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________________ ६ पद्मपुराण मतको ओर झुकता है । तात्पर्य यह कि प्राकृत पउमचरियके रचनाकालके सम्बन्धमें सन्देह और विवाद है । निश्चित केवल इतना ही है कि उद्योतन सूरिने अपनी जिस कुवलयमाला नामक कृतिको शक संवत् ७०० वि. सं. ८३५ में समाप्त किया था, उसमें रविषेणकी रचनाका भी उल्लेख है और पउमचरियका भी । अतएव निश्चित इतना हो कहा जा सकता है कि पउमचरिय वि. सं. ८३५ से पूर्व की रचना है । इस काल सूचनासे पद्मपुराण और पउमचरियकी रचनाका पूर्वापरत्व अनिर्णीत रह जाता है । अतएव यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि किसने किसका अनुवाद किया। इसका कुछ विचार पं. नाथूरामजी प्रेमीने अपने एक लेखमें किया था जो 'पद्मचरित और पउमचरिय' शीर्षक से सन् १९४२ में अनेकान्त, वर्ष ५, किरण १-२ में और तत्पश्चात् उनके 'जैन साहित्य और इतिहास' [ प्रथम संस्करण १९४२, द्वि. सं. १९५६ ] के अन्तर्गत प्रकाशित । प्रेमीजी ने उक्त विषयक जो अनेक महत्त्वपूर्ण बातें बतलायी हैं उनका उल्लेख प्रस्तुत ग्रन्थ के सम्पादकने अपनी प्रस्तावना में किया है । किन्तु जो महत्त्वपूर्ण चर्चा प्रेमीजीने अपने लेख में उक्त दोनों ग्रन्थोंके पूर्वापरत्वके सम्बन्ध में कुछ प्रकाश डालनेवाली की है, उसको यहाँ सर्वथा भुला दिया गया है। संक्षेपमें, प्रेमीजीने तीन बातें बतलायी हैं । एक तो यह कि प्राकृत से संस्कृत में अनुवादके तो प्राचीन जैन साहित्य में बहुत उदाहरण मिलते हैं, किन्तु संस्कृतसे इतने बड़े पैमाने पर प्राकृत में अनुवादके कोई उदाहरण नहीं मिलते। दूसरे वर्णन में पउमचरियमें संक्षेत्र और पद्मपुराण में विस्तार पाया जाता है । और तीसरे 'माण' [ ब्राह्मण ] की उत्पत्तिके सम्बन्धकी जो कथा रविषेणके पद्मपुराण [ ४, १२२ ] में पायी जाती है, उससे उसके प्राकृत स्रोतका ही अनुमान होता है, क्योंकि माहण शब्द प्राकृतका है और उसीको एक व्युत्पत्ति प्राकृत उक्ति 'माहण' मत मारोसे सार्थक बैठ सकती है जैसा कि प्राकृत पउमचरिय में पाया जाता है । संस्कृत में 'माहण' शब्दको कहीं स्वीकार नहीं किया गया और न रविषेण सम्प्रदाय व परम्परामें इस शब्दका कोई प्रयोग पाया जाता । इसके विपरीत प्राकृत जैन आगम ग्रन्थों में इस शब्दका बहुत अधिक प्रयोग पाया जाता है। इससे हमें यही मानना पड़ता है कि रविषेणाचार्यने इसे पउमचरियके आधारसे जैसाका तैसा संस्कृत में रख दिया है । यह विषय दृष्टिके ओझल करने योग्य नहीं किन्तु विशेष ध्यान देकर और अधिक अध्ययन करने योग्य है । 1 दोनों ग्रन्थोंके परस्पर तुलनात्मक अध्ययनकी एक दिशा यह भी है, कि जब रविषेणकी कृति सोलहो आने दिगम्बर परम्पराकी है, तब विमलसूरिके पउमचरियको साम्प्रदायिक व्यवस्था क्या है । कुछ विद्वानोंने इस दृष्टिसे पउमचरियका अध्ययन किया है। परिणामतः ग्रन्थ में कुछ बातें ऐसी हैं जो दिगम्बर परम्पराके अनुकूल हैं, कुछ श्वेताम्बर परम्पराके और कुछ ऐसी बातें भी हैं जो दोनोंके प्रतिकूल होकर सम्भवतः किसी तीसरी ही परम्पराकी ओर संकेत करती हैं । इनका उल्लेख प्रस्तावना में आ गया है। उनके अतिरिक्त जो नयी बातें हमारी दृष्टिमें आयी हैं वे निम्न प्रकार हैं १. पउम चरिय २,२२ में भगवान् महावीरको त्रिशलादेवीकी कूंखसे आये कहा गया । यथा तस्स य बहुगुणकलिया भज्जा तिसल्लात्ति रूव-संपन्ना । तीए गब्भम्मि जिणो आयाओ चरिम-समयम्मि ॥ २,२२ यह बात दिगम्बर परम्परा के पूर्णतः अनुकूल है, किन्तु श्वेताम्बर परम्परासे आंशिक रूपसे ही मिलती है, क्योंकि वहाँ भगवान् के देवानन्दाकी कुँखमें आने का भी उल्लेख है । · २. पउम चरिय २,३६-३७ में भगवान् महावीरके केवलज्ञान उत्पन्न होनेके पश्चात् उपदेश करते हुए विहारकर विपुलाचल पर्वतपर आने की बात कही गयी है । यथा एवं सो मुणि-वसहो अट्ट -महा-पाडिहेर परियरिओ । विहरइ जिणिद भाणू बोहिन्तो भविय-कमलाई ॥ अय-विहूइ सहिओ गण गणहरसयल - संघ परियरिओ । विहरन्तो चिचय पत्तो विउल-गिरिदं महावीरो ।। २,३६-३७ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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