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________________ प्रधान सम्पादकीय यह बात श्वेताम्बर मान्यता के अनुकूल पड़ती है और दिगम्बर मान्यता के प्रतिकूल, क्योंकि, यहाँ यह माना गया है कि केवलज्ञान उत्पन्न होने के पश्चात् भगवान् छयासठ दिन तक मौनपूर्वक विहार करते हुए ही विपुलाचल पर्वत पर आये थे और यहीं उनका सर्वप्रथम उपदेश हुआ था । पउम चरि ३,६२ में ऋषभ भगवान् के जन्मसे पूर्व उनकी माता मरुदेवी के स्वप्नों का उल्लेख है । यहाँ स्वप्नों की गणना प्रेमीजीने तथा प्रस्तुत ग्रन्यके सम्पादकने पन्द्रह लगाकर उसे श्वेताम्बर दिगम्बर दोनों मान्यताओंसे पृथक कहा है । किन्तु यथार्थतः ऐसी बात नहीं है। जिन भगवान्‌की माता के स्वप्नोंका प्रसंग ग्रन्थ में एक स्थानपर और आता है जहाँ तीर्थंकर मुनि सुव्रतनाथके जन्मका वर्णन है । राम उन्हीं के तीर्थंकाल में हुए माने गये हैं । यह स्वप्नों का उल्लेख निम्न प्रकार है अहसा सुहं पत्ता रयणीए पच्छिमम्मि जामस्मि । पेच्छइ चउदस सुमिणे पसत्थ-जोगेण कल्लाणी ।। २१, १२ गय-वसह सीह - अभिसेयदाम-ससि दिणयरं झयं कुंभं । पउमसर-सागर - विमाण भवण रयणुच्चय- सिहिं च ।। २१, १३ यहाँ ग्रन्थकारने स्वयं कह दिया है कि माताको चौदह स्वप्न हुए थे जो उन्होंने गिना भी दिये हैं । इनमें और मरुदेवी स्वप्नोंमें यदि कोई भेद है तो केवल इतना हो कि यहाँ जो अभिषेक दाम कहा गया है। वही वहाँ 'वरसिरि-दाम' रूपसे उल्लिखित है । इसे पूर्वोक्त विद्वानोंने लक्ष्मी और पुष्पमाला ऐसा पृथक् दो स्वप्न मानकर स्वप्नोंकी संख्या पन्द्रह निकाली है । किन्तु मुनिसुव्रतनाथके जन्म समयके स्वप्नों के उल्लेख से सुस्पष्ट हो जाता है कि 'वरश्रीदाम' और 'अभिषेकदाम' एक ही शोभायुक्त या अभिषेक योग्य पुष्पमालाका वाची होकर स्वप्नोंकी संख्याको चौदह ही सिद्ध करता है । पउमचरिय २१, १३ में स्वप्नोंको गिनानेवाली गाथा ठीक वही है जो 'छठे श्रुतांग णायाधम्मकहाओ' ( १, १ ) में भी पायी जाती है । इन स्वप्नोंका जब हम पद्मपुराण (३,१२४ - १३९ ) में उल्लिखित स्वप्नोंसे मिलान करते हैं तब स्वप्नोंका क्रम ठीक वही होते हुए जो संख्या व नामोंमें भेद उत्पन्न करनेवाले स्थल हैं वे एक तो वही 'वरश्रीदाम' वाला जहाँ श्रीलक्ष्मी और पुष्पमालाएँ ऐसे दो स्वप्न गये हैं । दूसरे जहाँ 'झयं' ध्वज ) का उल्लेख है वहीं 'मत्स्य' ( मछली ) का पाया जाना झष ( मछली ) और झय ध्वज के पाठभेद या भ्रान्तिको सूचित करता है । एवं सागर और विमान के बीच 'सिंहासन' अधिक आया है । हमें प्रतीत होता है कि स्वप्नोंके नामों और संख्याका भेद ऐसा ही तो न हो जैसा स्वर्गों की १२ और १६ की संख्याको किसी समय सम्प्रदाय भेद सूचक माना जाता था, किन्तु तिलोयपण्णत्ति में दोनों का उल्लेख साथ-साथ मिल जानेसे अब वह सम्प्रदाय भेदका सूचक नहीं माना जाता । इस विषयपर विचार किये जानेकी आवश्यकता है । पउमचरियके कर्ता सम्प्रदाय के सम्बन्ध में प्रेमीजीकी यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि इस कथा - नकका अनुसरण करनेवाले अपभ्रंश कवि स्वयंभूको एक प्राचीन टिप्पणकारने यापुलीय ( यापनीय ) संघका कहा | आश्चर्य नहीं जो विमलसूरि उसी परम्परा के हों। यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि यापनीय सम्प्रदायका प्रायः पूर्णतः विलीनीकरण दिगम्बर सम्प्रदायमें हुआ है और यह बात शिलालेखोंसे प्रमाणित हैं । पद्मपुराणका यह संस्करण अनुवाद सहित तैयार करनेमें पं. पन्नालालजी साहित्याचार्यंने जो परिश्रम किया है वह प्रशंसनीय है । इधर जिस तीव्र गति से यह प्राचीन साहित्य बड़े सुन्दर ढंगसे ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित हो रहा है, उसके लिए ज्ञानपीठकी अध्यक्षा श्रीमती रमारानीजीका हम विशेष रूपसे अभिनन्दन करते हैं । ज्ञानपीठके मन्त्री व संचालक आदि कार्यकर्ताओं को भी हम उनकी तत्परता के लिए हृदय से धन्यवाद देते हैं । Jain Education International For Private & Personal Use Only हीरालाल जैन आ. ने, उपाध्ये ग्रन्थमाला सम्पादक www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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