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________________ द्वितीयं पर्व यावत्परिग्रहासक्तिस्तावत्प्राणिनिपीडनम् । हिंसातः संसृतेर्मूलं दुःखं संसारसंज्ञकम् ।।१८।। परिग्रहपरिष्वङ्गाद् द्वेषो रागश्च जायते । रागद्वेषौ च संसारे दुःखस्योत्तमकारणम् ॥१८२॥ लब्ध्वापि दर्शनं सम्यक् प्रशमादर्शनावृतेः । चारित्रं न प्रपद्यन्ते चारित्रावरणावृताः ॥१८३॥ चारित्रमपि संप्राप्ताः कुर्वन्तः परमं तपः । परीषहैः पुनर्भङ्ग नीयन्ते "दुःखविक्रमैः ॥१८॥ अणुव्रतानि सेवन्ते केचिद् भङ्गमुपागताः । केचिदर्शनमात्रेण भवन्ति परितोषिणः ॥१८५।। केचिद् गम्भीरसंसारकूपहस्तावलम्बनम् । सम्यग्दर्शनमुत्सृज्य मिथ्यादृष्टिमुपासते ॥१८॥ मिथ्यादर्शनसंयुक्तास्ते पुनर्मवसंकटे । भ्राम्यन्ति सततं जीवा दुःखाग्निपरिवर्तिनः ॥१८७॥ केचित्तु पुण्यकर्माणश्चारित्रमवलम्बितम् । निर्वहन्ति महाशूरा यावयाणविवर्जनम् ॥१८॥ ते समाधि समासाद्य कृत्वा देहविसर्जनम् । वासुदेवादितां यान्ति निदानकृतदोषतः ।।१८९॥ ते पुनः परपीडायां रता निर्दयचेतसः । नरकेषु महादुःखं प्राप्नुवन्ति सुदुस्तरम् ।।१९०॥ केचित्तु सुतपः कृत्वा यान्ति गीर्वाणनाथताम् । अपरे बलदेवत्वमन्येऽनुत्तरवासिताम् ॥१९१॥ केचित्प्राप्य महासत्त्वा जिनकर्माणि षोडश । तीर्थकृत्त्वं प्रपद्यन्ते त्रैलोक्यक्षोभकारणम् ।।१९२॥ केचिनिरन्तरायेण त्रितयाराधने रताः । द्वित्रैर्भवैर्विमुच्यन्ते कर्माष्टककलङ्कतः ॥१९३।। संप्राप्ताः परमं स्थानं मुक्तानामुपमोज्झितम् । अनन्तं निःप्रतिद्वन्द्वं लभन्ते सुखमुत्तमम् ॥१९॥ कहाँसे हो सकती है ॥१८०।। जब तक परिग्रहमें आसक्ति है तब तक प्राणियोंकी हिंसा होना निश्चित है। हिंसा ही संसारका मूल कारण है और दुःखको ही संसार कहते हैं ॥१८१।। परिग्रहके सम्बन्धसे राग और द्वेष उत्पन्न होते हैं तथा राग और द्वेष ही संसार सम्बन्धी दुःखके प्रबल कारण हैं ॥१८२॥ दर्शनमोह कर्मका उपशम होनेसे कितने ही प्राणी यद्यपि सम्यग्दर्शन प्राप्त कर लेते हैं तथापि चारित्र मोहके आवरणसे आवृत रहनेके कारण वे सम्यक् चारित्रको प्राप्त नहीं कर सकते ॥१८३।। कितने ही लोग सम्यक् चारित्रको पाकर श्रेष्ठ तप भी करते हैं परन्तु दुःखदायी परिषहोंके निमित्तसे भ्रष्ट हो जाते हैं ॥१८४॥ परिषहोंके निमित्तसे भ्रष्ट हुए कितने ही लोग अणुव्रतोंका सेवन करते हैं और कितने ही केवल सम्यग्दर्शनसे सन्तुष्ट रह जाते हैं अर्थात् किसी प्रकारका व्रत नहीं पालते हैं ॥१८५॥ कितने ही लोग संसाररूपी गहरे कुएंसे हस्तावलम्बन देकर, निकालनेवाले सम्यग्दर्शनको छोड़कर फिरसे मिथ्यादर्शनकी सेवा करने लगते हैं ॥१८६॥ तथा ऐसे मिथ्यादृष्टि जीव निरन्तर दुःखरूपी अग्निके बीच रहते हुए संकटपूर्ण संसारमें भ्रमण करते रहते हैं ॥१८७।। कितने ही ऐसे महाशूरवीर पुण्यात्मा जीव हैं जो ग्रहण किये हुए चारित्रको जीवन पर्यन्त धारण करते हैं ॥१८८। और समाधिपूर्वक शरीर त्याग कर निदानके दोषसे नारायण आदि पदको प्राप्त होते हैं ॥१८९॥ जो नारायण होते हैं वे दूसरोंको पीड़ा पहुँचानेमें तत्पर रहते हैं तथा उनका चित्त निर्दय रहता है इसलिए वे मरकर नियमसे नरकोंमें भारी दुःख भोगते हैं ॥१९०|| कितने ही लोग सुतप करके इन्द्र पदको प्राप्त होते हैं। कितने ही बलदेव पदवी पाते हैं और कितने ही अनुत्तर विमानोंमें निवास प्राप्त करते हैं ॥१९१॥ कितने ही महाधैर्यवान् मनुष्य षोडश कारण भावनाओंका चिन्तवन कर तीनों लोकोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाले तीर्थंकर पद प्राप्त करते हैं ॥१९२॥ और कितने ही लोग निरन्तराय रूपसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक् चारित्रकी आराधनामें तत्पर रहते हुए दो-तीन भवमें ही अष्ट कर्मरूप कलंकसे मुक्त हो जाते हैं ॥१९३।। वे फिर मुक्त जीवोंके उत्कृष्ट एवं निरुपम स्थानको पाकर अनन्त काल तक निर्बाध उत्तम सुखका उपभोग १. निपीडना क.। २. हिंसा च म.। ३. संसारदुःखस्योत्पत्तिकारणम् म. । ४. नीयते म. । ५. दुरतिक्रमः म.। ६. विसर्जनम् म. । ७. मन्ये तूत्तरवासिताम् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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