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________________ ४८६ पद्मपुराणे वाजिभिः स्यन्दन गैः पादातैश्च नृपा वृताः । कृतशूरमहानादा घनसंघातवर्तिनः ॥१११॥ तोमराणि शरान्याशांश्चक्राणि कनकानि च। तमेकं नृपमुद्दिश्य चिक्षिपुश्च समुद्यताः ॥११२॥ चित्रमेकरथो भूत्वा तदा दशरथो नृपः । जातः शतरथः शक्त्या निःसंख्यानरथोऽथवा ।।११३॥ विचिच्छेद स नाराचैः समं शस्त्राणि विद्विषाम् । अदृष्टाकर्षसंधानैश्चक्रीकृतशरासनः ॥११॥ छिन्नध्वजातपत्रः सन् विह्वलीकृतवाहनः । शरैहेमप्रभस्तेन क्षणेन विरथीकृतः ॥११५॥ स रथान्तरमारुह्य भयावततमानसः । दूतं पलायनं चक्रे कृष्णीकुर्वन्निजं यशः ॥११६॥ ररक्ष स्वं च जायां च शत्रूनस्त्राणि चाच्छिनत्। एको दशरथः कर्म चक्रेऽनन्तरथोचितम् ॥११७॥ दृष्ट्वा दशरथं सिंहं विधूतशरकेसरम् । दुद्रुवुर्योधसारङ्गाः परिगृह्य दिगष्टकम् ॥११८॥ अहो शक्ति रस्यास्य ही चित्रं कन्यया कृतम् । इति नादः समुत्तस्थौ महान् स्वपरसेनयोः ॥११९।। वन्दिघोषितशब्देन शक्त्या वानन्यतुल्यया। जनैर्दशरथो जज्ञे प्रतापं बिभ्रदतम् ॥१२॥ ततः पाणिग्रहस्तेन कृतः कौतुकमङ्गले । कन्यायाः परलोकेन कृतकौतुकमङ्गले ॥१२१॥ महता भूतिभारेण वृत्तोपयमनोत्सवः । ययौ दशरथोऽयोध्या मिथिला जनको यथा ।।१२२॥ पुनर्जन्मोत्सवं तस्य तस्यां चक्रेऽतिसंमदः । पुन पाभिषेकं च परिवर्गो महर्द्धि मिः ॥१२॥ अशेषभयनिर्मुक्को रेमे तत्र स पुण्यवान् । आखण्डल इव स्वर्ग प्रतिमानितशासनः ॥१२४।। पूनः दशरथके रथको नष्ट करनेका प्रयत्न करने लगे ॥११०॥ जो घोडों. रथों. हाथियों तथा पैदल सैनिकोंसे घिरे थे, सिंहनाद कर रहे थे तथा बहुत बड़े समूहके साथ वर्तमान थे ऐसे अनेक राजा अकेले राजा दशरथको लक्ष्य कर तोमर, बाण, पाश, चक्र और कनक आदि शस्त्र बड़ी तत्परतासे चला रहे थे ॥१११-११२।। बड़े आश्चर्यकी बात थी कि राजा दशरथ एकरथ होकर भी दशरथ थे तो और उस समय तो अपने पराक्रमसे शतरथ अथवा असंख्यरथ हो रहे थे ।।११३॥ चक्राकार धनुषके धारक राजा दशरथने जिनके खींचने और रखनेका पता नहीं चलता था ऐसे बाणोंसे एक साथ शत्रुओंके शस्त्र छेद डाले ॥११४॥ जिसकी ध्वजा और छत्र कटकर नीचे गिर गये थे तथा जिसका वाहन थककर अत्यन्त व्याकुल हो गया था ऐसे राजा हेमप्रभको दशरथने क्षणभरमें रथरहित कर दिया ॥११५।। तदनन्तर जिसका मन भयसे व्याप्त था ऐसा हेमप्रभ दूसरे रथपर सवार हो अपने यशको मलिन करता हुआ शीघ्र ही भाग गया ॥११६॥ राजा दशरथने शत्रुओं तथा शस्त्रोंको छेद डाला और अपनी तथा स्त्रीकी रक्षा की। उस समय एक दशरथने जो काम किया था वह अनन्तरथके योग्य था ॥११७॥ जो बाणरूपी जटाओंको हिला रहा था ऐसे दशरथरूपी सिंहको देखकर योद्धारूपी हरिण आठो दिशाएँ पकड़कर भाग गये ॥११८॥ उस समय अपनी तथा शत्रुकी सेनामें यही जोरदार शब्द उठ रहा था कि अहो! इस मनुष्यकी कैसी अद्भुत शक्ति है ? और इस कन्याने कैसा कमाल किया ? ॥११९|| उन्नत प्रतापको धारण करनेवाले राजा दशरथको लोग पहचान सके थे तो वन्दीजनोंके द्वारा घोषित जयनाद अथवा उनकी अनुपम शक्तिसे ही पहचान सके थे ॥१२०॥ । तदनन्तर अन्य लोगोंने जहाँ कौतुक एवं मंगलाचार किये थे ऐसे कौतुकमंगल नामा नगरमें राजा दशरथने कन्याका पाणिग्रहण किया ॥१२१॥ तत्पश्चात् बड़े भारी वैभवसे जिनका विवाहोत्सव सम्पन्न हुआ था ऐसे राजा दशरथ अयोध्या गये और राजा जनक मिथिलापुरी गये ॥१२२॥ वहाँ हर्षसे भरे परिजनोंने बड़े वैभवसे साथ राजा दशरथका पुनर्जन्मोत्सव और पुनर्राज्याभिषेक किया ॥१२३।। जो सब प्रकारके भयसे रहित थे तथा जिनकी आज्ञाको सब शिरोधार्य करते थे ऐसे पुण्यवान् राजा दशरथ स्वर्गमें इन्द्रको तरह अयोध्यामें क्रीड़ा करते थे १. नृपादृताः म. । २. हि म. । हा ख. । ३. कृतः म., ब., ज. । ४. मङ्गलम् म.। ५. तया म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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