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________________ पद्मपुराणे साहसानि महिम्नो न नोत्साहस्य च चेष्टितम् । दिगाननानि नो 'कीर्तेर्न संख्या गुणसंपदः ॥ ६६ ॥ चित्तानि नानुरागस्य जनस्याखिलभूतले । कला न कुशलत्वस्य न प्रतापस्य शत्रवः ||६७ || कथमस्मद्विधैस्तैय शक्यन्ते गदितुं गुणाः । यस्येन्द्रसदसि ज्ञातं सम्यग्दर्शनमुत्तमम् ॥ ६८ ॥ उद्धतेषु सता तेन वज्रदण्डेन शत्रुषु । तपोधनसमृद्धेषु नैमता वेतसायितम् ||६९॥ रक्षिता बाहुदण्डेन सकला तस्य मेदिनी । पुरस्य स्थितिमात्रं तु प्राकारपरिखादिकम् ॥७०॥ तत्पत्नी चेलनानाम्नी' शोलाम्बरविभूषणा । सम्यग्दर्शनसंशुद्धा श्रावकाचारवेदिनी ॥ ७१ ॥ एकदा तु पुरस्यास्य समीपं जिनसत्तमः । श्रीमान् प्राप्तो महावीरः सुरासुरनतक्रमः ॥७२॥ मातुरप्युदरे यस्य दिक्कुमारीविशोधिते । ज्ञानत्रयसमेतस्य सुखमासीत् सुरेन्द्रजम् ॥७३॥ जन्मनोऽर्वाक्पुरस्ताच्च यस्य शक्रनिदेशतः । अपूरयत् पितुः सद्म धनदो रत्नवृष्टिभिः ॥७४ || जननाभिषवे यस्य नगराजस्य मूर्द्धनि । चक्रे महोत्सवो देवैराखण्डलसमन्वितैः ॥७५|| पादाङ्गुष्ठेन यो मेरुमनायासेन कम्पयन् । लेभे नाम महावीर इति नाकालयाधिपात् ॥ ७६ ॥ अमृतेन निषिक्तेन यस्याङ्गुष्टेऽमरेशिना । वृत्तिरासीच्छरीरस्य बालस्याबालकर्मणः ||७७|| १६ अर्थात् वह जितनी कविता कर सकता था उतनी सरस्वती नहीं थी - उतना शब्द भण्डार नहीं था ||६५ || साहसपूर्ण कार्य उसकी महिमाका अन्त नहीं पा सके थे, चेष्टाएँ उसके उत्साहकी सीमा नहीं प्राप्त कर सकी थीं, दिशाओंके अन्त उसकी कीर्तिका अवसान नहीं पा सके थे और संख्या उसकी गुणरूप सम्पदाकी पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकी थी अर्थात् उसकी गुणरूपी सम्पदा संरक्षासे रहित थी – अपरिमित थी ||६६ || समस्त पृथिवीतलपर मनुष्योंके चित्त उसके अनुरागकी सीमा नहीं पा सके थे, कला चतुराई उसकी कुशलताको अवधि नहीं प्राप्त कर सकी थीं और शत्रु उसके प्रताप-तेजकी पूर्णता प्राप्त नहीं कर सके थे || ६७ || इन्द्रकी सभा में जिसके उत्तम सम्यग्दर्शनकी चर्चा होती थी उस राजा श्रेणिकके गुण हमारे जैसे तुच्छ शक्तिके धारक पुरुषों के द्वारा कैसे कहे जा सकते हैं ||६८ || वह राजा, उद्दण्ड शत्रुओंपर तो वज्रदण्डके समान कठोर व्यवहार करता था और तपरूपी धनसे समृद्ध गुणी मनुष्योंको नमस्कार करता हुआ उनके साथ बेंत के समान आचरण करता था || ६९ || उसने अपने भुजदण्डसे ही समस्त पृथिवीकी रक्षा की थी —- नगरके चारों ओर जो कोट तथा परिखा आदिक वस्तुएँ थीं वह केवल शोभाके लिए ही थीं ||७० || राजा श्रेणिककी पत्नीका नाम चेलना था । वह शीलरूपी वस्त्राभूषणों से सहित थी । सम्यग्दर्शनसे शुद्ध थी तथा श्रावकाचारको जाननेवाली थी ॥ ७१ ॥ किसी एक समय, अनन्त चतुष्यरूपी लक्ष्मीसे सम्पन्न तथा सुर और असुर जिनके चरणोंको नमस्कार करते थे ऐसे महावीर जिनेन्द्र उस राजगृह नगर के समीप आये ||७२ || वे महावीर जिनेन्द्र, जो कि दिक्कुमारियोंके द्वारा शुद्ध किये हुए माताके उदरमें भी मति, श्रुत तथा अवधि इन तीन ज्ञानोंसे सहित थे तथा जिन्हें उस गर्भवासके समय भी इन्द्रके समान सुख प्राप्त था || ७३ || जिनके जन्म लेने के पहले और पीछे भी इन्द्रके आदेशसे कुबेरने उनके पिताका घर रत्नोंकी वृष्टिसे भर दिया था ||७४ || जिनके जन्माभिषेकके समय देवोंने इन्द्रोंके साथ मिलकर सुमेरु पर्वत के शिखरपर बहुत भारी उत्सव किया था || ७५ || जिन्होंने अपने पैर के अँगूठोंसे अनायास ही सुमेरु पर्वतको कम्पित कर इन्द्रसे 'महावीर' ऐसा नाम प्राप्त किया था ||७६ || बालक होनेपर भी अबालकोचित कार्य करनेवाले जिन महावीर जिनेन्द्रके शरीरकी वृत्ति इन्द्रके द्वारा अँगूठेमें सींचे हुए अमृत से होती १. कीर्ति - म. । २. शात्रवः म. । ३. -मस्मद्विधेस्तस्य म । ४. न मता चेतसायति ( १ ) म. । ५. एष श्लोक: 'क.' पुस्तके नास्ति । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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