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________________ पद्मपुराणे दलन्तमिव दर्पण श्वसन्तमिव शौर्यतः । मदान्मूर्छामिवायान्तं गुह्यन्तमिव यौवनात् ।।११८॥ स्निग्धं नखप्रदेशेषु परुषं रोमगोचरे । सच्छिष्यं विनयावाप्तौ परमं गुरुमानने ॥११९॥ मृदुमूर्धानमत्यन्तदृढं परिचयग्रहे । दीर्घमायुषि हस्वत्वं दधतं स्कन्धबन्धने ॥१२०॥ दरिद्रमुदरे नित्यं प्रवृत्तं दानवमनि । नारदं कलहप्रीती गरुडं नागनाशने ।।१२१॥ प्रदोषमिव राजन्तं चारुनक्षत्रमालया। महाघण्टाकृतारावं रक्तचामरमण्डितम् ।।१२२॥ सिन्दूरारुणितोत्तुङ्गकुम्भकूटमनोहरम् । ऐरावतं समारुह्य प्रावर्तत सुराधिपः ।।१२३॥ प्राप्तश्च सहितो देवैरारूढनिजवाहनैः । जिनेन्द्रादर्शनोत्साहोत्फुल्लाननसरोरुहैः ॥१२४॥ कमलायुधमुख्याश्च नभश्चरजनाधिपाः । संप्राप्ताः सहपलीका नानालंकारधारिणः ॥१२५॥ ततस्तुष्टाव देवेन्द्रो वचसाश्चर्यमीयुषा । गुणैरवितथैर्दिव्यैरत्यन्तविमलैरिति ॥१२६॥ त्वया नाथ जगत्सुतं महामोहनिशागतम् । ज्ञानभास्करबिम्बेन बोधितं पुरुतेजसा ।।१२७।। नमस्ते वीतरागाय सर्वज्ञाय महात्मने । याताय दुर्गमं कूलं संसारोदन्वतः परम् ॥१२८॥ भवता सार्थवाहेन भव्यचेतनवाणिजाः । यास्यन्ति वितनुस्थानं दोषचारैरलुण्टिताः ॥१२९॥ प्रवर्तितस्त्वया पन्था विमल: सिद्धगाभिनाम् । कर्मजालं च निर्दग्धं ज्वलितध्यानवह्निना ।।१३०॥ जान पड़ता था मानो साँस ही ले रहा हो, मदसे ऐसा प्रतीत होता था मानो मूर्छाको ही प्राप्त हो रहा हो और यौवनसे ऐसा विदित होता था मानो मोहित ही हो रहा हो। जिसके नखोके प्रदेश चिकने और शरीरके रोम कठोर थे, विनयके ग्रहण करनेमें जो समीचीन शिष्यके समान जान पड़ता था, जो मुखमें परम गुरु था अर्थात् जिसका मुख बहुत विस्तृत था, जिसका मस्तक कोमल था, जो परिचयके ग्रहण करने में अत्यन्त दृढ़ था, जो आयुमें दीर्घता और स्कन्धमें ह्रस्वता धारण करता था अर्थात् जिसकी आयु विशाल थी और गरदन छोटी थी, जो उदरमें दरिद्र था अर्थात् जिसका पेट कश था. जो दानके मार्गमें सदा प्रवत्त रहता था अर्थात जिसके गण्डस्थलोंसे सदा मद झरता रहता था, जो कलहसम्बन्धी प्रेमके धारण करनेमें नारद था अर्थात् नारदके समान कलहप्रेमी था, जो नागोंका नाश करनेके लिए गरुड़ था, जो सुन्दर नक्षत्रमाला ( सत्ताईस दानोंवाली माला पक्षमें नक्षत्रोंके समूह ) से प्रदोष-रात्रिके प्रारम्भके समान जान पड़ता था, जो बड़े-बड़े घण्टाओंका शब्द कर रहा था, जो लालरंगके चमरोंसे विभूषित था और जो सिन्दूरके द्वारा लाल-लाल दिखनेवाले उन्नत गण्डस्थलोंके अग्रभागसे मनोहर था ॥११४-१२३॥ जिनेन्द्र भगवान्के दर्शन सम्बन्धी उत्साहसे जिनके मुखकमल विकसित हो रहे थे ऐसे समस्त देव अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर इन्द्रके साथ आ मिले ॥१२४॥ देवोंके सिवाय नाना अलंकारोंको धारण करनेवाले कमलायुध आदि विद्याधरोंके राजा भी अपनी-अपनी पत्नियोंके साथ आकर एकत्रित हो गये ।।१२५।। तदनन्तर भगवान्के वास्तविक, दिव्य तथा अत्यन्त निर्मल गुणोंके द्वारा आश्चर्यको प्राप्त हुए वचनोंसे इन्द्रने निम्न प्रकार स्तुति की ॥१२६॥ हे नाथ ! महामोहरूपी निशाके बीच सोते हुए इस समस्त जगत्को आपने अपने विशाल तेजके धारक ज्ञानरूपी सूर्यके बिम्बसे जगाया है ॥१२७।। हे भगवन् ! आप वीतराग हो, सर्वज्ञ हो, महात्मा हो, और संसाररूपी समुद्रके दुर्गम अन्तिम तटको प्राप्त हुए हो अतः आपको नमस्कार हो ॥१२८|| आप उत्तम सार्थवाह हो, भव्य जीवरूपी व्यापारी आपके साथ निर्वाण धामको प्राप्त करेंगे और मार्गमें दोषरूपी चोर उन्हें नहीं लूट सकेंगे ॥१२९|| आपने मोक्षाभिलाषियोंको निर्मल मोक्षका मार्ग -क., म.। १. रामगोचरे म.। २. नागशासने म. । ३. पारावतं म. । ४. समासाद्य म. । ५. -त्साहफुल्ला ६. सुप्ते म. । ७. यतोऽद्य म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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