तबतक तू गृहस्थ धर्मके द्वारा अभ्यास कर ले || १४२ || महात्मा निर्ग्रन्थ मुनियोंकी चेष्टा अत्यन्त कठिन है पर जो अभ्यासके द्वारा परिपक्व होते हैं उन्हें उसका साधन करना सरल हो जाता है || १४३ || 'मैं आगे तप करूँगा' ऐसा कहनेवाले अनेक जड़बुद्धि मनुष्य मृत्युको प्राप्त हो जाते हैं पर तप नहीं कर पाते हैं || १४४ || 'निर्ग्रन्थ मुनियोंका तप अमूल्य रत्नके समान है' ऐसा कहना भी अशक्य है फिर उसकी अन्य उपमा तो हो ही क्या सकती है ? || १४५ ।। गृहस्थों के धर्मको जिनेन्द्र भगवान् ने मुनिधर्मका छोटा भाई कहा है सो बोधिको प्रदान करनेवाले इस धर्ममें भी प्रमादरहित होकर लीन रहना चाहिए || १४६ || जैसे कोई मनुष्य रत्नद्वीप में गया वहाँ वह जिस किसी भी रत्नको उठाता है वही उसके लिए अमूल्यताको प्राप्त हो जाता है इसी प्रकार धर्मचक्रकी प्रवृत्ति करनेवाले जिनेन्द्र भगवान् के शासनमें जो कोई इस नियमरूपी द्वीपमें आकर जिस किसी नियमको ग्रहण करता है वही उसके लिए अमूल्य हो जाता है ॥ १४७ - १४८ ॥ जो अत्यन्त श्रेष्ठ अहिंसारूपी रत्नको लेकर भक्तिपूर्वक जिनेन्द्रदेवकी पूजा करता है वह स्वर्ग में परम वृद्धिको प्राप्त होता है ॥ १४९ ॥ जो सत्य व्रतका धारी होकर मालाओंसे भगवान्‌की अर्चा करता है उसके वचनों को सब ग्रहण करते हैं तथा उज्ज्वल कीर्ति से वह समस्त संसारको व्याप्त करता है || १५०॥ जो अदत्तादान अर्थात् चोरीसे दूर रहकर जिनेन्द्र भगवान्‌की पूजा करता है वह रत्नोंसे परिपूर्णं निधियों का स्वामी होता है || १५१|| जो जिनेन्द्र भगवान् की सेवा करता हुआ परस्त्रियोंमें प्रेम नहीं करता है वह सबके नेत्रोंको हरण करनेवाला परम सौभाग्यको प्राप्त होता है ।। १५२ ।। जो परि १. स्वकीयपरकीयशास्त्रपारगामी । २. प्रतिज्ञाम् । ३ प्राप्ताभ्यासः । ४. स्वर्गे । ६. सर्वजनमनोहरः । Jain Education International For Private & Personal Use Only ५. नदीनां म. (?) । www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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