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________________ ९४ पद्मपुराणे कृत्वा पुरस्सरान् पद्मपार्श्वात् प्रत्यागतान्नरान् । पवनाश्वसमारूढः स ययौ भृशमुत्सुकः ॥ ११२ ॥ प्राप्तश्च तामरण्यानीमनेकपं कुलाकुलाम् । नाना वृक्षावृतादित्यां गिरिगह्वरभीषणाम् ॥ ११३ ॥ बन्धयित्वा महावृक्षैरुडुपानी' सुसंहतीः । तां धुनीमुत्ततारासौ क्षणेन सहवाहनः ॥ ११४ ॥ इतो दृष्टावितो दृष्टौ पुरुषौ सह योषिता । इति पृच्छन्स शृण्वंश्च जगामानन्यमानसः ॥ ११५ ॥ अथ तो परमारण्ये विश्रान्तौ सरसस्तटे । ससीतौ मरतोऽपश्यत् पार्श्वन्यस्तशरासनौ ।। ११६ ॥ प्रभूतदिवसप्राप्तं ताभ्यां सीताव्यपेक्षया । षड्भिर्दिनैस्तमुद्देशं भरतः प्रतिपद्मवान् ॥ ११७ ॥ अवतीर्य तुरङ्गाच्च मार्ग लोचनगोचरम् । गत्वा पद्भ्यां समाश्लिष्य पादौ 'पद्मस्य मूर्च्छितः ॥११८॥ ततो विबोधितस्तेन कृत्वा संभाषणं क्रमात् । मूर्द्धाञ्जलिर्जगादैवं पद्मं विनतविग्रहः ॥ १९९ ॥ विडम्बनमिदं कस्मान्नाथ मे भवता कृतम् । परं राज्यापदेशेन न्याय सर्वस्व कोविद ॥ १२०॥ आस्तां तावदिदं राज्यं जीवितेनापि किं मम । भवता विप्रयुक्तस्य गुरुचेष्टितकारिणा ॥ १२१ ॥ उत्तिष्ठ स्वपुरीं यामः प्रसादं कुरु मे प्रभो । राज्यं पालय निश्शेषं यच्छ मेऽतिसुखासिकाम् ॥१२२॥ भवामि छत्रधारस्ते शत्रुघ्नमराश्रितः । लक्ष्मणः परमो मन्त्री सर्व सुविहितं ननु ॥ १२३ ॥ पश्चात्तापानलेनालं संतप्ता जननी मम । तव लक्ष्मीधरस्यापि वर्तते शोककारिणी ॥ १२४ ॥ ब्रवीत्येवमसौ यावत्केकया तावदागता । वेगिनं रथमारुह्य सामन्तशतमध्यगा ॥१२५॥ हुआ। वह 'साधु-साधु ठीक-ठीक' इस प्रकारके शब्द कहने लगा तथा शीघ्र ही एक हजार घोड़ों से युक्त हो रामके मार्ग में चल पड़ा ॥ १११ ॥ वह रामके पाससे लौटकर आये हुए लोगों को आगे कर बड़ी उत्कण्ठासे पवनके समान शीघ्रगामी घोड़ेपर सवार होकर चला ||११२|| तथा कुछ ही समय में उस महाअटवी में जा पहुँचा जो हाथियोंके समूहसे व्याप्त थी, नाना वृक्षोंसे जहाँ सूर्यका प्रवेश रुक गया था तथा जो पर्वत और गतसे अत्यन्त भयंकर थी ।। ११३ || सामने भयंकर नदी थी सो वृक्षों के बड़े-बड़े लट्ठोंसे नावोंके समूहको बाँधकर उनका पुल बना वाहनों के साथ-साथ क्षण भरमें पार कर गया ॥ ११४ ॥ वह मार्ग में मिलनेवाले लोगोंसे पूछता जाता था कि क्या यहां आप लोगोंने एक स्त्रीके साथ दो पुरुष देखे हैं और उत्तरको एकाग्र मनसे सुनता हुआ आगे बढ़ता जाता था || १५ || अथानन्तर जो सघन वनमें एक सरोवरके तीरपर विश्राम कर रहे थे तथा जिनके पास ही धनुष रखे हुए थे ऐसे सीता सहित राम-लक्ष्मणको भरतने देखा ॥ ११६ ॥ रामलक्ष्मण, सीताके कारण जिस स्थानपर बहुत दिन में पहुँच पाये थे भरत उस स्थानपर छह दिनमें ही पहुँच गया ॥ ११७ ॥ वह घोड़ेसे उतर पड़ा और जहाँसे राम दिख रहे थे उतने मार्गमें पैदल ही चलकर उनके समीप पहुँचा तथा उनके चरणोंका आलिंगन कर मूच्छित हो गया | | ११८|| तदनन्तर रामने सचेत किया सो क्रमसे वार्तालाप कर नम्रीभूत हो हाथ जोड़ शिरसे लगाकर इस प्रकार कहने लगा कि हे नाथ ! राज्य देकर आपने मेरी यह क्या विडम्बना की है ? आप ही न्यायके जाननेवाले अतिशय निपुण हो ॥११९ - १२० ॥ उत्तम चेष्टाओंके धारण करनेवाले आपसे पृथक् रहकर मुझे यह राज्य तो दूर रहे जीवनसे भी क्या प्रयोजन है ? || १२१ || हे प्रभो ! उठो, अपनी नगरीको चलें, मुझपर प्रसन्नता करो, समस्त राज्यका पालन करो, और मुझे सुखकी अवस्था देओ || १२२ || मैं आपका छत्रधारक होऊँगा, शत्रुघ्न चमर डोलेगा और लक्ष्मण उत्कृष्ट मन्त्री होगा, ऐसा करने से ही सब ठीक होगा || १२३ || मेरी माता पश्चात्तापरूपी अग्निसे अत्यन्त सन्तप्त हो रही है तथा आपकी ओर लक्ष्मणकी माता भी निरन्तर शोक कर रही हैं ।। १२४ ॥ जबतक भरत इस प्रकार कह रहा था तबतक सैकड़ों सामन्तोंके मध्य गमन करनेवाली केकयी १. हस्तिसमूहयुक्ताम् । २. नौकानां । ३. समूहान् । ४. नदीम् । ५. पद्मां म. (?) । ६. रामस्य । For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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