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________________ द्वाविंशतितम पर्व ४६७ अविखण्डितशीलाया 'नेदृग्धाष्टयं कुलस्त्रियाः । भवतीति विनिश्चित्य सिंहिकायां व्यरज्यत ॥१२०।। महादेवीपदात् साथ च्याविता साधुचेष्टिता । महादरिद्रता प्राप्ता कालं कंचिदवस्थिता ॥१२१॥ अन्यदाथ महादाहज्वरोऽभूत् पृथिवीपतेः । सर्ववैद्यप्रयुक्तानामौषधानामगोचरः ।।१२२॥ सिंहिका तं तथाभूतं ज्ञात्वा शोकसमाकुला । स्वं च शोधयितुं साध्वी क्रियामेतां समाश्रिता ॥१२३॥ समाहूयाखिलान् बन्धून् सामन्तान् प्रकृतीस्तथा। करकोशे समादाय वारि दत्तं पुरोधसा ।।१२४॥ जगाद यदि मे भर्ता नान्यश्चेतस्यपि स्थितः । ततः सिक्तोऽम्बुनानेन राजास्तु विगतज्वरः ।।१२५।। ततोऽसौ सिक्तमात्रेऽस्मिन् तस्करोदकशीकरे । दन्तवीणाकृतस्वानो हिममग्न इवाभवत् ।।१२६।। साधु साध्विति शब्देन गगनं परिपूरितम् । अदृष्टजननिर्मुक्तैर्वृष्टं सुमनसां चयैः ॥१२७॥ इति तां शीलसंपन्न विज्ञाय नरपुङ्गवः । महादेवीपदे भूयः कृतपूजामतिष्ठिपत् ॥१२८॥ अनुभूय चिरं भोगान् तया सार्धमकण्टकः । निःशेषपूर्वजाचारं कृत्वा मनसि निःस्पृहः ॥१२९॥ संभूतं सिंहिकादेव्यां सुतं राज्ये निनाय सः। जगाम पदवीं धीरो जनकेन निषेविताम् ॥१३०॥ नघुषस्य सुतो यस्मात् सुदासीकृतविद्विषः। सौदास इति तेनासौ भुवने परिकीर्तितः ॥१३॥ तस्य गोत्रे दिनान्यष्टौ चतुर्मासीसमाप्तिषु । भुक्तं न केनचिन्मांसमपि मांसैधितात्मना ।।१३२॥ की बात सुनकर वह परम क्रोधको प्राप्त हुआ ॥११९|| अखण्डशीलको धारण करनेवाली कुलांगनाकी ऐसी धृष्टता नहीं हो सकती ऐसा निश्चय कर वह सिंहिकासे विरक्त हो गया ॥१२०|| वह उत्तम चेष्टाओंसे सहित थी फिर भी राजाने उसे महादेवीके पदसे च्युत कर दिया। इस तरह महादरिद्रताको प्राप्त हो वह कुछ समय तक बड़े कष्टसे रही ।।१२१॥ ___ अथानन्तर किसी समय राजाको ऐसा महान् दाहज्वर हुआ कि जो समस्त वैद्योंके द्वारा प्रयुक्त ओषधियोंसे भी अच्छा नहीं हो सका ।।१२२।। जब सिंहिकाको इस बातका पता चला तब वह शोकसे बहुत ही आकुल हुई। उसी समय उसने अपने आपको निर्दोष सिद्ध करनेके लिए यह काम किया ॥१२३।। कि उसने समस्त बन्धुजनों, सामन्तों और प्रजाको बुलाकर अपने करपुटमें पुरोहितके द्वारा दिया हुआ जल धारण किया और कहा कि यदि मैंने अपने चित्तमें किसी दूसरे भर्ताको स्थान नहीं दिया हो तो इस जलसे सींचा हुआ भर्ता दाहज्वरसे रहित हो जावे ॥१२४-१२५।। तदनन्तर सिंहिका रानीके हाथमें स्थित जलका एक छींटा ही राजापर सींचा गया था कि वह इतना शीतल हो गया मानो बर्फ में ही डबा दिया गया हो। शीतके कारण उसकी दन्तावली वीणाके समान शब्द करने लगी ॥१२६।। उसी समय 'साधु'-'साधु' शब्दसे आकाश भर गया औ अदृष्टजनोंके द्वारा छोड़े हुए फूलोंके समूह बरसने लगे ॥१२७।। इस प्रकार राजा नघुषने सिंहिका रानीको शीलसम्पन्न जानकर फिरसे उसे महादेवी पदपर अधिष्ठित किया तथा उसकी बहुत भारी पुजा को ॥१२८॥ शत्रुरहित होकर उसने चिरकाल तक उसके साथ भोगोंका अनुभव किया और अपने पूर्वपुरुषोंके द्वारा आचारित समस्त कार्य किये। उसकी यह विशेषता थी कि भोगरत रहनेपर भी वह मनमें सदा भोगोंसे निःस्पृह रहता था ॥१२९|| अन्तमें वह धीरवोर सिंहिकादेवीसे उत्पन्न पुत्रको राज्य देकर अपने पिताके द्वारा सेवित मार्गका अनुसरण करने लगा अर्थात् पिताके समान उसने जिनदीक्षा धारण कर ली ॥१३०॥ राजा नघुष समस्त शत्रुओंको वश कर लेनेके कारण सुदास कहलाता था। इसलिए उसका पुत्र संसारमें सौदास ( सुदासस्यापत्यं पुमान् सौदासः) नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥१३१।। प्रत्येक चार १. नेदृग्धी एकुलस्त्रियाः म.। २. मोषधीनामगोचरः म.। ३. करे कोशं ख., ब.। ४. कृतस्थानो म. ! ५. दृष्टं क., ख., ज.। ६. भूपः म. । ७. निःशोष म.। ८. म्यष्ट मः। ९. चतुर्वासी म.। १०. मांसधृतात्मना ब.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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