SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 89
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ तृतीयं पर्व हासा एव च सद्गन्धाः पटवासाः सितत्विषः। कपूरपांशवः कान्तिव्याघातायैव केवलम् ॥१०४॥ वाण्येव मधुरा वीणा वाद्यश्रुतिकुतूहलम् । कृतं तु परिवर्गेण तन्त्रीनिकरताडनम् ।।१०५॥ कान्तिरेवावरोभूता रागोऽङ्गस्य समुज्ज्वलः । निर्गुणः कौकुमः पङ्को लावण्यस्य कलङ्कनम् ॥१०६॥ परिहासप्रहाराय भुजावेव.सुकोमलौ । प्रयोजनमतीतानि मृणालशकलानि तु ।।१०७।। यौवनोष्मसमुद्र ता मण्डनं स्वेदबिन्दवः । कुचयोर्हारभारस्तु वृथैव परिकल्पितः ॥१०॥ शिलातलविशाला च श्रोणी विस्मयकारणम् । 'निमित्तेन विना जाता भवने मणिवेदिका ॥१०॥ भूषणं भ्रमरा एव निलीनाः कमलाशया । पादयोरेन्द्रनीले च नू पुरे निःप्रयोजने ॥११०॥ तस्या नामिसमेताया भोगं कल्पतरूद्भवम् । भुनानाया दुराख्यानं ग्रन्थकोदिशतैरपि ।।१११॥ इन्द्राज्ञापरितुष्टाभिर्दिक्कुमारीमिरादरात् । कस्मिंश्चित्समये प्राप्त परिचर्या प्रवर्तिता ।।११२।। नन्दाज्ञापय जीवेति कृतशब्दाः ससंभ्रमम् । प्रतीयुः शासनं तस्या लक्ष्मीश्रीधतिकीर्तयः ॥११३॥ स्तुवन्ति काश्चित्तत्काले तां गुणैर्हृदयंगमैः । काश्चित्परमविज्ञाना उपगायन्ति वीणया ॥११॥ अत्यन्तमद्भुतं काश्चिद्गायन्ति श्रवणामृतम् । पादयोर्लोटनं काश्चित्कुर्वते मृदुपाणिकाः ॥११५।। ताम्बूलदायिनी काचित्काचिदासनदायिनी । मण्डलायकरा काचित् सततं पालनोद्यता ॥११६॥ काश्चिदभ्यन्तरद्वारे बाह्यद्वारे तथा परा । गृहीतकुन्तसौवर्णवेत्रदण्डासिहेतयः ॥११७॥ थे, रत्नमय दीपकोंकी प्रभा केवल वैभव बतलानेके लिए ही थी ॥१०.३॥ उसकी मन्द मुसकान ही उत्तम गन्धसे युक्त सुगन्धित चूर्ण थी, कपूरकी सफेद रज केवल कान्तिको नष्ट करनेवाली थी॥१०४॥ उसकी वाणी ही मधुर वीणा थी, परिकरके द्वारा किया हुआ जो बाजा सुननेका कौतूहल था वह मात्र तारोंके समूहको ताडन करना था ॥१०५॥ उसके अधरोष्ठसे प्रकट हुई कान्ति ही उसके शरीरका देदीप्यमान अंगराग था। कुंकुम आदिका लेप गुणरहित तथा सौन्दर्यको कलंकित करनेवाला था ॥१०६॥ उसकी कोमल भुजाएँ ही परिहासके समय पतिपर प्रहार करनेके लिए पर्याप्त थीं, मणालके टुकड़े निष्प्रयोजन थे॥१०७॥ यौवनकी गरमीसे उत्पन्न हुई पसीनेकी बूंदें ही उसके दोनों स्तनोंका आभूषण थीं, उनपर हारका बोझ तो व्यर्थ ही डाला गया था ।।१०८॥ शिलातलके समान विशाल उसकी नितम्बस्थली ही आश्चर्यका कारण थी, महलके भीतर जो मणियोंकी वेदी बनायी गयी थी वह बिना कारण ही बनायी गयी थी॥१०९॥ कमल समझकर बैठे हुए भ्रमर ही उसके दोनों चरणोंके आभूषण थे, उनमें जो इन्द्रनील मणिके नूपुर पहनाये गये थे वे व्यर्थ थे ॥११०॥ नाभिराजके साथ, कल्पवृक्षसे उत्पन्न हुए भोगोंको भोगनेवाली मरुदेवीके पुण्यवैभवका वर्णन करना करोड़ों ग्रन्थोंके द्वारा भी अशक्य है ॥११॥ जब भगवान् ऋषभदेवके गर्भावतारका समय प्राप्त हुआ तब इन्द्रकी आज्ञासे सन्तुष्ट हई दिक्कूमारी देवियाँ बड़े आदरसे मरुदेवीकी सेवा करने लगीं ॥११२॥ वृद्धिको प्राप्त होओ', 'आज्ञा देओ', 'चिरकाल तक जीवित रहो' इत्यादि शब्दोंको सम्भ्रमके साथ उच्चारण करनेवाली लक्ष्मी, श्री, धृति और कीर्ति आदि देवियाँ उसकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करने लगीं ॥११३॥ उस समय कितनी ही देवियां हृदयहारी गुणोंके द्वारा उसकी स्तुति करती थीं, और उत्कृष्ट विज्ञानसे सम्पन्न कितनी ही देवियाँ वीणा बजाकर उसका गुणगान करती थीं ॥११४॥ कोई कानोंके लिए अमृतके समान आनन्द देनेवाला आश्चर्यकारक उत्तम गान गाती थीं और कोमल हाथोंवाली कितनी ही देवियाँ उसके पैर पलोटती थीं ॥११५।। कोई पान देती थी, और कोई आसन देती थी और कोई तलवार हाथमें लेकर सदा रक्षा करने में तत्पर रहती थी ॥११६।। कोई महलके द्वारपर और कोई महलके बाहरी द्वारपर भाला, सुवर्णकी छड़ी, दण्ड और तलवार आदि हथि १. निर्मितेन म., ख.। २. प्राप्ता ख., प्राप्त क.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy