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________________ पद्मपुराणे तत्र 'लुब्धेषु पापेषु शबरादिषु जायते । आर्यदेशेऽपि संप्राप्ते दुःकुलेषूपजायते ॥१६॥ लब्धेऽपि सुकुले काणकुण्ठादितनुसंभवः । संपूर्णकायबन्धेऽपि दुर्लभा हीनरोगता ॥१७॥ एवं सर्वमपि प्राप्य प्रशस्तानां समागमम् । दुर्लभो धर्मसंवेगो विषयास्वादलोभतः ॥१७॥ ततः केचिद भृतिं कृत्वा जठरस्यापि परणम् । कुर्वतेऽत्यन्तदुःखेन दूरतो विभवोद्भवः ॥१७२॥ रक्तकर्दमबीभत्सशस्त्रसंपातमीषणम् । केचिद विशन्ति संग्राम जिहाकामवशीकृताः ॥१७३।। समस्तजन्तुसंबाधं कृत्वाऽन्ये भूमिकर्षणम् । कुटुम्बभरणक्लेशात् कुर्वते नृपपीडिताः ॥१७॥ एवं यद्यप्रकुर्वन्ति कर्म सौख्याभिलाषिणः । तत्र तत्र प्रपद्यन्ते जन्तवो दुःखमुत्तमम् ॥१७५।। अवाप्यापि धनं केशाचोराग्निजलराजतः । पालयन् परमं दुःखमवाप्नोत्याकुलः सदा ।।१७६॥ संप्राप्तं रचितं द्रव्यं भुञानस्यापि नो शमः । प्रतिवासरसंवृद्धगाग्निपरिवर्तनात् ॥१७७॥ प्राप्नोति धर्मसंवेगं कथंचित् पूर्वकर्मतः । संसारपदवीमेव नीयतेऽन्यदुरात्मभिः ॥१७॥ अन्यैस्ते नाशिताः सन्तो नाशयन्त्यपरान् जनान् । धर्मसामान्यशब्देन सेवमानाः परम्पराम् ॥१७९॥ कथं चेतोविशुद्धिः स्यात् परिग्रहवतां सताम् । चेतोविशुद्धिमूला च तेषां धर्मे स्थितिः कुतः ॥१८०॥ करता हुआ यह जीव बहुत समयके बाद बड़े दुःखसे मनुष्य भवको प्राप्त होता है ॥१६८।। उस मनुष्य भवमें यह जीव अधिकांश लोभी तथा पाप करनेवाले शबर आदि नीच पुरुषोंमें ही जन्म लेता है। यदि कदाचित् आयं देश प्राप्त होता है तो वहाँ भी नीच कुलमें ही उत्पन्न होता है ॥१६९।। यदि भाग्यवश उच्च कुल भी मिलता है तो काना-लूला आदि शरीर प्राप्त होता है । यदि कदाचित् शरीरको पूर्णता होती है तो नीरोगताका होना अत्यन्त दुर्लभ रहता है ।।१७०॥ इस तरह यदि कदाचित् समस्त उत्तम वस्तुओंका समागम भी हो जाता है तो विषयोंके आस्वादका लोभ रहनेसे धर्मानुराग दुर्लभ ही रहा आता है ॥१७१।। इस संसारमें कितने ही लोग ऐसे हैं जो दूसरोंकी नौकरी कर बहुत भारी कष्टसे पेट भर पाते हैं उन्हें वैभवकी प्राप्ति होना तो दूर रहा ॥१७२॥ कितने ही लोग जिह्वा और काम इन्द्रियके वशीभूत होकर ऐसे संग्राममें प्रवेश करते हैं जो कि रक्तकी कोचडसे घणित तथा शस्त्रोंकी वर्षासे भयंकर होता है ॥१७३।। कितने ही लोग अनेक जीवोंको बाधा पहुँचानेवाली भूमि जोतनेकी आजीविका कर बड़े क्लेशसे अपने कुटुम्बका पालन करते हैं और उतनेपर भी राजाओंकी ओरसे निरन्तर पीड़ित रहते हैं।।१७४।। इस तरह सुखकी इच्छा रखनेवाले जीव जो कार्य करते हैं वे उसी में बहुत भारी दुःखको प्राप्त करते हैं ॥१७५।। यदि किसी तरह कष्टसे धन मिल भी जाता है तो चोर, अग्नि, जल और राजासे उसकी रक्षा करता हुआ यह प्राणी बहुत दुःख पाता है और उससे सदा व्याकुल रहता है ॥१७६॥ यदि प्राप्त हुआ धन सुरक्षित भी रहता है तो उसे भोगते हुए इस प्राणीको कभी शान्ति नहीं होती क्योंकि उसकी लालसारूपी अग्नि प्रति दिन बढ़ती रहती है ॥१७७॥ यदि किसी तरह पूर्वोपार्जित पुण्य कर्मके उदयसे धर्म भावनाको प्राप्त होता भी है तो अन्य दुष्टजनोंके द्वारा पुनः उसी संसारके मार्गमें ला दिया जाता है ॥१७८॥ अन्य पुरुषोंके द्वारा नष्ट हुए सत्पुरुष अन्य लोगोंको भी नष्ट कर देते हैं-पथभ्रष्ट कर देते हैं और धर्मसामान्यकी अपेक्षा केवल रूढ़िका ही पालन करते हैं ॥१७९॥ परिग्रही मनुष्योंके चित्तमें विशुद्धता कैसे हो सकती है और जिसमें चित्तकी विशुद्धता ही मूल कारण है ऐसी धर्मकी स्थिति उन परिग्रही मनुष्यों में १. लब्धेषु म.। २. हि निरोगता ख., म. । ३. दुर्लभं क. । ४. अनन्त म.। ५. कुर्वन्ति म. । ६. गर्भाग्नि म.। ७. परंपरम् क । परस्परम् म. । ८. मूलाच्च म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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