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________________ पद्मपुराणे चामरग्राहिणी काचित्काचिच्छन्त्रस्य धारिका । आनेत्री वाससा काचिद् भूषणानां ततः परा ॥११८॥ शयनीयविधौ काचित् सता सन्मार्जने परा । पुष्पप्रकरणे काचित्काचिद्गन्धानुलेपने ॥११९॥ पानाशनविधौ काचित् काचिदाह्वानकर्मणि । एवं कर्तव्यतां तस्याः सर्वाः कुर्वन्ति देवताः ॥१२०॥ चिन्ताया अपि न क्लेशं प्रपेदे नृपवल्लभा । अन्यदा शयनीये स्वे सुप्ता सात्यन्तकोमले ॥१२॥ पटांशुकपरिच्छन्ने प्रान्तयोः सोपधानके । तस्या मध्ये सुखं लब्धा स्वपुण्यपरिपाकतः ॥१२२॥ गृहीतामलशस्त्राभिर्देवीमिः पर्युपासिता । अद्राक्षीत् षोडश स्वप्नानिति श्रेयोविधायिनः ॥१२३॥ करटच्युतदानाम्बुगन्धसंबद्धषट्पदम् । वारणं चन्द्रधवलं मन्द्रगर्जितकारणम् ॥१२॥ वृषभं दुन्दुभिस्कन्धं दधतं ककुदं शुमम् । नदन्तं शरदम्भोदसंघाताकारधारिणम् ॥१२५॥ शीतांशुकिरणश्वेतकेसरालीविराजितम् । शशिरेखासदृग्दंष्ट्राद्वन्द्वयुक्तं मृगाधिपम् ॥१२६॥ सिच्यमानां श्रियं नागैः कुम्भैः सौवर्णराजितैः । उत्फुल्लपुण्डरीकस्य स्थितामुपरि निश्चलाम् ।।१२७॥ पुन्नागमालतीकुन्दचम्पकादिप्रकल्पिते । नितान्तं दामनी दीर्धे सौरमाकृष्टषट्पदे ।।१२८॥ उदयाचलमूर्द्धस्थं प्रध्वस्ततिमिरोद्भवम् । विश्रब्धदर्शनं मार्नु मुक्तं मेघायुपद्रवैः ।।१२९।। बध कमदखण्डानां मण्डनं रात्रियोषितः । धवलीक्रतसर्वाश किरणस्तारकापतिम् ॥१३०॥ अन्योन्यप्रेमसंबन्धं प्रस्फुरद्विमले जले । विद्युद्दण्डसमाकारं मीनयोर्युगलं शुभम् ॥१३१॥ यार लेकर पहरा देती थीं ॥११७॥ कोई चमर ढोलती थीं, कोई वस्त्र लाकर देती थी और कोई आभूषण लाकर उपस्थित करती थी॥११८॥ कोई शय्या बिछानेके कार्यमें लगी थी, कोई बुहारनेके कार्यमें तत्पर थी, कोई पुष्प बिखेरनेमें लीन थी और कोई सुगन्धित द्रव्यका लेप लगानेमें व्यस्त थी ॥११९॥ कोई भोजन-पानके कार्यमें व्यग्र थी और कोई बलाने आदिके कार्यमें लीन थी। इस प्रकार समस्त देवियाँ उसका कार्य करती थीं ॥१२०॥ इस प्रकार नाभिराजकी प्रियवल्लभा मरुदेवीको किसी बातकी चिन्ताका क्लेश नहीं उठाना पड़ता था अर्थात् बिना चिन्ता किये ही समस्त कार्य सम्पन्न हो जाते थे। एक दिन वह चीनवस्त्रसे आच्छादित तथा जिसके दोनों ओर तकिया रखे हुए थे, ऐसी अत्यन्त कोमल शय्यापर सो रही थी और उसके बीच अपने पुण्यकर्मके उदयसे सुखका अनुभव कर रही थी ॥१२१-१२२॥ निर्मल शस्त्र लेकर देवियाँ उसकी सेवा कर रही थीं उसी समय उसने कल्याण करनेवाले निम्नलिखित सोलह स्वप्न देखे ॥१२३।। पहले स्वप्नमें गण्डस्थलसे च्युत मदजलकी गन्धसे जिसपर भ्रमर लग रहे थे ऐसा तथा चन्द्रमाके समान सफेद और गम्भीर गर्जना करनेवाला हाथी देखा ॥१२४॥ दूसरे स्वप्नमें ऐसा बैल देखा जिसका कि स्कन्ध दुन्दुभि नामक बाजेके समान था, जो शुभ कान्दीलको धारण कर रहा था, शब्द कर रहा था और शरदऋतुके मेघ समूहके समान आकारको धारण करनेवाला था ॥१२५॥ तीसरे स्वप्न में चन्द्रमाकी किरणोंके समान धवल सटाओंके समूहसे सुशोभित एवं चन्द्रमाकी रेखाके समान दोनों दाँड़ोंसे युक्त सिंहको देखा ॥१२६॥ चौथे स्वप्नमें हाथी, सुवर्ण तथा चाँदीके कलशोंसे जिसका अभिषेक कर रहे थे, तथा जो फूले हुए कमलपर निश्चल बैठी हुई थी ऐसी लक्ष्मी देखी ॥१२७॥ पाँचवें स्वप्न में पुन्नाग, मालतो, कुन्द तथा चम्पा आदिके फूलोंसे निर्मित और अपनी सुगन्धिसे भ्रमरोंको आकृष्ट करनेवाली दो बहुत बड़ी मालाएँ देखीं ॥१२८।। छठवें स्वप्नमें उदयाचलके मस्तकपर स्थित, अन्धकारके समूहको नष्ट करनेवाला, एवं मेघ आदिके उपद्रवोंसे रहित, निर्भय दर्शनको देनेवाला सूर्य देखा ॥१२९।। सातवें स्वप्नमें ऐसा चन्द्रमा देखा कि जो कुमुदोंके समूहका बन्धु था-उन्हें विकसित करनेवाला था, रात्रिरूपी स्त्रीका मानो आभषण था, किरणोंके द्वारा समस्त दिशाओंको सफ़ेद करनेवाला था और ताराओंका पति था॥१३०॥ आठवें स्वप्नमें जो परस्परके प्रेमसे सम्बद्ध थे, निर्मल जलमें तैर रहे थे, बिजलीके १. शयने च स्वे क.। २. म पुस्तके अनयोः श्लोकयोः क्रमभेदोऽस्ति । ३. ककुभम् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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