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________________ द्वितीयं पर्व क्रियासु दानयुक्तासु महासाधनदर्शनम् । बृहत्कीटपरिज्ञानं मदोत्कटगजेषु तु ॥५६॥ सर्वस्याग्रेसरे प्रीतिर्यशस्यत्यन्तमुन्नता । जरत्तृणसमा बुद्धिर्जीविते तु विनश्वरे ॥५७॥ प्रसाधनमतिः प्राप्तकरास्वाशासु संततम् । आत्मीयासु तु मार्यासु विबोधश्चार्यपुत्रकः ॥५॥ गुणावनमिते चापे प्रतिपत्तिः सहायजा । न पिण्डमात्रसंतुष्टे भृत्यवर्गेऽपचारिणि ॥५९॥ वातोऽपि नाहरत्किंचिद्यत्र रक्षति मेदिनीम् । प्रावर्तन्त न हिंसायां कराः पशुगणा अपि ।।६०॥ वृषघातीनि नो यस्य चरितानि हरेरिव । नैश्वर्यचेषितं दक्षवर्गतापि पिनाकिवत् ॥६॥ गोत्रनाशकरी चेष्टा नामराधिपतेरिव । नातिदण्डग्रहप्रीतिर्दक्षिणाशाविमोरिव ॥६२॥ वरुणस्येव न द्रव्यं निरिंशग्राहरक्षितम् । निःफला संनिधिप्राप्ति!त्तराशापतेरिव ॥६३॥ बुद्धस्येव न निर्मुक्तमर्थवादेन दर्शनम् । न श्रीबहुलदोषोपधातिनी शीतगोरिव ॥६॥ त्यागस्य नार्थिनो यस्य पर्याप्तिं समुपागताः । प्रज्ञायाश्च न शास्त्राणि कवित्वस्य न मारती ॥६५॥ जिनमें दान दिया जाता था, ऐसी क्रियाओंको धार्मिक अनुष्ठानोंको ही वह कार्यकी सिद्धिका श्रेष्ठ साधन समझता था। मदसे उत्कट हाथियोंको तो वह दीर्घकाय कीड़ा ही मानता था ॥५६॥ सबके आगे चलनेवाले यशमें ही वह बहुत भारी प्रेम करता था। नश्वर जीवनको तो वह जीर्ण तृणके समान तुच्छ मानता था ।।५७|| वह आर्यपुत्र कर प्रदान करनेवाली दिशाओंको ही सदा अपना अलंकार समझता था। स्त्रियोंसे तो सदा विमुख रहता था ।।५८।। गुण अर्थात् डोरीसे झुके धनुषको ही वह अपना सहायक समझता था। भोजनसे सन्तुष्ट होनेवाले अपकारी सेवकोंके समूहको वह कभी भी सहायक नहीं मानता था ।।५९॥ उसके राज्यमें वायु भी किसीका कुछ हरण नहीं करती थी फिर दूसरोंकी तो बात ही क्या थी। इसी प्रकार दुष्ट पशुओंके समूह भी हिंसामें प्रवृत्त नहीं होते थे फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या थी ॥६०॥ हरि अर्थात् विष्णुकी चेष्टाएँ तो वृषघाती अर्थात् वृषासुरको नष्ट करनेवाली थीं पर उसकी चेष्टाएँ वृषघाती अर्थात् धर्मका घात करनेवाली नहीं थीं। इसी प्रकार महादेवजीका वैभव दक्षवगंतापि अर्थात् राजा दक्षके परिवारको सन्ताप पहुँचानेवाला था परन्तु उसका वैभव दक्षवर्गतापि अर्थात् चतुर मनुष्यों के समूहको सन्ताप पहुँचानेवाला नहीं था ॥६१।। जिस प्रकार इन्द्रकी चेष्टा गोत्रनाशकरी अर्थात् पर्वतोंका नाश करनेवाली थी उस प्रकार उसकी चेष्टा गोत्रनाशकारी अर्थात् वंशका नाश करनेवाली नहीं थी और जिस प्रकार दक्षिण दिशाके अधिपति यमराजके अतिदण्डग्रहप्रीति अर्थात् दण्डधारण करने में अधिक प्रीति रहती है उस प्रकार उसके अतिदण्डग्रहप्रीति अर्थात् बहुत भारी सजा देने में प्रीति नहीं रहती थी ॥६२।। जिस प्रकार वरुणका द्रव्य मगरमच्छ आदि दुष्ट जलचरोंसे रहित होता है उस प्रकार उसका द्रव्य दुष्ट मनुष्योंसे रक्षित नहीं था अर्थात् उसका सब उपभोग कर सकते थे और जिस प्रकार कुबेरकी सन्निधि अर्थात् उत्तमनिधिका पाना निष्फल है उस प्रकार उसको सन्निधि अर्थात् सज्जनरूपी निधिका पाना निष्फल नहीं था ॥६३॥ जिस प्रकार बुद्धका दर्शन अर्थात् अर्थवाद-वास्तविकवादसे रहित होता है उस प्रकार उसका दर्शन अर्थात् साक्षात्कार अर्थवाद-धनप्राप्तिसे रहित नहीं होता था और जिस प्रकार चन्द्रमाकी भी बहुलदोषोपघातिनी अर्थात कृष्णपक्षकी रात्रिसे उपहत-नष्ट हो जाती है उस प्रकार उसकी भी बहलदोषोपघातिनी अर्थात् बहुत भारी दोषोंसे नष्ट होनेवाली नहीं थी ॥६॥ याचकगण उसके त्यागगुणकी पूर्णताको प्राप्त नहीं हो सके थे अर्थात् वह जितना त्याग-दान करना चाहता था उतने याचक नहीं मिलते थे। शास्त्र उसकी बुद्धिकी पूर्णताको प्राप्त नहीं थे, अर्थात् उसकी बुद्धि बहुत भारी थी और शास्त्र अल्प थे। इसी प्रकार सरस्वती उसकी कवित्व शक्तिकी पूर्णताको प्राप्त नहीं थी १. कराश्वासासु म. । २. विबोधाश्चन्यपुत्रिका म.। ३. प्रज्ञायाश्च म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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