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________________ ४८७ चतुर्विशतितम पर्व तत्र प्रत्यक्षमन्यासां पत्नीनां भूभृतां तथा । अभ्यधायि नरेन्द्रेण केकयासन्नवर्तिनी ॥१२५॥ पूर्णेन्दुवदने ब्रूहि यत्ते वस्तु मनीषितम् । इह संपादयाम्यद्य प्रसन्नोऽस्मि तव प्रिये ॥१२६॥ चोदयेन्नातिविज्ञानाद्यदि' नाम तथा रथम् । कथं क्रुद्धारिसंघातं विजयेयं सहोस्थितम् ॥१२७॥ अवस्थितं जगद्व्याप्य नुदेदकः कथं तमः । सव्येष्टा चेद्भवेदस्य न मूर्तिररुणास्मिका ॥१२८॥ गुणग्रहणसंजातंब्रीडामारनतानना । मुहुः प्रचोदितोवाच कथंचिदिति केकया ॥१२९॥ नाथ न्यासोऽयमास्तां मे स्वयि वाञ्छितयाचनम् । प्रार्थयिष्ये यदा तस्मिन् काले दास्यसि निर्वचार भुजङ्गप्रयातम् इति प्रोक्तमात्रे जगौ भूमिनाथः समगेन्दुनाथप्रतिस्पर्चिवक्त्रः । भवत्येव युद्धे पृथुश्रोणिसौम्ये त्रिवर्णातिकान्तप्रसन्नोरुनेत्रे ॥१३१॥ अहो बुद्धिरस्या महागोबजाया नयाड्या नितान्तं कलापारगायाः । समस्तोपभोगैरलं संगतायाः कृतं न्यासभूतं मतप्रार्थनं यत् ॥१३२॥ समस्तोऽपि तस्यास्तदाभीष्टवर्गः प्रयातः प्रमोदं प्रकृष्टं नितान्तम् । विचिन्त्य प्रधानं शुभा कंचिदर्थ शनैर्मार्गयिष्यत्यहो केकयेति ॥१३३॥ मतेर्गोचरत्वं मया तावदेतत्प्रणीतं सुवृत्तं धरित्रीपते ते । समुत्पत्तिमस्मान्महामानवानां शृणु द्योतकानामुदारान्वयस्य ॥१३४॥ ॥१२४।। वहाँ राजा दशरथने अन्य सपत्नियों तथा राजाओंके समक्ष पास बैठी हुई केकयासे कहा कि हे पूर्णचन्द्रमुखि ! प्रिये ! जो वस्तु तुम्हें इष्ट हो वह कहो, मैं उसे पूर्ण कर दूँ। आज मैं बहत प्रसन्न हूँ ॥१२५-१२६।। यदि तुम उस समय बड़ी चतुराईसे उस प्रकार रथ नहीं चलातीं तो मैं एक साथ उठे हुए कुपित शत्रुओंके समूहको किस प्रकार जीतता? ॥१२७॥ यदि अरुण सारथि नहीं होता तो समस्त जगत्में व्याप्त होकर स्थित अन्धकारको सूर्य किस प्रकार नष्ट कर सकता? तदनन्तर गुणग्रहणसे उत्पन्न लज्जाके भारसे जिसका मुख नीचा हो रहा था ऐसी केकयाने बारबार प्रेरित होनेपर भी किसी प्रकार यह उत्तर दिया कि हे नाथ ! मेरी इच्छित वस्तुकी याचना आपके पास धरोहरके रूपमें रहे। जब मैं मागूंगी तब आप बिना कुछ कहे दे देंगे ॥१२८-१३०॥ केकयाके इतना कहते ही पूर्णचन्द्रमाके समान मुखको धारण करनेवाले राजा दशरथने कहा कि हे प्रिये ! हे स्थूलनितम्बे ! हे सौम्यवर्णे ! तीन रंगके अत्यन्त सुन्दर, स्वच्छ एवं विशाल नेत्रोंको धारण करनेवाली ! ऐसा ही हो ॥१३१॥ राजा दशरथने अन्य लोगोंसे कहा कि अहो ! महाकूलमें उत्पन्न, कलाओंकी पारगामिनी तथा महाभोगोंसे सहित इस केकयाकी बुद्धि अत्यधिक नीतिसे सम्पन्न है कि जो इसने अपने वरकी याचना धरोहररूप कर दी ॥१३२॥ यह पुण्यशालिनी धीरेधीरे विचारकर किसी अभिलषित उत्तम अर्थको मांग लेगी ऐसा विचारकर उसके सभी इष्ट परिजन उस समय अत्यधिक परम आनन्दको प्राप्त हुए थे ।।१३३।। गौतमस्वामी श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! मैंने बुद्धिके अनुसार तेरे लिए यह राजा १..नादिविज्ञाना -म.। २. विजयेऽहं म.। ३. व्याप्यं म.। ४. संवेष्टा म.। सच्चेष्टा ख. 'सव्येष्टा सारथिः'। ५. संघात म. । ६. उच्चकुलसमुत्पन्नायाः इति ब. पुस्तके टिप्पणम् ७. मनःप्रार्थनं म., ब.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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