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________________ प्रथमं पर्व भूताटवीं प्रविष्टस्य वायोरिभविलोकनम् । विद्याधरसमायोगमञ्जनादर्शनोत्सवम् ॥७५॥ वायुपुत्रसहायत्वं दारुणं परमं रणम् । रावणस्य महाराज्यं जैनमुत्सेधमन्तरम् ॥ ७६ ॥ रामकेशव तच्छत्रुषट्खण्डपरिचेष्टितम् । दशस्यन्दनसंभूतिं कैकय्या वरसंपदम् ॥७७॥ पद्मलक्ष्मणशत्रुघ्नभरतानां समुद्भवम् । सीतोत्पत्तिं प्रभाचक्रहृतिं तन्मातृशोचनम् ॥ ७८ ॥ नारदालिखितां सीतां दृष्ट्वा भ्रातुर्विमूढताम् । स्वयंवराय वृत्तान्तं चापरत्नस्य चोद्भवम् ॥७९॥ सर्वभूतशरण्यस्य दशस्यन्दनदीक्षणम् । माचक्रान्यभवज्ञानं विदेहायाश्च दर्शनम् ॥ ८० ॥ कैकय्या वरतो राज्यप्रापणं भरतस्य च । वैदेहीपद्म सौमित्रिगमनं दक्षिणाशया ॥ ८१ ॥ चेष्टितं वज्रकर्णस्य लाभं कल्याणयोषितः । रुद्रभूतिवशीकारं बालिखिल्य विमोचनम् ॥ ८२ ॥ निकारमरुणग्रामे रामपुय्य निवेशनम् । संगमं वनमालाया अतिवीर्यसमुन्नतिम् ॥८३॥ प्राप्तिं च जितपद्मायाः कौलदेशविभूषणम् । चरितं कारणं रामचैत्यानां वंशपर्वते ॥८४॥ जटायुनियमप्राप्तिं पात्रदानफलोदयम् । महानागरथारोहं शम्बूकविनिपातनम् ॥ ८५ ॥ कैकसेय्याश्व वृत्तान्तं खरदूषणविग्रहम् । सीताहरणशोकं च शोकं रामस्य दुर्धरम् ||८६|| विराधितस्यागमनं खरदूषणपञ्चताम् । विद्यानां रत्नजटिनश्छेदं सुग्रीवसंगमम् ॥ ८७॥ और अंजना के मामा प्रतिसूर्य के द्वारा अंजना तथा हनुमानको हनुरुह द्वीपमें ले जाना ||७४ || तदनन्तर पवनंजयका भूताटवी में प्रवेश, वहाँ उसका हाथी देख प्रतिसूर्यं विद्याधरका आगमन और अंजनाको देखनेका पवनंजयको बहुत भारी हर्ष हुआ इसका वर्णन ||७५ || हनुमान के द्वारा रावणको सहायताकी प्राप्ति तथा वरुणके साथ अत्यन्त भयंकर युद्ध होना । रावणके महान् राज्यका वर्णन तथा तीर्थंकरोंकी ऊँचाई और अन्तराल आदिका निरूपण || ७६ || बलभद्र, नारायण और उनके शत्रु प्रतिनारायण आदिकी छह खण्डोंमें होनेवाली चेष्टाओंका वर्णन, राजा दशरथकी उत्पत्ति और कैकयीको वरदान देनेका कथन ||७७|| राजा दशरथके राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और भरतका जन्म होना, राजा जनकके सीताकी उत्पत्ति और भामण्डलके हरणसे उसकी माताको शोक उत्पन्न होना ॥ ७८ ॥ नारदके द्वारा चित्रमें लिखी सीताको देख भाई भामण्डलको मोह उत्पन्न होना, सीता के स्वयंवर का वृत्तान्त और स्वयंवरमें धनुषरत्नका प्रकट होना || ७९ || सर्वभूतशरण्य नामक मुनिराज के पास राजा दशरथका दीक्षा लेना, सीताको देखकर भामण्डलको अन्य भवोंका ज्ञान होना ||८०|| कैकयीके वरदान के कारण भरतको राज्य मिलना और सीता, राम तथा लक्ष्मणका दक्षिण दिशा की ओर जाना ॥८१॥ वज्रकर्णका चरित्र, लक्ष्मणको कल्याणमाला स्त्रीका लाभ होना, रुद्रभूतिको वश में करना और बालखिल्यको छुड़ाना ॥ ८२ ॥ अरुण ग्राम में श्रीरामका आना, वहाँ देवों के द्वारा बसायी हुई रामपुरी नगरी में रहना, लक्ष्मणका वनमालाके साथ समागम होना और अतिवीर्यको उन्नतिका वर्णन || ८३|| तदनन्तर लक्ष्मणको जितपद्माकी प्राप्ति होना, कूलभूषण और देवभूषण मुनिका चरित्र, श्रीरामने वंशस्थल पर्वतपर जिनमन्दिर बनवाये उनका वर्णन ॥८४॥ जटायु पक्षीको व्रतप्राप्ति, पात्रदान के फलको महिमा, बड़े-बड़े हाथियोंसे जुते रथपर राम-लक्ष्मण आदि का आरूढ़ होना, तथा शम्बूकका मारा जाना ||८५ ॥ शूर्पंगखाका वृत्तान्त, खर-दूषण के साथ श्रीराम के युद्धका वर्णन, सीताके वियोगसे रामको बहुत भारी शोकका होना ||८६|| विराधित नामक विद्याधरका आगमन, खरदूषणका मरण, रावणके द्वारा रत्नजटी विद्याधरकी विद्याओंका १. विलोकने म. । २. परिवेष्टितम् म । ३. दूतं ( ? ) म । ४ वज्रकरणस्य म । ५. रामपुर्याभिवेशनम् म. । ६. रामं म. । ७. शङ्ककविनिपातनम् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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