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________________ ७ तृतीयं पर्व तुष्टा संवीक्ष्य तनयमङ्कस्थं जननी तदा । निजच्छायापरिष्वङ्गपिञ्जरीकृतदिङ्मुखम् ॥२१॥ आलिङ्गन्ती मृदुस्पर्श कौतुकव्याप्तमानसा । दुराख्यानपरावस्थमवतीर्णा सुखार्णवम् ॥२१५।। अङ्कप्राप्तेन सा तेन रराज प्रमदोत्तमा । नवोदितेन पूर्वाशा बिम्बेन सवितुर्यथा ॥२१६॥ नामिश्च तत्सुतं दृष्ट्वा दिव्यालङ्कारधारिणम् । प्रैलोक्यैश्वर्यसंयुक्तं मेने स्वं परमद्युतिम् ॥२१७॥ सुतगात्रसमासंगसंजातसुखसंपदः । मीलिताक्षत्रिभागस्य मनोऽस्य द्रवतां गतम् ॥२१८॥ सुरेन्द्र पूजया प्राप्तः प्रधानत्वं जिनो यतः । ततस्तमृषभाभिख्यां निन्यतुः पितरौ सुतम् ॥२१९॥ तयोरन्योन्यसंबद्धं प्रेम यद् वृद्धिमागतम् । तजातमधुना बाले पूर्ववच्च तयोरपि ।।२२०॥ कराङ्गुष्ठे ततो न्यस्तममृतं वज्रपाणिना । पिबन् क्रमेण संप्राप देहस्योपचयं जिनः ॥२२॥ ततः कुमारकैर्युक्तो वयस्यैरिन्द्रनोदितैः । अनवद्यां चकारासौ क्रीडां पित्रोः सुखावहाम् ॥२२२॥ आसनं शयनं यानं भोजनं वसनानि च । चारणादिकमन्यच्च सकलं तस्य शक्रजम् ॥२२३॥ कनीयसैव कालेन परां वृद्धिमवाप सः । मेरुभित्तिसमाकारं बिभ्रद्वक्षः समुन्नतम् ॥२२४॥ आशारतम्बरमालानस्तम्भसंस्थानतां गतौ । बाहू तस्य समस्तस्य जगतः कल्पपादपौ ॥२२५॥ जल्दण्डद्वयं दधे स्वकान्तिकृतचर्चनम् । त्रैलोक्यगृहकृत्यर्थं स्तम्भद्वयसमुच्छ्रितम् ॥२२६॥ दिव्य वस्त्रों और अलंकारोंसे अलंकृत, तथा उत्कृष्ट सुगन्धिके कारण नासिकाको हरण करनेवाले विलेपनसे लिप्त एवं अपनी कान्तिके सम्पर्कसे दिशाओंके अग्रभागको पीला करनेवाले अंकस्थ पुत्रको देखकर उस समय माता मरुदेवी बहुत ही सन्तुष्ट हो रही थी ॥२१३-२१४॥ जिसका हृदय कौतुकसे भर रहा था ऐसी मरुदेवी कोमल स्पर्शवाले पुत्रका आलिंगन करती हुई वर्णनातीत सुखरूपी सागरमें जा उतरी थी ॥२१५॥ वह उत्तम नारी मरुदेवी गोद में स्थित जिन-बालकसे इस प्रकार सुशोभित हो रही थी जिस प्रकार कि नवीन उदित सूर्यके बिम्बसे पूर्व दिशा सुशोभित होती है ॥२१६॥ नाभिराजने दिव्य अलंकारोंको धारण करनेवाले एवं उत्कृष्ट कान्तिसे युक्त उस पुत्रको देखकर अपने आपको तीन लोकके ऐश्वर्यसे युक्त माना था ॥२१७॥ पुत्रके शरीरके सम्बन्धसे जिन्हें सुखरूप (सम्पदा उत्पन्न हुई है तथा उस सुखका आस्वाद करते समय जिनके नेत्रका तृतीय भाग निमीलित हो रहा है ऐसा नाभिराजका मन उस पुत्रको देखकर द्रवीभूत हो गया था ॥२१८॥ चूंकि वे जिनेन्द्र इन्द्रके द्वारा की हुई पूजासे प्रधानताको प्राप्त हुए थे इसलिए माता-पिताने उनका 'ऋषभ' यह नाम रखा ॥२१९।। मातापिताका जो परस्पर सम्बन्धी प्रेम वृद्धिको प्राप्त हुआ था वह उस समय बालक ऋषभदेवमें केन्द्रित हो गया था ।।२२०॥ इन्द्रने भगवान्के हाथके अंगूठे में जो अमृत निक्षिप्त किया था उसका पान करते हुए वे क्रमशः शरीर सम्बन्धी वृद्धिको प्राप्त हुए थे ॥२२१।। तदनन्तर, इन्द्रके द्वारा अनुमोदित समान अवस्थावाले देव-कुमारोंसे युक्त होकर भगवान् माता-पिताको सुख पहुँचानेवाली निर्दोष क्रीड़ा करने लगे ॥२२२॥ आसन, शयन, वाहन, भोजन, वस्त्र तथा चारण आदिक जितना भी उनका परिकर था वह सब उन्हें इन्द्रसे प्राप्त होता था ॥२२३।। वे थोड़े ही समयमें परम वृद्धिको प्राप्त हो गये। उनका वक्षःस्थल मेरु पर्वतको भित्तिके समान चौड़ा और उन्नत हो गया ।।२२४॥ समस्त संसारके लिए कल्पवृक्षके समान जो उनकी भुजाएँ थीं, वे आशारूपी दिग्गजोंको बाँधनेके लिए खम्भोंका आकार धारण कर रही थीं ॥२२५।। उनके दोनों ऊरुदण्ड अपनी निजको कान्तिके द्वारा किये हए लेपनको धारण कर रहे थे और ऐसे जान पड़ते थे मानो तीन लोकरूपी घरको धारण करनेके लिए दो खम्भे हो खड़े किये गये हों ।।२२६।। उनके १. देहस्योपशमं म.। २. सुखावहाः क. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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