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________________ द्वितीय पर्व 'सुत्रामप्रहितैर्यस्य कान्तैः सुरकुमारकैः । कुमारचेष्टितैश्चारुविनीतरे नुसेवितम् ॥७॥ आनन्दः परमां वृद्धिं येन सार्धमुपागतः । पित्रोर्बन्धुसमूहस्य त्रयस्य भुवनस्य च ॥७९॥ यत्र जाते पितुः सर्वे नृपाश्चिरविरोधिनः । महाप्रमावसंपन्ना जाता प्रणतमस्तकाः ॥४०॥ रथैर्मत्तगजेन्द्रश्च वायुवेगैश्च वाजिभिः । प्राभृतद्रव्यसंयुक्तः क्रमेलककुलैस्तथा ।।८१॥ उत्सृष्टचामरच्छत्रवाहनादिपरिच्छदैः । काङ्क्षद्भिः प्रतिसामन्तै राजेन्द्रालोकनोत्सवम् ॥४२॥ नानादेशसमायातमहत्तरगणैस्तथा । पितुर्यस्यानुभावेन चुक्षोभ भवनाजिरम् ।।८३॥ अल्पकर्मकलङ्कत्वाद्यस्य भोगेषु हारिषु । चित्तं न सङ्गमायातं पयःस्विव सरोरुहम् ॥८॥ विद्यद्विलसिताकारां ज्ञात्वा यः सर्वसंपदम् । प्रवव्राज स्वयंबुद्धः कृतलौकान्तिकागमः ॥८५।। सम्यग्दर्शनसंबोधचारित्रत्रितयं प्रभुः । यः समाराध्य चिच्छेद घातिकर्मचतुष्टयम् ॥८६॥ संप्राप्य केवलज्ञानं लोकालोकावलोककम् । धर्मतीथं कृतं येन लोकार्थ कृतिना सता ॥८७।। अवाप्तप्रापणीयस्य कृतनिष्ठात्मकर्मणः । भास्करस्येव यस्याभूत् परकृत्याय चेष्टितम् ।।८८॥ मलस्वेदविनिर्मुक्त क्षीरसप्रमशोणितम् । स्वाकारर्गन्धसंघातं शक्त्या युक्तमनन्तया ॥८९।। चारुलक्षणसंपूर्ण हितसंमित भाषणम् । अप्रमेयगुणागारं यो बभार परं वपुः ॥१०॥ यस्मिन् विहरणप्राप्त योजनानां शतद्वये । दुर्भिक्षपरपीडानामीतीनां च न संभवः ॥११॥ थी ॥७७|| बालकों जैसी चेष्टा करनेवाले, मनोहर विनयके धारक, इन्द्रके द्वारा भेजे हुए सुन्दर देवकूमार सदा जिनकी सेवा किया करते थे ।।७८|| जिनके साथ ही साथ माता-पिताका, बन्धसमूहका और तीनों लोकोंका आनन्द परम वृद्धिको प्राप्त हुआ था ॥७९|| जिनके उत्पन्न होते ही पिताके चिरविरोधी प्रभावशाली समस्त राजा उनके प्रति नतमस्तक हो गये थे ।।८०।। जिनके पिताके भवनका आँगन रथोंसे, मदोन्मत्त हाथियोंसे, वायुके समान वेगशाली घोड़ोंसे, उपहारके अनेक द्रव्योंसे युक्त ऊंटोंके समूहसे, छत्र, चमर, वाहन आदि विभूतिका त्याग कर राजाधिराज महाराजके दर्शनकी इच्छा करनेवाले अनेक मण्डलेश्वर राजाओंसे तथा नाना देशोंसे आये हुए अन्य अनेक बड़े-बड़े लोगोंसे सदा क्षोभको प्राप्त होता रहता था ॥८१-८३॥ जिस प्रकार कमल जलमें आसक्तिको प्राप्त नहीं होता-उससे निलिप्त ही रहता है उसी प्रकार जिनका चित्त कर्मरूपी कलंककी मन्दतासे मनोहारी विषयोंमें आसक्तिको प्राप्त नहीं हुआ था-उससे निर्लिप्त ही रहता था ॥८४।। जो स्वयंबुद्ध भगवान् समस्त सम्पदाको बिजलीकी चमकके समान क्षणभंगुर जानकर विरक्त हुए और जिनके दीक्षाकल्याणकमें लौकान्तिक देवोंका आगमन हुआ था ॥८५।। जिन्होंने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र इन तीनोंकी आराधना कर चार घातिया कर्मोका विनाश किया था ।।८६|| जिन्होंने लोक और अलोकको प्रकाशित करनेवाला केवलज्ञान प्राप्त कर लोककल्याणके लिए धर्मतीर्थका प्रवर्तन किया था तथा स्वयं कृतकृत्य हुए थे ॥८७।। जो प्राप्त करने योग्य समस्त पदार्थ प्राप्त कर चुके थे और करने योग्य समस्त कार्य समाप्त कर चुके थे इसीलिए जिनकी समस्त चेष्टाएँ सूर्यके समान केवल परोपकारके लिए ही होती थीं ॥८८|| जो जन्मसे ही ऐसे उत्कृष्ट शरीरको धारण करते थे, जो कि मल तथा पसीनासे रहित था, दूधके समान सफेद जिसमें रुधिर था, जो उत्तम संस्थान, उत्तम गन्ध और उत्तम संहननसे सहित था, अनन्त बलसे युक्त था, सुन्दर-सुन्दर लक्षणोंसे पूर्ण था, हित मित वचन बोलनेवाला था और अपरिमित गुणोंका भण्डार था ॥८९-९०।। जिनके विहार करते समय दो सौ योजन तक दुभिक्ष आदि दूसरोंको पीड़ा पहुँचानेवाले कार्य तथा अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि ईतियोंका होना सम्भव १. सुत्रामा-म.। २. -रिव म.। ३. उद्धृष्ट म.। ४. -मायातः म.। ५. मता म.। ६. संघ म. । ७. संमत म.। ८. गुणाधारं म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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