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________________ पद्मपुराणे द्वयं बभार तद्वक्त्रमन्योन्यस्य विरोधकम् । कान्त्या जितनिशानाथं दीप्त्या च जितभास्करम् ॥२२७॥ करौ तस्यारुणच्छायौ पल्लवादपि कोमलौ ।'धूलीकारे समस्तानां भूभृतामथ च क्षमौ ॥२२८॥ निविडः केशसंघातः स्निग्धोऽत्यन्तं बभूव च। नीलाअनशिलाकारो मुनि हेमगिरेरिव ॥२२९॥ धर्मात्मनापि लोकस्य तेन सर्वस्य लोचने । उपमानमतीतेन हृते रूपेण शंभुना ॥२३॥ तस्मिन् काले प्रणष्टेषु कल्पवृक्षेष्वशेषतः । अकृष्टपच्यसस्येन मही सर्वा विराजते ॥२३॥ वाणिज्यव्यवहारेण शिल्पैश्च रहिताः प्रजाः । अभावाद धर्मसंज्ञायाः पाखण्डैश्च विवर्जिताः ॥२३२॥ आलीदिक्षरसस्तासामाहारः षड्रसान्वितः । स्वयं छिन्नच्युतः कान्तिवीर्यादिकरणक्षमः ॥२३३॥ सोऽपि कालानुभावेन स्तयं गलति नो यदा। यन्त्रनिष्पीडनज्ञश्च न लोकोऽनुपदेशतः ॥२३४॥ पश्यन्त्योऽपि तदा सस्यं तत्संस्कारविधौ जडाः । सुधासंतापिताः सत्यः प्रजा व्याकुलतां गताः ॥२३५॥ ततः शरणमीयुस्ता नाभि संघातमागताः । ऊचुश्चेति वचः स्तुत्वा प्रणम्य च महातयः ॥२३६॥ नाथ याताः समस्तास्ते प्रक्षयं कल्पपादपाः । क्षुधा संतापितानस्मांस्त्रायस्व शरणागतान् ॥२३७॥ भूमिजं फलसंपन्नं किमप्येतच्च दृश्यते । विधिमस्य न जानीमः संस्कारे भक्षणोचितम् ॥२३॥ स्वछन्दचारिणामेतद्गोकुलानां स्तनान्तरात् । क्षरभक्ष्यममक्ष्यं किं कथं चेति वद प्रभो ॥२३९॥ मुखने कान्तिसे चन्द्रमाको जीत लिया था और तेजने सूर्यको परास्त कर दिया था इस तरह वह परस्परके विरोधी दो पदार्थों-चन्द्रमा और सूर्यको धारण कर रहा था ॥२२७। यद्यपि लाल-लाल कान्तिके धारक उनके दोनों हाथ पल्लवसे भी अधिक कोमल थे तथापि वे समस्त पर्वतोंको चूर्ण करनेमें ( पक्षमें समस्त राजाओंका पराजय करनेमें ) समर्थ थे ॥२२८॥ उनके केशोंका समूह अत्यन्त सघन तथा सचिक्कण था और ऐसा जान पड़ता था मानो मेरु पर्वतके शिखरपर नीलांजनकी शिला ही रखी हो ।।२२९॥ यद्यपि वे भगवान् धर्मात्मा थे-हरण आदिको अधर्म मानते थे तथापि उन्होंने अपने अनुपम रूपसे समस्त लोगोंके नेत्र हरण कर लिये थे। भावार्थभगवान्का रूप सर्वजननयनाभिराम था ।।२३०।। उस समय कल्पवृक्ष पूर्णरूपसे नष्ट हो चुके थे इसलिए समस्त पृथिवी अकृष्टपच्य अर्थात् बिना जोते, बिना बोये ही अपने आप उत्पन्न होनेवाली धान्यसे सुशोभित हो रही थी ॥२३१|| उस समयकी प्रजा वाणिज्य-लेन-देनका व्यवहार तथा शिल्पसे रहित थी और धर्मका तो नाम भी नहीं था इसलिए पाखण्डसे भी रहित थी ।।२३२॥ जो छह रसोंसे सहित था, स्वयं ही कटकर शाखासे झड़ने लगता था और बल-वीर्य आदिके करने में समर्थ था ऐसा इक्षुरस ही उस समयकी प्रजाका आहार था ॥२३३।। पहले तो वह झरस अपने आप निकलता था पर कालके प्रभावसे अब उसका स्वयं निकलना बन्द हो गया और लोग बिना कुछ बताये यन्त्रोंके द्वारा ईखको पेलनेकी विधि जानते नहीं थे ।।२३४।। इसी प्रकार सामने खड़ी हुई धानको लोग देख रहे थे पर उसके संस्कारकी विधि नहीं जानते थे इसलिए भूखसे पीड़ित होकर अत्यन्त व्याकुल हो उठे ॥२३५॥ तदनन्तर बहुत भारी पीड़ासे युक्त वे लोग इकट्ठे होकर नाभिराजकी शरणमें पहुंचे और स्तुति तथा प्रणाम कर निम्नलिखित वचन कहने लगे ॥२३६॥ हे नाथ ! जिनसे हमारा भरण-पोषण होता था वे कल्पवृक्ष अब सबके सब नष्ट हो गये हैं इसलिए भूखसे सन्तप्त होकर आपकी शरणमें आये हुए हम सब लोगोंकी आप रक्षा कीजिए ॥२३७।। पृथिवीपर उत्पन्न हुई यह कोई वस्तु फलोंसे युक्त दिखाई दे रही है, यह वस्तु संस्कार किये जानेपर खाने के योग्य हो सकती है पर हम लोग इसकी विधि नहीं जानते हैं ॥२३८।। स्वच्छन्द विचरनेवाली गायोंके स्तनोंके भीतरसे यह कुछ पदार्थ निकल रहा है सो १. पराजये । २. पश्यन्तोऽपि म. । ३. सद्यः म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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