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________________ प्रधान सम्पादकीय [द्वितीय संस्करण ] 'पद्मपुराण' के प्रथम भागका प्रकाशन अठारह वर्ष पूर्व सन् १९५८ में हुआ था। उस समय उसका सम्पादकीय डॉ. हीरालाल जैन और डॉ. ए. एन. उपाध्येने लिखा था । आज दोनों ही स्वर्गत हो चुके हैं। अतः मुझे उनके भारको सखेद वहन करना पड़ा है। उन्होंने अपने प्रधान सम्पादकीयमें संस्कृत 'पद्मपुराण' और प्राकृत 'पउमचरिय' को लेकर जो चिन्तनीय बातें उपस्थित की थी, वे बातें आज भी चिन्तनीय ही है । हमने उसी समय प्राकृत 'पउमचरिय' के साथ पद्मपराण' के आद्य दो पर्वोका मिलान करते हुए 'पद्मपराण' की अपनी प्रतिमें 'पउमचरिय' की गाथाओंकी क्रमसंख्या अंकित की थी। वह आज भी हमारे सामने है। 'पउमचरिय' के प्रथम पर्वकी पद्य सं. ३२ से ८९ तक 'पद्मपुराण' के प्रथम पर्वमें श्लोक संख्यासे ४३ से १०१ तक वर्तमान है। केवल दोका अन्तर है। 'पद्मपुराण' के श्लोक ४४ और ४७ का रूपान्तर 'पउमचरिय' में नहीं है ऐसी एकरूपता बिना अनुसरण किये नहीं हो सकती। कहीं-कहीं यत्किचित् परिवर्तन भी देखा जाता है । 'पउमचरिय' में पद्य संख्या ५१ में 'मुणिवरेण' पद है। 'पद्मपुराण' में उसके स्थानमें "दिगम्बरेण' है।। दूसरे पर्वमें भगवान् महावीरके जन्माभिषेकके वर्णनमें आता है कि मेरु पर्वतपर अभिषेकके समय बालकने अपने पैरके अंगठेसे मेरुको कम्पित किया। दिगम्बर परम्पराके साहित्य में अन्यत्र ऐसा वर्णन नहीं मिलता । श्वेताम्बर साहित्यमें तीर्थंकर प्रकृतिके बन्धके बीस कारण माने गये हैं। तदनुसार ही 'पउमचरिय' में भी बीस संख्या निर्दिष्ट है किन्तु 'पद्मपुराण' में दिगम्बर मान्यताके अनुसार सोलह ही कारण कहे हैं। दोनोंका तुलनात्मक अध्ययन करनेसे इस प्रकारको अन्य भी बातें प्रकाशमें आती हैं जो चिन्त्य हैं। समन्तभद्रकी कृतियोंका भी प्रभाव क्वचित् परिलक्षित होता है। यथा १४वें पर्वमें श्लोक ९२ को पढ़ते ही समन्तभद्रके 'स्वयंभूस्तोत्र' का पद्य 'दोषाय नालं कणिका विषस्य' आदि स्मृति पथपर आ जाता है और इसी पर्वका ६०वा श्लोक 'रत्नकरण्ड श्रावकाचार' के 'क्षितिगतमिव वटबीजं' का स्मरण कराता है। इस चौदहवें पर्वमें रावणके पूछनेपर मुनिराज जो धर्मोपदेश देते हैं उसमें मद्य, मांस, मधुके साथ रात्रि भोजनके त्यागपर इतना अधिक बल दिया गया है कि इतना अधिक बल अन्यत्र दृष्टिगोचर नहीं होता। शायद इसका कारण यह हो कि अन्यत्र राक्षसोंको निशाचर कहा है । अस्तु, रामकी कथा सर्वत्र रोचक रूपमें ही मिलती है। इस रोचक कथाके रूपमें कथाकारोंने जनताको जो सदुपदेश दिया है वह मनुष्यजातिके लिए बहुमल्य है। आज विद्वानों में यह चर्चा चलती है कि क्या रामायणको घटना सत्य है? और इसपर विविध ऊहापोह चलते हैं । विद्वान् तो चर्चाओंमें उलझे रहते हैं किन्तु साधारण जन स्त्री और पुरुष सभी राम और सीताके पवित्र जीवनसे अनुप्राणित होकर अपने जीवनको सार्थक करते हैं। राम-जैसा पुत्र और पति तथा सीता जैसी पतिव्रता नारी-ये भारतके उज्ज्वल आदर्शके प्रतीक है। जबतक भारतमें राम और सीताका निष्कलंक आदर्श जीवित है, तबतक नारीके हर्ता रावणोंको इस देश में समादर नहीं मिल सकता। __ भारतीय ज्ञानपीठको अध्यक्षा श्रीमती रमारानी उसी सती सीताको एक सन्तान थी-भारतीय नारीका एक उज्ज्वल प्रतीक । कालचक्रका प्रभाव, कि वे भी सीताजी की तरह स्वर्गवासिनी हो गयीं और अपने पति साह शान्तिप्रसादजीको रामकी तरह हो एकाको छोड़ गयीं। हम बड़े आदरके साथ उनका स्मरण करते हैं । भारतीय साहित्यके उद्धारके लिए उनको लगनशीलता चिरस्मरणीय है। अब साहूजीने उनके भारको वहन किया है अतः आशा और विश्वास है कि मूतिदेवी ग्रन्थमालाका प्रकाशन कार्य उत्तरोत्तर समृद्ध ही होगा । ज्ञानपीठके मन्त्री बा. लक्ष्मीचन्द्रजी उसके लिए पूर्ववत् सतत यत्नशील हैं । -कैलाशचन्द्र शास्त्री Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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