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________________ तृतीयं पर्व हारोपशोभितग्रीवं पुष्पमालापरिष्कृतम् । मणिमिः कलशं पूर्ण पञ्चवर्णैः समुज्ज्वलम् ॥१३२॥ पनेन्दीवरसंछन्नं विमलाम्बुमहासरः । नानापक्षिगणाकीणं चारुसोपानमण्डितम् ॥१३३॥ चलन्मीनमहानक्रजनितोत्तुङ्गवीचिकम् । मेघपङ्क्तिसमासक्तं नमस्तुल्यं नदीपतिम् ॥१३॥ साटोपहरिमिर्युक्तं नानारत्नसमुज्ज्वलम् । चामीकरमयं चारु विष्टरं दूरमुन्नतम् ॥१३५॥ सुमेरुशिखराकारं सुमान रत्नराजितम् । विमानं बुद्बुदादर्शचामरादिविभूषणम् ॥१३६॥ कल्पद्रुसगृहाकारं भावनं बहुभूमिकम् । मुक्तादामकृतच्छायं रत्नांशुपटलावृतम् ॥१३७॥ पञ्चवर्णमहारत्नराशिमत्यन्तमुन्नतम् । अन्योऽन्यकिरणोद्योतजनितेन्द्रशरासनम् ॥१३॥ ज्वालाजटालमनलं धूमसंभववर्जितम् । प्रदक्षिणकृतावर्तमनिन्धनसमुद्भवम् ॥१३९॥ अनन्तरं च स्वप्नानां दर्शनाचारुदर्शना । सा प्रबोधं समायाता जयमङ्गलनिस्वनैः ॥१४०॥ त्वद्वक्त्रकान्तिसंभूतत्रपयेव निशाकरः । एष संप्रति संजातः छायया परिवर्जितः ॥१४॥ अयं भाति सहस्रांशुरुदयाचलमस्तके । कलशो मङ्गलार्थं च सिन्दूरेणेवे गुण्ठितः ॥१४२॥ संप्रति वस्मितेनैव तिमिरं यास्यति क्षयम् । इतीव स्वस्य वैयर्थ्यात् प्रदीपाः पाण्डुतां गताः ॥१४३॥ कुलमेतच्छकुन्तानां कलकोलाहलाकुलम् । मङ्गलं ते करोतीव निजनीडसुखस्थितम् ॥१४४॥ अमी प्रभातवातेन जडमन्देन संगताः । निद्राशेषादिवेदानी घूर्णन्ते गृहपादपाः ॥१४५॥ दण्डके समान जिनका आकार था ऐसे मीनोंका शुभ जोड़ा देखा ॥१३॥ नौंवे स्वप्नमें जिसकी ग्रीवा हारसे सुशोभित थी, जो फूलोंकी मालाओंसे सुसज्जित था और जो पंचवर्णके मणियोंसे भरा हुआ था, ऐसा उज्ज्वल कलश देखा ।। १३२ ॥ दसवें स्वप्नमें कमलों और नील कमलोंसे आच्छादित, निर्मल जलसे युक्त, नाना पक्षियोंसे व्याप्त तथा सुन्दर सीढ़ियोंसे सुशोभित विशाल सरोवर देखा ॥१३३।। ग्यारहवें स्वप्नमें, चलते हुए मीन और बड़े-बड़े नक्रोंसे जिनमें ऊंची-ऊँची लहरें उठ रही थीं, जो मेघोंसे युक्त था तथा आकाशके समान जान पड़ता था ऐसा सागर देखा ॥१३४॥ बारहवें स्वप्नमें बड़े-बड़े सिंहोंसे युक्त, अनेक प्रकारके रत्नोंसे उज्ज्वल, सुवर्णनिर्मित, बहुत ऊँचा सुन्दर सिंहासन देखा ॥१३५।। तेरहवें स्वप्नमें ऐसा विमान देखा कि जिसका आकार समेरु पर्वतके शिखरके समान था. जिसका विस्तार बहत था, जो रत्नोंसे सुशोभित था तथा गोले दर्पण और चमर आदिसे विभूषित था ॥ १३६ ॥ चौदहवें स्वप्न में ऐसा भवन देखा कि जिसका आकार कल्पवृक्षनिर्मित प्रासादके समान था, जिसके अनेक खण्ड थे, मोतियोंकी मालाओंसे जिसकी शोभा बढ़ रही थी और जो रत्नोंकी किरणोंके समूहसे आवृत था ॥१३७|| पन्द्रहवें स्वप्न में, परस्परकी किरणोंके प्रकाशसे इन्द्रधनुषको उत्पन्न करनेवाली, अत्यन्त ऊँची पाँच प्रकारके रत्नोंकी राशि देखी ॥१३८॥ और सोलहवें स्वप्नमें ज्वालाओंसे व्याप्त, धूमसे रहित, दक्षिण दिशाको ओर आवतं ग्रहण करनेवाली एवं ईन्धनमें रहित अग्नि देखी ॥१३९।। स्वप्न देखनेके बाद ही सुन्दरांगी मरुदेवी वन्दीजनोंकी मंगलमय जय-जय ध्वनिसे जाग उठी ॥१४०॥ उस समय वन्दीजन कह रहे थे कि हे देवि ! यह चन्द्रमा तुम्हारे मुखको कान्तिसे उत्पन्न हुई लज्जाके कारण ही इस समय छाया अर्थात् कान्तिसे रहित हो गया है ॥१४१॥ उदयाचलके शिखरपर यह सूर्य ऐसा जान पड़ता है मानो मंगलके लिए सिन्दूरसे अनुरंजित कलश ही हो ॥१४२॥ इस समय तुम्हारी मुसकानसे ही अन्धकार नष्ट हो जायेगा इसलिए दीपक मानो अपने आपकी व्यर्थताका अनुभव करते हुए ही निष्प्रभ हो गये हैं ॥१४३॥ यह पक्षियोंका समूह अपने घोंसलोंमें सुखसे ठहरकर जो मनोहर कोलाहल कर रहा है सो ऐसा जान पड़ता है मानो तुम्हारा मंगल ही कर रहा है ॥१४४॥ ये घरके वृक्ष प्रातःकालकी शीतल और मन्द वायुसे संगत होकर ऐसे जान पड़ते हैं मानो अवशिष्ट १. बुदबुदादर्श म.। २. सिन्दूरेणैव म. । ३. त्वत्सितेनैव म. । ४. मुखस्थितम् म. । ६ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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